जब देश के पढ़े-लिखे युवाओं या स्किल्ड लेबर के विदेश जाने की बात होती है, तो हमारे जेहन में पहला शब्द आता है—ब्रेन ड्रेन (Brain Drain)। यानी देश की प्रतिभा का बाहर चले जाना। बरसों से इसे एक राष्ट्रीय नुकसान की तरह देखा गया। लेकिन नई दिल्ली के नीतिगत गलियारों में इस वक्त एक ऐसी रणनीति पर काम चल रहा है, जो इस पूरी थ्योरी को ही पलट कर रख देगी।
भारत सरकार अब ‘मैनपावर एक्सपोर्ट’ को एक सोची-समझी आर्थिक रणनीति (Economic Strategy) की तरह इस्तेमाल करने की तैयारी में है। सीधे शब्दों में कहें तो—हमारे पास दुनिया को बेचने के लिए तेल के कुएं नहीं हैं, न ही हम डॉलर छापने की मशीन हैं, लेकिन हमारे पास दुनिया की सबसे बड़ी और युवा वर्कफोर्स है। अब इसी वर्कफोर्स को ग्लोबल मार्केट में सही जगह प्लेस करके भारत अपनी अर्थव्यवस्था की रीढ़ मजबूत कर रहा है।
डिप्लोमेसी और स्किल का नया गठजोड़
इस पूरी रणनीति का केंद्र बिंदु विदेश मंत्रालय (MEA) और कौशल विकास एवं उद्यमिता मंत्रालय (MSDE) के बीच का नया तालमेल है। विदेश मंत्रालय ने साफ संकेत दिए हैं कि सरकारी योजनाओं के तहत भारतीय कामगारों को विशेष रूप से इजरायल, जापान और रूस जैसे देशों के लिए तैयार किया जाए।
ये वो देश हैं जो इस वक्त दो बड़ी चुनौतियों से जूझ रहे हैं:
- बुजुर्ग होती आबादी (Aging Population): जापान जैसे देशों में काम करने वाले युवाओं की भारी कमी है।
- भू-राजनीतिक बदलाव (Geopolitical Shifts): इजरायल और रूस जैसे देशों में हालिया वैश्विक और क्षेत्रीय परिस्थितियों के कारण लेबर शॉर्टेज पैदा हुई है।
भारत इसी खाली जगह को भरने की तैयारी में है। यह सिर्फ लोगों को विदेश भेजने का मामला नहीं है, बल्कि ‘टारगेटेड स्किलिंग’ है। यानी जिस देश को जिस तरह के प्रोफेशनल्स की जरूरत है, भारत अपने युवाओं को उसी सांचे में ढालकर सीधे वहां लैंड कराएगा।
$137 अरब की ताकत: जब प्रवासी बनते हैं इकॉनमी का बैकबोन
इस रणनीति के पीछे जो सबसे बड़ा गणित है, उसे अर्थशास्त्र की भाषा में रेमिटेंस (Remittance) यानी प्रवासियों द्वारा घर भेजा जाने वाला पैसा कहते हैं।
वर्ल्ड बैंक और इंटरनेशनल ऑर्गनाइजेशन फॉर माइग्रेशन (IOM) की लेटेस्ट ‘विश्व प्रवासन रिपोर्ट’ के आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक, भारत इस वक्त दुनिया का सबसे बड़ा रेमिटेंस हासिल करने वाला देश बना हुआ है। भारतीय प्रवासी हर साल लगभग 137.67 अरब डॉलर ($137 Billion+) स्वदेश भेजते हैं। वैश्विक स्तर पर भारत अकेला ऐसा देश है जिसने 100 अरब डॉलर के इस आंकड़े को पार किया है।
यह रकम कितनी बड़ी है, इसका अंदाजा आप इस बात से लगा सकते हैं कि भारत के विदेशी मुद्रा भंडार (Foreign Exchange Reserves) को ऐतिहासिक स्तर पर बनाए रखने में इसका बहुत बड़ा हाथ है। जब देश के भीतर मैन्युफेक्चरिंग या पारंपरिक एक्सपोर्ट से डॉलर कमाने की एक सीमा होती है, तब यह ‘ह्यूमन कैपिटल’ देश के लिए सबसे बड़ा संकटमोचक साबित होती है।
क्या यह ‘ब्रेन ड्रेन’ पर दोहरा रवैया है?
इस पूरी नीति का एक दूसरा पहलू भी है जो नीति निर्माताओं को असहज कर सकता है। एक तरफ मंचों से यह बात कही जाती है कि हमें देश की प्रतिभा को देश में ही रोकना है, स्टार्टअप्स को बढ़ावा देना है और ‘मेक इन इंडिया’ को सफल बनाना है। लेकिन दूसरी तरफ, हकीकत यह भी है कि हमारी अर्थव्यवस्था का एक बड़ा हिस्सा एनआरआई (NRI) के भेजे पैसों पर निर्भर होता जा रहा है।
एक बड़ा विरोधाभास: क्या हम अपनी घरेलू अर्थव्यवस्था में इतने हाई-क्वालिटी रोजगार पैदा नहीं कर पा रहे हैं कि हमें सरकारी स्तर पर युवाओं को बाहर भेजने की रणनीति बनानी पड़ रही है? या फिर यह वैश्वीकरण (Globalization) के दौर में अपनी आबादी का फायदा उठाने का सबसे स्मार्ट तरीका है?
आने वाले वक्त की चुनौती
सरकार का यह कदम शॉर्ट-टर्म में विदेशी मुद्रा संकट से निपटने और बेरोजगारी के दबाव को कम करने का एक बेहतरीन जरिया दिख रहा है। लेकिन लॉन्ग-टर्म में भारत को यह सुनिश्चित करना होगा कि हम सिर्फ ‘ब्लू कॉलर’ या ‘सेमी-स्किल्ड’ लेबर सप्लायर बनकर न रह जाएं।
चुनौती इस बात की होगी कि हम इजरायल या जापान जैसे देशों में केवल कंस्ट्रक्शन वर्कर्स या केयर-गिवर्स ही न भेजें, बल्कि टेक, रिसर्च और मैनेजमेंट के टॉप लेवल्स पर भी हमारे लोग कमान संभालें। रणनीति तभी पूरी तरह सफल मानी जाएगी जब बाहर जाने वाला हर भारतीय, देश के लिए सिर्फ डॉलर ही न भेजे, बल्कि वहां से ग्लोबल एक्सपोजर और तकनीक सीखकर कभी न कभी भारत वापस भी लौटे।
