Monday, 18 May

जब प्रधानमंत्री Narendra Modi ने हाल ही में ऊर्जा बचाने की अपील की और उसके तुरंत बाद संयुक्त अरब अमीरात (UAE) का दौरा किया, तो बहस केवल पेट्रोल-डीज़ल की कीमतों तक सीमित नहीं रही। असली सवाल यह है कि दुनिया की पाँचवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था होने के बावजूद भारत आज भी अपनी ऊर्जा ज़रूरतों के लिए इतना असुरक्षित क्यों है?

सरकारी आंकड़ों और उद्योग रिपोर्टों के मुताबिक भारत की कच्चे तेल (क्रूड ऑयल) पर आयात निर्भरता अब लगभग 89% तक पहुँच चुकी है। यानी देश में इस्तेमाल होने वाले हर 100 बैरल तेल में से लगभग 89 बैरल विदेशों से आते हैं। 2015 में यह निर्भरता करीब 77-81% थी। उसी समय सरकार ने “ऊर्जा संगम” जैसे अभियानों के जरिए 2022 तक इस निर्भरता को 67% तक लाने का लक्ष्य रखा था। लेकिन वास्तविकता उल्टी दिशा में गई। ​​

समस्या सिर्फ तेल की नहीं, रणनीतिक कमजोरी की है

भारत की सबसे बड़ी चिंता केवल यह नहीं कि वह तेल आयात करता है, बल्कि यह है कि उसका बड़ा हिस्सा पश्चिम एशिया यानी Middle East से आता है। भारत के तेल आयात का लगभग आधा से अधिक हिस्सा इसी क्षेत्र से जुड़ा है। ऐसे में Hormuz Strait जैसे समुद्री मार्गों पर तनाव सीधे भारतीय अर्थव्यवस्था को झटका देता है। हाल के पश्चिम एशिया संकट और तेल आपूर्ति में बाधा ने यही दिखाया। ​​

यही वजह है कि प्रधानमंत्री का UAE दौरा केवल कूटनीतिक यात्रा नहीं माना जा रहा। यह भारत की ऊर्जा सुरक्षा रणनीति का हिस्सा है। UAE वर्षों से ऐसे वैकल्पिक पाइपलाइन नेटवर्क बना रहा है जो Strait of Hormuz को bypass कर सकें। अबू धाबी से फुजैराह तक बनी पाइपलाइन इसी रणनीति का हिस्सा है। इससे तेल सीधे अरब सागर तक पहुँचाया जा सकता है, बिना Hormuz पर निर्भर हुए।

लेकिन भारत की चुनौती यह है कि वह अभी भी दूसरों के infrastructure पर निर्भर है, जबकि चीन ने पिछले दो दशकों में अपनी ऊर्जा सुरक्षा के लिए आक्रामक निवेश किया।

चीन और भारत का अंतर केवल अर्थव्यवस्था का नहीं, तैयारी का है

2004 के बाद जब इराक युद्ध ने वैश्विक तेल आपूर्ति को अस्थिर किया, तब भारत और चीन दोनों ने Strategic Petroleum Reserve (SPR) बनाने की शुरुआत की थी। लेकिन दोनों देशों की गति बिल्कुल अलग रही।

चीन ने विशाल भंडारण क्षमता, अंतरराष्ट्रीय पाइपलाइन नेटवर्क और विदेशी तेल क्षेत्रों में निवेश पर तेजी से काम किया। Kazakhstan-China pipeline, Myanmar-China pipeline और अफ्रीका से लेकर लैटिन अमेरिका तक चीनी निवेश इसी रणनीति का हिस्सा रहे।

भारत ने भी विशाखापट्टनम, मंगलुरु और पाडुर में Strategic Petroleum Reserve बनाए, लेकिन उनकी क्षमता सीमित रही। ऊर्जा विशेषज्ञ लंबे समय से कह रहे हैं कि भारत का SPR कई विकसित अर्थव्यवस्थाओं की तुलना में काफी छोटा है और यह केवल कुछ दिनों की मांग ही संभाल सकता है। दूसरी ओर चीन महीनों तक आपूर्ति बाधित होने पर भी टिक सकता है।

आखिर भारत पीछे क्यों रह गया? ऊर्जा क्षेत्र से जुड़े विशेषज्ञ तीन बड़े कारण बताते हैं:

1. घरेलू उत्पादन में लगातार गिरावट

भारत का crude oil production पिछले 11 वर्षों से लगातार गिर रहा है। पुराने oil fields कमजोर हो रहे हैं और नए बड़े भंडार नहीं मिले। ONGC और अन्य कंपनियों के उत्पादन में लगातार गिरावट दर्ज हुई है।

2. नीति सुधारों की धीमी रफ्तार

सरकार ने exploration policy, licensing reforms और data repository जैसी पहलें शुरू कीं, लेकिन विदेशी निवेशक अभी भी regulatory uncertainty और pricing concerns की शिकायत करते हैं। नतीजा यह हुआ कि बड़े पैमाने पर private और global investment नहीं आया।

3. ऊर्जा संक्रमण की असमान गति

भारत renewable energy में तेजी से आगे बढ़ रहा है  solar capacity, EV adoption और green hydrogen mission इसका उदाहरण हैं। लेकिन transport sector अभी भी भारी मात्रा में crude oil पर निर्भर है। EV penetration अभी चीन के मुकाबले काफी कम है।

दिलचस्प बात यह है कि चीन ने renewables में भी निवेश किया और traditional oil security infrastructure भी मजबूत किया। भारत अक्सर इन दोनों को अलग-अलग रणनीतियों की तरह देखता रहा।

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