Sunday, 28 June

मध्यप्रदेश के सांदीपनि स्कूलों के लिए यूनिफॉर्म आपूर्ति से जुड़े टेंडर में निर्धारित पात्रता शर्तों को लेकर मध्यप्रदेश हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण अंतरिम आदेश जारी किया है। हाईकोर्ट की युगलपीठ ने प्रथम दृष्टया यह माना कि टेंडर में रखी गई कुछ शर्तों पर न्यायिक परीक्षण आवश्यक है। इसके बाद अदालत ने फिलहाल टेंडर प्रक्रिया में वर्क ऑर्डर जारी करने पर रोक लगा दी है।

कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश विवेक रूसिया की अध्यक्षता वाली युगलपीठ ने राज्य शासन और संबंधित अधिकारियों को नोटिस जारी करते हुए अगली सुनवाई तक कोई वर्क ऑर्डर जारी नहीं करने के निर्देश दिए। यह मामला सरकारी खरीद (Public Procurement) में निष्पक्ष प्रतिस्पर्धा और समान अवसर के सिद्धांतों से जुड़ा माना जा रहा है।

क्या है पूरा मामला?

याचिका राजस्थान के भीलवाड़ा स्थित सुविधि रेयन्स प्राइवेट लिमिटेड के प्रतिनिधि चिराग जैन की ओर से दायर की गई है। याचिका में कहा गया कि प्रारंभिक निविदा शर्तों के अनुसार गारमेंट निर्माता, फैब्रिक निर्माता या दोनों श्रेणी की कंपनियां टेंडर में भाग लेने के लिए पात्र थीं।

बाद में जारी संशोधित शर्तों में पात्रता सीमित करते हुए केवल ओरिजिनल इक्विपमेंट मैन्युफैक्चरर (OEM) को ही पात्र कर दिया गया। इसके साथ ही पिछले तीन वित्तीय वर्षों में 60 करोड़ रुपये के औसत वार्षिक टर्नओवर की अनिवार्यता भी जोड़ दी गई।

10-12 करोड़ के टेंडर में 60 करोड़ टर्नओवर की शर्त पर सवाल

याचिकाकर्ता की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता ब्रायन डिसिल्वा और अधिवक्ता अभिषेक दिलराज ने अदालत में दलील दी कि संबंधित टेंडर का अनुमानित मूल्य लगभग 10 से 12 करोड़ रुपये है। ऐसे में 60 करोड़ रुपये के औसत वार्षिक टर्नओवर की अनिवार्यता टेंडर के आकार की तुलना में असंगत और अनुपातहीन है।

याचिका के अनुसार, इस तरह की शर्त से वे कंपनियां भी निविदा प्रक्रिया से बाहर हो सकती हैं, जिन्होंने पिछले वर्षों में समान मूल्य के सरकारी कार्य सफलतापूर्वक पूरे किए हैं।

हाईकोर्ट ने क्यों लगाई अंतरिम रोक?

अदालत ने प्रारंभिक सुनवाई में याचिकाकर्ता की आपत्तियों को विचारणीय माना। इसी आधार पर राज्य सरकार और संबंधित अधिकारियों को नोटिस जारी करते हुए अगली सुनवाई तक वर्क ऑर्डर जारी नहीं करने के निर्देश दिए।

हालांकि, यह अंतरिम आदेश है और मामले में अंतिम फैसला विस्तृत सुनवाई तथा सभी पक्षों की दलीलें सुनने के बाद ही दिया जाएगा।

सरकारी खरीद प्रक्रिया में क्यों अहम है यह मामला?

सार्वजनिक खरीद प्रक्रिया में पात्रता संबंधी शर्तों का उद्देश्य सक्षम कंपनियों का चयन करना होता है, लेकिन शर्तें ऐसी होनी चाहिए जो प्रतिस्पर्धा को अनावश्यक रूप से सीमित न करें। यदि पात्रता मानदंड टेंडर के आकार की तुलना में अत्यधिक कठोर हों, तो सीमित कंपनियां ही प्रतिस्पर्धा में रह जाती हैं।

इसी पहलू को लेकर हाईकोर्ट ने मामले को गंभीर संवैधानिक और प्रशासनिक महत्व का मानते हुए फिलहाल हस्तक्षेप किया है।

अब राज्य शासन और संबंधित विभाग हाईकोर्ट के समक्ष अपना जवाब प्रस्तुत करेंगे। इसके बाद अदालत यह तय करेगी कि टेंडर की विवादित शर्तें सार्वजनिक खरीद के नियमों और निष्पक्ष प्रतिस्पर्धा के सिद्धांतों के अनुरूप हैं या उनमें संशोधन की आवश्यकता है। फिलहाल अदालत के अंतरिम आदेश के चलते संबंधित टेंडर में वर्क ऑर्डर जारी नहीं किया जा सकेगा।

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