मध्य प्रदेश में लगभग एक दशक से रुकी हुई शासकीय कर्मचारियों की पदोन्नति प्रक्रिया मध्य प्रदेश में 1 जुलाई 2026 से दोबारा शुरू हो गई है। राज्य सरकार ने यह कदम महाधिवक्ता की ओर से प्राप्त कानूनी राय के बाद उठाया है। इस राय में स्पष्ट किया गया है कि MP Promotion Rules 2025 (मध्य प्रदेश लोक सेवा पदोन्नति नियम, 2025) के अमल पर फिलहाल कोई न्यायिक रोक प्रभावी नहीं है। इसी आधार पर विभिन्न विभागों में विभागीय पदोन्नति समितियों (DPC) की कार्रवाई तेज कर दी गई है और कई विभागों में पदोन्नति आदेश भी जारी होने लगे हैं।
कानूनी अभिमत के अनुसार, पहले न्यायालय के समक्ष दिया गया मौखिक आश्वासन उस समय की परिस्थितियों के अनुरूप था, जब मामले में शीघ्र सुनवाई और निर्णय की संभावना जताई जा रही थी। बाद में परिस्थितियों में बदलाव आने के कारण उस आश्वासन को नियमों के क्रियान्वयन पर स्थायी रोक के रूप में नहीं देखा जा सकता।
30 जून को विभागों को भेजा गया महाधिवक्ता का पत्र
सूत्रों के अनुसार, सामान्य प्रशासन विभाग के अपर सचिव अजय कटेसरिया ने 30 जून को सभी विभागों को महाधिवक्ता के पत्र और वरिष्ठ अधिवक्ता सी.एस. वैद्यनाथन की कानूनी राय भेजते हुए पदोन्नति प्रक्रिया आगे बढ़ाने के निर्देश दिए। अभिमत में कहा गया है कि राज्य सरकार द्वारा दी गई अंडरटेकिंग को न तो किसी न्यायिक आदेश का हिस्सा बनाया गया और न ही अदालत ने ऐसा कोई निर्देश दिया, जिससे सरकार अपनी वैधानिक शक्तियों का उपयोग करने से प्रतिबंधित हो।
कानूनी राय में मध्य प्रदेश राज्य बनाम विन्नी कुमार बाबेल प्रकरण सहित अन्य न्यायिक आदेशों का भी उल्लेख किया गया है। इन मामलों में यह सिद्धांत सामने रखा गया कि केवल नियमों को चुनौती दिए जाने या मामला लंबित रहने से राज्य सरकार विभागीय पदोन्नति समिति की बैठक आयोजित करने अथवा पदोन्नति देने से स्वतः नहीं रुकती। हालांकि ऐसी सभी पदोन्नतियां न्यायालय के अंतिम निर्णय के अधीन मानी जाएंगी।
कई विभागों में जारी हुई पदोन्नति की कार्रवाई
इसी कानूनी आधार पर राज्य सरकार ने पदोन्नति प्रक्रिया को आगे बढ़ाया है। मंगलवार को डिप्टी कलेक्टरों की पदोन्नति के आदेश भी जारी किए गए, जबकि अन्य विभागों में भी DPC की बैठकें और संबंधित प्रशासनिक प्रक्रियाएं जारी हैं।
पूर्व सचिव ने उठाया प्रक्रिया पर सवाल
सामान्य प्रशासन विभाग के पूर्व सचिव डी.एस. राय ने सरकार के निर्णय पर सवाल उठाते हुए कहा कि यदि न्यायालय के समक्ष कोई अंडरटेकिंग दी गई थी तो उसका पालन किया जाना चाहिए था। उनका कहना है कि यदि बाद में परिस्थितियां बदल गई थीं, तो राज्य सरकार को इस विषय को दोबारा न्यायालय के संज्ञान में रखना चाहिए था, क्योंकि यह मामला बड़ी संख्या में सरकारी कर्मचारियों के हितों से जुड़ा हुआ है।
कर्मचारी संगठन ने भी जताई चिंता
दूसरी ओर, सामान्य, अन्य पिछड़ा और अल्पसंख्यक वर्ग अधिकारी-कर्मचारी संस्था (सपाक्स) के अध्यक्ष केपीएस तोमर ने भी सरकार की कार्रवाई पर चिंता व्यक्त की है। उनका कहना है कि नियमों को चुनौती देने वाली याचिका पर अंतिम फैसला अभी लंबित है। ऐसे में यदि भविष्य में न्यायालय का निर्णय वर्तमान पदोन्नति प्रक्रिया के विपरीत आता है, तो उससे प्रभावित कर्मचारियों को होने वाली प्रशासनिक और मानसिक परेशानियों की जिम्मेदारी तय करना भी महत्वपूर्ण होगा।
फिलहाल राज्य सरकार का कहना है कि उसे उच्च न्यायालय से पदोन्नति प्रक्रिया रोकने संबंधी कोई नया निर्देश प्राप्त नहीं हुआ है। सरकार का पक्ष है कि आगे की कार्रवाई न्यायालय से मिलने वाले निर्देशों और कानूनी स्थिति के अनुरूप ही की जाएगी।