भारत और पाकिस्तान के बीच 1960 में हुए सिंधु जल समझौते (Indus Waters Treaty) को लेकर चल रहे विवाद के बीच विदेश मंत्रालय के पूर्व अतिरिक्त सचिव एवं कानूनी सलाहकार डॉ. विष्णु दत्त शर्मा का विस्तृत कानूनी विश्लेषण सामने आया है। इसमें संधि की संरचना, विवाद समाधान की प्रक्रिया और अंतरराष्ट्रीय कानून के संदर्भ में भारत की स्थिति पर विस्तार से चर्चा की गई है।
समझौते की बुनियादी व्यवस्था क्या है?
सिंधु जल समझौते पर 19 सितंबर 1960 को हस्ताक्षर हुए थे। इसके तहत रावी, ब्यास और सतलुज जैसी पूर्वी नदियों का उपयोग भारत को मिला, जबकि सिंधु, झेलम और चिनाब जैसी पश्चिमी नदियों के जल पर पाकिस्तान को निर्धारित अधिकार दिए गए। समझौते में विवाद समाधान के लिए चरणबद्ध व्यवस्था भी बनाई गई है।
विवाद समाधान की प्रक्रिया कैसे काम करती है?
विश्लेषण के अनुसार, किसी भी मुद्दे का पहला चरण स्थायी सिंधु आयोग (Permanent Indus Commission) होता है। यदि वहां समाधान नहीं निकलता तो मामला “मतभेद” के रूप में निष्पक्ष विशेषज्ञ (Neutral Expert) के पास जा सकता है। केवल निर्धारित परिस्थितियों में ही मामला “विवाद” बनता है, जिसके बाद मध्यस्थता अदालत (Court of Arbitration) की प्रक्रिया शुरू हो सकती है।
एकतरफा कदम पर क्या कहा गया?
डॉ. शर्मा के विश्लेषण में कहा गया है कि संधि में सीधे किसी पक्ष को एकतरफा तरीके से मध्यस्थता अदालत की प्रक्रिया शुरू करने का अधिकार नहीं दिया गया है। उनका तर्क है कि यदि निर्धारित प्रक्रिया का पालन किए बिना ऐसा प्रयास होता है तो उसे संधि के प्रावधानों के अनुरूप नहीं माना जा सकता। यह विश्लेषण लेखक का कानूनी दृष्टिकोण है, न कि किसी अंतरराष्ट्रीय न्यायाधिकरण का निर्णय।
वियना कन्वेंशन का उल्लेख क्यों?
विश्लेषण में 1969 के Vienna Convention on the Law of Treaties के अनुच्छेद 60 का भी उल्लेख किया गया है। हालांकि भारत और पाकिस्तान इस कन्वेंशन के पक्षकार नहीं हैं तथा सिंधु जल समझौता इससे पहले का है, लेकिन लेखक का कहना है कि इसके कुछ सिद्धांत अंतरराष्ट्रीय प्रथागत कानून (Customary International Law) का हिस्सा माने जाते हैं।
मौजूदा स्थिति क्या है?
भारत सरकार पहले ही स्पष्ट कर चुकी है कि सिंधु जल समझौता फिलहाल “abeyance” (स्थगित स्थिति) में रहेगा और उसका रुख तब तक नहीं बदलेगा जब तक पाकिस्तान सीमा पार आतंकवाद पर विश्वसनीय और अपरिवर्तनीय कदम नहीं उठाता। पाकिस्तान इस रुख का विरोध करता रहा है।