Thursday, 14 May

भारतीय समाज में सोना सिर्फ एक धातु नहीं, बल्कि सुरक्षा और परंपरा का सबसे बड़ा प्रतीक रहा है। केन्द्र सरकार ने सोने में लगने वाले आयात शुल्क (Import Duty) को 6% से बढ़ाकर सीधा 15% करने का फैसला महज एक टैक्स वृद्धि नहीं है। यह भारत की ‘सोया हुआ धन’ कही जाने वाली संपत्ति को देश की मुख्य अर्थव्यवस्था से जोड़ने की एक सोची-समझी सर्जिकल स्ट्राइक है।
आखिर सरकार सोने को इतना महंगा क्यों बना रही है? इसका जवाब उन आंकड़ों में छिपा है जो किसी की भी आंखें खोल सकते हैं।

$4 ट्रिलियन की ‘डेड वेल्थ’ का संकट

मॉर्गन स्टेनली की अक्टूबर 2025 की एक रिपोर्ट के मुताबिक, भारतीय परिवारों के पास लगभग 34,600 टन सोना जमा है। इसकी अहमियत समझने के लिए इन दो बिंदुओं पर गौर करें:

  • GDP के बराबर ताकत: जून 2025 की कीमतों के आधार पर इस सोने की वैल्यू 4 ट्रिलियन डॉलर है, जो भारत की कुल जीडीपी के लगभग बराबर है।
  • शेयर बाजार से बड़ा: यह संपत्ति भारत के पूरे शेयर बाजार (Stock Market) से चार गुना ज्यादा बड़ी है।

एक नजरिए से देखें तो समस्या यह है कि शेयर बाजार का पैसा कंपनियों को बढ़ने और नौकरियां पैदा करने में मदद करता है, जबकि तिजोरियों में रखा यह 4 ट्रिलियन डॉलर का सोना ‘आइडल’ (निष्क्रिय) पड़ा है। इससे न सरकार को रेवेन्यू मिलता है, न ही देश के विकास में कोई निवेश होता है।

आयात की मजबूरी और विदेशी मुद्रा का खेल

ऑल इंडिया ज्वेलर्स फेडरेशन ने सरकार को एक बहुत ही सटीक सुझाव दिया है: जनता को सोना खरीदने से रोकने के बजाय, उन्हें घर में पड़े पुराने सोने को रीसायकल करने के लिए प्रोत्साहित किया जाए।
यदि हम पुराने सोने को ही बाजार में वापस ला सकें, तो भारत को हर साल 200-300 टन सोना बाहर से नहीं मंगवाना पड़ेगा। इससे देश के ₹2-3 लाख करोड़ के विदेशी मुद्रा भंडार (Foreign Exchange Reserves) की बचत होगी, जो वर्तमान में हम सिर्फ पीली धातु आयात करने में खर्च कर देते हैं।

इलेक्ट्रॉनिक गोल्ड रिसीट्स (EGRs): क्या अब ‘डीमैट’ में रहेगा सोना?

सवाल उठता है कि क्या भारत के पास इतने बड़े बदलाव के लिए इंफ्रास्ट्रक्चर है? सरकार ने इसकी तैयारी पहले ही शुरू कर दी थी। इलेक्ट्रॉनिक गोल्ड रिसीट्स (EGRs) इस पूरी योजना का केंद्र हैं:

  • डिजिटल होल्डिंग: अब आप सोने को अपने डीमैट अकाउंट में वैसे ही रख पाएंगे जैसे शेयर रखते हैं।
  • ट्रेडेबल और लिक्विड: इन्हें कभी भी बाजार में बेचा जा सकेगा।
  • फिजिकल गारंटी: सबसे बड़ी बात यह है कि जब भी जरूरत हो, इन डिजिटल रसीदों के बदले असली सोना फिजिकल रूप में क्लेम किया जा सकेगा।

विश्लेषण: क्या बदलेगी भारत की सोच?

सरकार की इस रणनीति के पीछे एक बड़ा मकसद भारतीय रुपये (INR) की वैश्विक साख बढ़ाना भी है। जब सोना डिजिटल होगा और आयात कम होगा, तो रुपया मजबूत होगा।

यह लड़ाई आर्थिक से ज्यादा मनोवैज्ञानिक है। भारतीयों के लिए सोना ‘स्त्रीधन’ और मुसीबत का साथी है। 15% ड्यूटी लगाकर सरकार ने नया सोना खरीदना मुश्किल कर दिया है, और अब वह चाहती है कि लोग अपने पास रखे सोने को सिस्टम का हिस्सा बनाएं।

सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि क्या आम आदमी सरकार के ‘डिजिटल गोल्ड’ पर उतना ही भरोसा कर पाएगा जितना उसे अपनी पुश्तैनी ज्वेलरी पर है। सरकार ने अपनी चाल चल दी है; अब देखना यह है कि भारतीय परिवार अपनी तिजोरियां खोलते हैं या सोने के प्रति उनका मोह और गहरा होता है।

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