मध्यप्रदेश में तेजी से बढ़ रहे बैटरी चालित ई-रिक्शा के संचालन और उससे जुड़ी यातायात व्यवस्था पर अब न्यायिक स्तर पर गंभीर सवाल उठे हैं। सोमवार को मध्यप्रदेश हाईकोर्ट में हुई सुनवाई के दौरान केंद्र और राज्य सरकार को नोटिस जारी करते हुए जवाब दाखिल करने के लिए अंतिम अवसर दिया गया। अदालत ने यह भी जानना चाहा कि वर्ष 2018 में ई-रिक्शा और बैटरी चालित वाहनों को परमिट की अनिवार्यता से दी गई छूट पर दोबारा विचार क्यों नहीं किया जा सकता।
याचिका में क्या कहा गया?
जबलपुर निवासी डॉ. पी.जी. नाजपांडे और रजत भार्गव की ओर से दायर जनहित याचिका में दावा किया गया है कि प्रदेश के कई शहरों में बड़ी संख्या में ई-रिक्शा बिना प्रभावी नियमन के संचालित हो रहे हैं। याचिकाकर्ताओं का कहना है कि इससे ट्रैफिक जाम, सड़क सुरक्षा और यातायात प्रबंधन जैसी समस्याएं लगातार बढ़ रही हैं। उनके अनुसार कई मामलों में बिना लाइसेंस या नाबालिग चालकों द्वारा भी ई-रिक्शा चलाए जाने की शिकायतें सामने आती रही हैं, जिससे दुर्घटनाओं का जोखिम बढ़ता है।
जबलपुर का उदाहरण क्यों बना चर्चा का केंद्र?
याचिका में बताया गया कि अकेले जबलपुर में 9 हजार से अधिक ई-रिक्शा संचालित होने का दावा किया गया है। याचिकाकर्ताओं के अनुसार इतनी बड़ी संख्या में वाहनों के संचालन का असर प्रमुख सड़कों की यातायात क्षमता पर पड़ रहा है। इसी आधार पर अदालत से व्यापक नियामकीय व्यवस्था लागू करने की मांग की गई है।
विवाद की जड़ में 2018 की अधिसूचना
मामले का मुख्य आधार केंद्र सरकार की वर्ष 2018 की वह अधिसूचना है, जिसके तहत मोटर वाहन अधिनियम की धारा 66 के अंतर्गत ई-रिक्शा और कुछ बैटरी चालित वाहनों को परमिट लेने की अनिवार्यता से छूट दी गई थी। याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि इस छूट का व्यापक स्तर पर दुरुपयोग हो रहा है और इसी वजह से अनियंत्रित संचालन की स्थिति बनी है।
सुनवाई में क्या हुआ?
सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार की ओर से असिस्टेंट सॉलिसिटर जनरल अदालत में उपस्थित हुए और जवाब दाखिल करने के लिए समय मांगा। इस पर हाईकोर्ट ने चार सप्ताह की मोहलत देते हुए केंद्र सरकार से स्पष्ट रुख पेश करने को कहा। अदालत ने यह भी निर्देश दिया कि सरकार बताए कि ई-रिक्शा को दी गई मौजूदा छूट वापस लेने या उसमें संशोधन पर विचार क्यों नहीं किया जा सकता।