मध्य प्रदेश सरकार ने आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं और सहायिकाओं के मानदेय कटौती से जुड़े मामले में बड़ा कानूनी कदम उठाने का फैसला किया है। सरकार, हाई कोर्ट की जबलपुर पीठ के उस फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देगी, जिसमें वर्ष 2019 से 2023 के बीच काटे गए मानदेय का एरियर देने और ग्रेच्युटी का लाभ उपलब्ध कराने के निर्देश दिए गए हैं। इस मामले का वित्तीय प्रभाव राज्य सरकार पर लगभग 1,400 करोड़ रुपये बताया जा रहा है।
क्या है पूरा मामला?
विवाद की शुरुआत वर्ष 2018 में हुई, जब केंद्र सरकार ने समेकित बाल विकास सेवा (ICDS) से जुड़ी आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं और सहायिकाओं के मानदेय में वृद्धि की घोषणा की। इस योजना में केंद्र और राज्य सरकार दोनों का वित्तीय योगदान निर्धारित होता है।
आंगनबाड़ी संगठनों का आरोप है कि केंद्र सरकार द्वारा मानदेय बढ़ाने के बाद राज्य सरकार ने अपने हिस्से का अंशदान कम कर दिया। इससे कार्यकर्ताओं और सहायिकाओं को मिलने वाले कुल मानदेय में अपेक्षित लाभ नहीं मिल सका। इसी निर्णय को अदालत में चुनौती दी गई थी।
राज्य सरकार का क्या था पक्ष?
राज्य सरकार का तर्क था कि केंद्र सरकार द्वारा घोषित बढ़ी हुई राशि को पहले से दिए जा रहे राज्य अंशदान के साथ समायोजित किया गया। सरकार का कहना था कि राज्य पहले ही अतिरिक्त मानदेय दे रहा था, इसलिए कुल भुगतान के ढांचे को संतुलित रखने के उद्देश्य से अपने हिस्से में समायोजन किया गया। हालांकि, याचिकाकर्ताओं ने इसे मानदेय में वास्तविक कटौती बताते हुए अदालत का दरवाजा खटखटाया।
हाई कोर्ट ने क्या फैसला सुनाया?
जबलपुर स्थित हाई कोर्ट की एकल पीठ ने राज्य सरकार की कटौती को अवैध माना। अदालत ने निर्देश दिया कि जून 2019 से जून 2023 तक की 48 माह की अवधि के दौरान काटी गई राशि का एरियर संबंधित आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं और सहायिकाओं को 6 प्रतिशत वार्षिक ब्याज सहित एकमुश्त भुगतान किया जाए। इसके अलावा अदालत ने आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं और सहायिकाओं को ग्रेच्युटी का लाभ देने के भी निर्देश दिए।






