विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (FPI) का भारतीय शेयर बाजार से लगातार पैसा निकालना निवेशकों की चिंता बढ़ा रहा है। जून 2026 के पहले दो सप्ताह में ही विदेशी निवेशकों ने भारतीय इक्विटी बाजार से 62,853 करोड़ रुपये की शुद्ध निकासी कर दी है। नेशनल सिक्योरिटीज डिपॉजिटरी लिमिटेड (NSDL) के आंकड़ों के अनुसार, वर्ष 2026 में अब तक विदेशी निवेशक भारतीय शेयर बाजार से लगभग 2.87 लाख करोड़ रुपये निकाल चुके हैं।
यह आंकड़ा इसलिए भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि पूरे वर्ष 2025 के दौरान विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों ने भारतीय बाजार से 1.66 लाख करोड़ रुपये की बिकवाली की थी। यानी 2026 में निकासी का स्तर पिछले साल की तुलना में काफी अधिक रहा है।
किन वजहों से बढ़ रही है विदेशी निवेशकों की बिकवाली?
विशेषज्ञों के अनुसार, वैश्विक स्तर पर बढ़ती अनिश्चितता ने निवेशकों के जोखिम लेने की क्षमता को प्रभावित किया है। प्रमुख कारणों में शामिल हैं:
- मध्य पूर्व में बढ़ता भू-राजनीतिक तनाव।
- वैश्विक आर्थिक वृद्धि की रफ्तार को लेकर बढ़ती चिंताएं।
- भारतीय रुपये में लगातार कमजोरी।
- विकसित देशों के केंद्रीय बैंकों की ब्याज दर नीतियों को लेकर अनिश्चितता।
- भारतीय शेयर बाजार का अपेक्षाकृत ऊंचे वैल्यूएशन पर कारोबार करना।
ऐसे माहौल में विदेशी निवेशक आमतौर पर जोखिम वाले बाजारों से पूंजी निकालकर अपेक्षाकृत सुरक्षित निवेश विकल्पों की ओर रुख करते हैं।
जून तक कैसा रहा 2026 में FPI का रुख?
NSDL के उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, फरवरी को छोड़कर 2026 के लगभग हर महीने विदेशी निवेशक भारतीय बाजार में शुद्ध विक्रेता रहे हैं।
2026 में FPI का मासिक निवेश/निकासी
- जनवरी: ₹35,962 करोड़ की निकासी
- फरवरी: ₹22,615 करोड़ का निवेश
- मार्च: ₹1.17 लाख करोड़ की रिकॉर्ड बिकवाली
- अप्रैल: ₹60,847 करोड़ की निकासी
- मई: ₹32,963 करोड़ की निकासी
- जून (पहले दो सप्ताह): ₹62,853 करोड़ की निकासी
फरवरी में दर्ज किया गया निवेश पिछले 17 महीनों का सबसे बड़ा मासिक निवेश था, लेकिन मार्च से विदेशी निवेशकों का रुख एक बार फिर आक्रामक बिकवाली की ओर मुड़ गया।
केंद्रीय बैंकों के फैसलों पर रहेगी नजर
बाजार विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले दिनों में विदेशी निवेशकों का रुख कई वैश्विक घटनाक्रमों पर निर्भर करेगा। इनमें शामिल हैं:
- अमेरिका और ईरान के बीच संभावित शांति वार्ता की दिशा।
- अमेरिकी फेडरल ओपन मार्केट कमेटी (FOMC) की मौद्रिक नीति बैठक के फैसले।
- बैंक ऑफ जापान की ब्याज दर नीति।
- दुनिया के प्रमुख केंद्रीय बैंकों की भविष्य की टिप्पणियां और संकेत।
इन फैसलों का असर वैश्विक पूंजी प्रवाह और उभरते बाजारों में निवेश की धारणा पर पड़ सकता है।
भारतीय शेयरों की ऊंची वैल्यूएशन भी बनी वजह
बाजार विश्लेषकों का कहना है कि अन्य उभरती अर्थव्यवस्थाओं की तुलना में भारतीय शेयर बाजार अपेक्षाकृत ऊंचे वैल्यूएशन पर कारोबार कर रहा है। ऐसे में विदेशी निवेशक अधिक सतर्क रुख अपना रहे हैं।
जब वैश्विक स्तर पर अनिश्चितता बढ़ती है, तब निवेशक अक्सर पूंजी संरक्षण को प्राथमिकता देते हैं। इसके चलते वे उभरते बाजारों से पैसा निकालकर विकसित अर्थव्यवस्थाओं या अपेक्षाकृत सुरक्षित परिसंपत्तियों में निवेश बढ़ाते हैं।
रुपये की कमजोरी ने भी बढ़ाई चिंता
भारतीय रुपये में लगातार कमजोरी भी विदेशी निवेशकों की रणनीति को प्रभावित कर रही है। उपलब्ध बाजार आंकड़ों के अनुसार, वर्ष 2026 में अब तक रुपया अमेरिकी डॉलर के मुकाबले लगभग 6 प्रतिशत कमजोर हुआ है, जबकि पिछले एक वर्ष में इसमें करीब 10 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई है।
रुपये के कमजोर होने से विदेशी निवेशकों को मुद्रा विनिमय के कारण अतिरिक्त जोखिम उठाना पड़ता है, जिससे वे निवेश कम करने का फैसला कर सकते हैं।
निवेशकों के लिए क्या मायने?
विशेषज्ञों का मानना है कि विदेशी निवेशकों की बिकवाली अल्पकाल में बाजार की अस्थिरता बढ़ा सकती है। हालांकि, घरेलू संस्थागत निवेशकों (DII) की भागीदारी और भारतीय अर्थव्यवस्था की दीर्घकालिक विकास संभावनाएं बाजार को सहारा देने में अहम भूमिका निभा सकती हैं।
निवेशकों के लिए जरूरी है कि वे केवल अल्पकालिक उतार-चढ़ाव के आधार पर निर्णय लेने के बजाय अपने वित्तीय लक्ष्यों, जोखिम क्षमता और निवेश अवधि को ध्यान में रखते हुए रणनीति तैयार करें।
