भोपाल। राजधानी भोपाल में स्थित बरकतउल्ला विश्वविद्यालय का नाम बदलकर “वाग्देवी भोजपाल विश्वविद्यालय” करने के प्रस्ताव को लेकर विरोध का स्वर तेज होता जा रहा है। विभिन्न सामाजिक, धार्मिक और नागरिक संगठनों ने शुक्रवार को संयुक्त रूप से पैदल मार्च निकालने का ऐलान किया है। आयोजकों के अनुसार यह मार्च शाम 4:30 बजे जहांगीराबाद स्थित जिंसी चौकी से शुरू होगा और इसके बाद राज्यपाल के नाम ज्ञापन सौंपकर नाम परिवर्तन के प्रस्ताव को वापस लेने की मांग की जाएगी। हाल ही में विश्वविद्यालय की कार्यपरिषद (Executive Council) ने नाम परिवर्तन संबंधी प्रस्ताव को मंजूरी देकर आगे की प्रक्रिया के लिए भेजा है।
स्वतंत्रता सेनानी की विरासत से जुड़ा मुद्दा बना विवाद का केंद्र
विरोध कर रहे संगठनों का कहना है कि विश्वविद्यालय का वर्तमान नाम स्वतंत्रता सेनानी मौलाना बरकतउल्ला भोपाली की स्मृति से जुड़ा हुआ है। उनका तर्क है कि बरकतउल्ला ने देश की आजादी के लिए विदेशों में रहकर महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी और उन्हें भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के प्रमुख चेहरों में गिना जाता है। कई संगठनों का मानना है कि उनके नाम पर स्थापित विश्वविद्यालय की पहचान बदलना ऐतिहासिक विरासत को कमजोर करने जैसा कदम होगा।
“नए विश्वविद्यालय बनाइए, पुराने नाम मत बदलिए”
मध्यप्रदेश सर्वधर्म सद्भावना मंच के पदाधिकारियों ने कहा कि प्रदेश में उच्च शिक्षा की गुणवत्ता बढ़ाने और नए संस्थान स्थापित करने पर ध्यान दिया जाना चाहिए। उनका कहना है कि यदि सरकार किसी नए नाम से शैक्षणिक संस्थान स्थापित करना चाहती है तो नए विश्वविद्यालय खोले जाएं, लेकिन दशकों से स्थापित संस्थानों की ऐतिहासिक पहचान को नहीं बदला जाना चाहिए।
संगठनों ने यह भी कहा कि शिक्षा को राजनीतिक बहस का विषय बनाने के बजाय विश्वविद्यालयों में शोध, अधोसंरचना और शैक्षणिक गुणवत्ता सुधार पर ध्यान दिया जाना चाहिए।
आखिर क्या है नाम परिवर्तन का प्रस्ताव?
विश्वविद्यालय की कार्यपरिषद ने हाल ही में संस्थान का नाम बदलकर “वाग्देवी भोजपाल विश्वविद्यालय” करने का प्रस्ताव पारित किया है। प्रस्ताव को आगे की स्वीकृति के लिए राज्य सरकार और संवैधानिक प्रक्रिया के तहत भेजा गया है। अंतिम निर्णय संबंधित सरकारी और विधायी प्रक्रिया पूरी होने के बाद ही प्रभावी होगा।
भोपाल की पहचान बनाम नई पहचान की बहस
नाम परिवर्तन को लेकर बहस केवल विश्वविद्यालय तक सीमित नहीं रह गई है। समर्थक इसे सांस्कृतिक और ऐतिहासिक पुनर्परिभाषा का कदम बता रहे हैं, जबकि विरोधी पक्ष इसे स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़े एक महत्वपूर्ण व्यक्तित्व की विरासत से जोड़कर देख रहा है। इसी कारण यह मुद्दा शिक्षा, इतिहास और सार्वजनिक स्मृति से जुड़ी व्यापक चर्चा का विषय बन गया है।

