भारत में 2026 का दक्षिण-पश्चिम मानसून सामान्य से कमजोर रहने का अनुमान जताया गया है। मौसम विभाग के ताजा पूर्वानुमान के अनुसार जून से सितंबर के बीच होने वाली बारिश दीर्घकालिक औसत (Long Period Average) से कम रह सकती है। इसकी प्रमुख वजह प्रशांत महासागर में विकसित हो रही एल नीनो (El Niño) मौसम प्रणाली को माना जा रहा है। यदि अनुमान सही साबित होता है तो इसका असर कृषि उत्पादन, खाद्य कीमतों, ग्रामीण आय और देश की समग्र अर्थव्यवस्था पर पड़ सकता है।
11 साल में सबसे कमजोर मानसून का अनुमान
मौसम से जुड़े सरकारी और निजी पूर्वानुमानों के अनुसार 2026 में मानसूनी वर्षा लगभग 90 प्रतिशत के आसपास रह सकती है। यह स्तर सामान्य श्रेणी से नीचे माना जाता है और पिछले एक दशक से अधिक समय में सबसे कमजोर मानसून साबित हो सकता है। जून महीने में भी औसत से कम बारिश की संभावना जताई गई है, जबकि मानसून के दूसरे हिस्से में एल नीनो का प्रभाव और अधिक दिखाई दे सकता है।
किसानों की चिंता क्यों बढ़ी?
भारत की बड़ी कृषि आबादी आज भी मानसून पर निर्भर है। देश की लगभग आधी कृषि भूमि ऐसी है जहां सिंचाई की स्थायी व्यवस्था नहीं है। ऐसे में बारिश कम होने से धान, दालें, तिलहन, मक्का और अन्य खरीफ फसलों की बुवाई प्रभावित हो सकती है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि जुलाई और अगस्त में पर्याप्त वर्षा नहीं हुई तो उत्पादन में गिरावट की आशंका बढ़ सकती है। यही दो महीने खरीफ खेती के लिए सबसे महत्वपूर्ण माने जाते हैं।
महंगाई पर क्या पड़ेगा असर?
कमजोर मानसून का सबसे तेज असर खाद्य महंगाई पर देखने को मिल सकता है। जब कृषि उत्पादन घटता है तो बाजार में अनाज, दाल, सब्जियों और खाद्य तेलों की आपूर्ति प्रभावित होती है। इससे कीमतों में बढ़ोतरी की संभावना बढ़ जाती है।
हाल के आकलनों में यह भी संकेत दिया गया है कि कमजोर मानसून की स्थिति में खुदरा महंगाई दर फिर से ऊपर जा सकती है। ऐसे समय में सरकार और रिजर्व बैंक दोनों की चुनौतियां बढ़ सकती हैं क्योंकि खाद्य कीमतें सीधे आम उपभोक्ता की जेब पर असर डालती हैं।
ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर असर
मानसून केवल खेती तक सीमित नहीं है। ग्रामीण क्षेत्रों में आय, खपत और रोजगार का बड़ा हिस्सा कृषि गतिविधियों से जुड़ा होता है। यदि फसल कमजोर रहती है तो किसानों की आय प्रभावित हो सकती है, जिसका असर ट्रैक्टर, दोपहिया वाहन, उर्वरक, बीज और उपभोक्ता वस्तुओं की मांग पर भी पड़ सकता है।
ग्रामीण बाजारों की धीमी रफ्तार कई उद्योगों के लिए भी चुनौती बन सकती है क्योंकि भारत की खपत आधारित अर्थव्यवस्था में ग्रामीण क्षेत्र महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
एल नीनो क्या है और क्यों बढ़ी चिंता?
एल नीनो एक वैश्विक मौसमीय घटना है, जिसमें प्रशांत महासागर के मध्य और पूर्वी हिस्से का समुद्री तापमान सामान्य से अधिक हो जाता है। इतिहास बताता है कि एल नीनो वाले वर्षों में भारत में अक्सर मानसून कमजोर रहा है। कई बार इससे सूखे जैसी परिस्थितियां भी पैदा हुई हैं और कृषि उत्पादन पर दबाव बढ़ा है।
विश्व मौसम विज्ञान संगठन (WMO) ने भी 2026 के दौरान मजबूत एल नीनो विकसित होने की संभावना जताई है, जिससे दुनिया के कई हिस्सों में मौसम का स्वरूप प्रभावित हो सकता है।
क्या स्थिति पूरी तरह चिंताजनक है?
हालांकि पूर्वानुमान कमजोर मानसून की ओर इशारा कर रहे हैं, लेकिन मौसम वैज्ञानिकों का कहना है कि मानसून के दौरान क्षेत्रवार वर्षा में बड़ा अंतर हो सकता है। कुछ इलाकों में सामान्य या सामान्य से अधिक बारिश भी दर्ज की जा सकती है। इसके अलावा देश के पास खाद्यान्न भंडार मौजूद हैं, जिससे तत्काल आपूर्ति संकट की आशंका कम मानी जा रही है।

