Tuesday, 14 July

मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की जबलपुर पीठ ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि कोई भी बालिग व्यक्ति अपनी पसंद के स्थान पर रहने और अपनी इच्छा से किसी भी व्यक्ति के साथ जीवन बिताने के लिए स्वतंत्र है। अदालत ने कहा कि यदि कोई वयस्क बिना किसी दबाव के अपनी मर्जी से रह रहा है, तो उसे उसकी इच्छा के विरुद्ध माता-पिता के पास भेजने का आदेश नहीं दिया जा सकता।

यह टिप्पणी हाईकोर्ट की जबलपुर पीठ की युगलपीठ ने एक बंदी प्रत्यक्षीकरण (Habeas Corpus) याचिका पर सुनवाई के दौरान की। अदालत ने कहा कि इस प्रकार की याचिका का उद्देश्य केवल यह जांचना है कि संबंधित व्यक्ति किसी गैर-कानूनी हिरासत में है या नहीं। यदि ऐसा नहीं है, तो अदालत किसी बालिग के व्यक्तिगत निर्णय में हस्तक्षेप नहीं कर सकती।

क्या था मामला

मामला जबलपुर के रांझी क्षेत्र से जुड़ा है, जहां एक महिला ने हाईकोर्ट में याचिका दायर कर आरोप लगाया कि रितिक चौधरी नामक युवक उनकी बालिग बेटी को बहला-फुसलाकर अपने साथ ले गया है। याचिका में बेटी को अदालत के समक्ष पेश करने और उसे वापस परिवार को सौंपने की मांग की गई थी।

हाईकोर्ट के निर्देश पर पुलिस ने युवती को अदालत में पेश किया। मामले की संवेदनशीलता को देखते हुए न्यायालय ने युवती से बंद कमरे (इन-कैमरा) में अलग से बातचीत कर उसका पक्ष जाना।

युवती ने क्या कहा

अदालत के समक्ष युवती ने स्पष्ट रूप से कहा कि वह बालिग है और अपनी इच्छा से रितिक चौधरी के साथ रह रही है। उसने यह भी बताया कि उस पर किसी प्रकार का दबाव, भय या अनुचित प्रभाव नहीं है। युवती ने अपने माता-पिता के साथ रहने से इनकार करते हुए युवक के साथ रहने की इच्छा जताई।

युवती के इस बयान के आधार पर अदालत ने माना कि वह किसी गैर-कानूनी हिरासत में नहीं है और अपनी स्वतंत्र इच्छा से जीवन जी रही है।

हाईकोर्ट की टिप्पणी

युगलपीठ ने अपने आदेश में कहा कि अदालतें माता-पिता की भावनाओं या सामाजिक दबाव के आधार पर “सुपर गार्जियन” की भूमिका नहीं निभा सकतीं। यदि संबंधित व्यक्ति बालिग है और अपनी स्वतंत्र इच्छा से निर्णय ले रहा है, तो उसके संवैधानिक अधिकारों का सम्मान किया जाना चाहिए।

हाईकोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका तभी स्वीकार्य होती है जब किसी व्यक्ति को अवैध रूप से बंधक बनाकर रखा गया हो या उसकी स्वतंत्रता का हनन हुआ हो। केवल पारिवारिक असहमति या माता-पिता की नाराजगी इस याचिका का आधार नहीं बन सकती।

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