हैकर्स ने ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ (CJP) की वेबसाइट और इंस्टाग्राम पेज को निशाना बनाया, तो यह सिर्फ एक साइबर हमले की खबर नहीं थी; यह उस बेचैनी की गूंज थी जिसने मौजूदा तंत्र की नींद उड़ा दी है। दो करोड़ से ज्यादा फॉलोअर्स वाला यह डिजिटल प्लेटफॉर्म आज सत्ता और विपक्ष दोनों की इमैजिनेशन को कैप्चर कर चुका है। असल बात यह है कि यह ग्रुप महज मीम-पेज नहीं, बल्कि उस ‘रेवड़ी कल्चर’ के खिलाफ खड़ा एक ऐसा शोर है, जो अब सड़क की राजनीति को हाईजैक करने की कूवत रखता है। 2026 में 12 राज्यों के दो लाख करोड़ रुपये के कैश ट्रांसफर और मुफ्त योजनाओं के बढ़ते अंबार के बीच, यह पार्टी उस हताश नागरिक की आवाज बन गई है, जिसे अब सब्सिडी नहीं, जवाबदेही चाहिए।
राजनीति की बिसात पर यह बदलाव हैरान करने वाला
बीते वर्षों में हमने देखा है कि कैसे मुफ्तखोरी के वादे—दिल्ली की बिजली से लेकर मध्य प्रदेश की ‘लाड़ली बहना’ और तमिलनाडु के सोने तक वोट बैंक बनाने का सबसे कारगर हथियार बन गए हैं। आंकड़ों की कड़वी सच्चाई यह है कि मुफ्त योजनाओं पर खर्च होने वाला सरकारी खजाना अब इसरो के सालाना बजट से भी दो गुना ज्यादा हो गया है। एक तरफ बिहार के सरकारी स्कूलों में दो लाख शिक्षकों के पद खाली पड़े हैं, वहीं दूसरी तरफ उसी राज्य के लोग उन नीतियों को वोट दे रहे हैं जो उन्हें आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनाने के बजाय सरकारी खैरात पर आश्रित कर रही हैं। यह ‘मुफ्तखोर नागरिक’ बनाने की एक सोची-समझी प्रक्रिया है, जो लोकतंत्र को अंदर से खोखला कर रही है।
आलोचकों का तर्क है कि हर आंदोलन का अंत अंततः सत्ता की कुर्सी तक ही पहुंचता है। जेपी आंदोलन के बाद लालू-नीतीश का उदय हुआ और अन्ना के अनशन से निकले नेताओं ने दिल्ली की सत्ता संभाली। क्या CJP भी भविष्य के ‘प्रोफेशनल नेताओं’ की नर्सरी बनकर रह जाएगी? यह खतरा वास्तविक है। इंटरनेट पर रील और पोस्ट के जरिए जो शोर पैदा होता है, उसमें अक्सर ‘अंधभक्ति’ और ‘अंधविरोध’ का ऐसा घालमेल होता है जो असली मुद्दों को दबा देता है। अगर इस मूवमेंट के युवाओं ने सही को सही और गलत को गलत कहने की हिम्मत नहीं दिखाई, तो यह भी इतिहास का एक और ‘सिस्टम एरर’ बनकर इतिहास के पन्नों में दब जाएगा।
असल सवाल यह नहीं है कि कौन सी पार्टी जीत रही है, बल्कि यह है कि क्या हम एक ऐसी पीढ़ी बना रहे हैं जो सिर्फ सब्सिडी के भरोसे जिएगी? कॉकरोच जनता पार्टी का असली टेस्ट हैकिंग या लाइक्स नहीं, बल्कि यह है कि क्या यह उन लोगों को सवाल पूछने के लिए मजबूर कर सकती है जो आज मुफ्त की योजनाओं के आगे अपनी दूरदृष्टि खो चुके हैं। आने वाले समय में, अगर युवाओं ने डिजिटल प्लेटफॉर्म का इस्तेमाल ‘लालच के सौदागर’ बनने के बजाय ‘सिस्टम के प्रहरी’ बनने में किया, तभी इस देश की नींव सुरक्षित रह पाएगी। वरना, यह रेवड़ी कल्चर का दौर इतना लंबा चलेगा कि जब तक हम होश में आएंगे, देश का खजाना और नागरिकों की सोचने की शक्ति, दोनों ही नीलाम हो चुके होंगे।
