मध्यप्रदेश सरकार ने एंटीमाइक्रोबियल रेजिस्टेंस (AMR) यानी ऐसी स्थिति, जब बैक्टीरिया पर एंटीबायोटिक दवाओं का असर कम या खत्म होने लगता है, उससे निपटने के लिए मध्यप्रदेश राज्य कार्ययोजना 2.0 (MP-SAP-AMR 2.0) लागू कर दी है। यह पांच वर्षीय कार्ययोजना 2026 से 2030 तक लागू रहेगी और इसे राज्य सरकार तथा राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन (NHM) के सहयोग से संचालित किया जाएगा। इसका उद्देश्य अस्पतालों में एंटीबायोटिक दवाओं का वैज्ञानिक उपयोग सुनिश्चित करना, संक्रमण नियंत्रण को मजबूत करना, लैब क्षमता बढ़ाना और लोगों में जागरूकता फैलाना है।
जांच के बाद तय होगी कौन-सी दवा असरदार है
नई व्यवस्था के तहत प्रदेश के सभी सरकारी मेडिकल कॉलेजों और जिला अस्पतालों की प्रयोगशालाओं में शेकर इन्क्यूबेटर मशीनें स्थापित की जाएंगी। इन मशीनों में बैक्टीरिया और फफूंद को नियंत्रित तापमान व परिस्थितियों में विकसित कर विभिन्न एंटीबायोटिक दवाओं के प्रति उनकी संवेदनशीलता की जांच की जाएगी।
इससे डॉक्टर यह पहचान सकेंगे कि मरीज के संक्रमण पर कौन-सी दवा प्रभावी है और किन दवाओं के प्रति प्रतिरोध (रेजिस्टेंस) विकसित हो चुका है। इसके आधार पर मरीज को अधिक सटीक और प्रभावी उपचार मिल सकेगा।
गंभीर संक्रमणों के इलाज में मिलेगी मदद
स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार यह पहल टीबी, निमोनिया, रक्त संक्रमण (ब्लड स्ट्रीम इंफेक्शन) और विभिन्न फंगल संक्रमणों जैसे गंभीर रोगों के इलाज में उपयोगी साबित हो सकती है। सही समय पर सही एंटीबायोटिक मिलने से उपचार की सफलता बढ़ेगी, अनावश्यक दवाओं के इस्तेमाल में कमी आएगी और दवा प्रतिरोध की बढ़ती समस्या पर नियंत्रण पाने में मदद मिलेगी। साथ ही मेडिकल कॉलेजों में शोध, नई दवाओं और वैक्सीन से जुड़े अध्ययन को भी बेहतर आधार मिलेगा।
MP-SAP-AMR 2.0 का फोकस किन क्षेत्रों पर रहेगा?
राज्य की नई कार्ययोजना चार प्रमुख प्राथमिकताओं पर आधारित है:
- अस्पतालों में संक्रमण की रोकथाम और संक्रमण नियंत्रण व्यवस्था को मजबूत करना।
- डॉक्टरों और फार्मासिस्टों को एंटीबायोटिक दवाओं के उचित उपयोग का प्रशिक्षण देना।
- लोगों को बिना चिकित्सकीय सलाह के एंटीबायोटिक दवाएं लेने से बचने के लिए जागरूक करना।
- प्रयोगशालाओं की जांच क्षमता बढ़ाकर दवा प्रतिरोध की नियमित निगरानी करना।
हर महीने तैयार होगी दवा प्रतिरोध की रिपोर्ट
स्वास्थ्य विभाग के अनुसार मशीनें स्थापित होने के बाद जिला स्तर पर नियमित निगरानी की जाएगी। हर महीने रिपोर्ट तैयार होगी, जिससे यह पता लगाया जा सकेगा कि किस जिले में कौन-से बैक्टीरिया किन एंटीबायोटिक दवाओं के प्रति प्रतिरोध विकसित कर रहे हैं। इन आंकड़ों के आधार पर भविष्य की उपचार नीति और सार्वजनिक स्वास्थ्य रणनीति तैयार की जाएगी।
क्यों बढ़ रही है एंटीमाइक्रोबियल रेजिस्टेंस की चुनौती?
विशेषज्ञ लंबे समय से चेतावनी देते रहे हैं कि बिना डॉक्टर की सलाह के एंटीबायोटिक लेना, अधूरा दवा कोर्स छोड़ देना और अनावश्यक रूप से एंटीबायोटिक का उपयोग करना एंटीमाइक्रोबियल रेजिस्टेंस की सबसे बड़ी वजहों में शामिल है। यही कारण है कि केंद्र सरकार ने भी राष्ट्रीय कार्ययोजना NAP-AMR 2.0 के माध्यम से राज्यों में संक्रमण नियंत्रण, निगरानी और एंटीबायोटिक स्टेवर्डशिप को मजबूत करने पर जोर दिया है।