मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम से जुड़े मामलों की जांच को लेकर महत्वपूर्ण निर्देश जारी किए हैं। अदालत ने स्पष्ट किया कि ऐसे मामलों की विवेचना अजा-जजा अत्याचार निवारण नियम, 1995 के नियम-7 के अनुरूप उप पुलिस अधीक्षक (डीएसपी) स्तर के अधिकारी द्वारा ही की जानी चाहिए। इसी आधार पर शाहडोल के पुलिस अधीक्षक को दो सप्ताह के भीतर मामले की समीक्षा कर आवश्यक कार्रवाई करने के निर्देश दिए गए। नियम-7 में ऐसे मामलों की जांच डीएसपी या उससे उच्च अधिकारी द्वारा किए जाने का प्रावधान है।
याचिका में क्या उठाया गया था मुद्दा?
मामले में याचिकाकर्ता विनय सिंह करछाम ने हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था। याचिका के अनुसार, 27 मई 2025 की घटना के बाद गोहपारू थाना पुलिस ने एफआईआर दर्ज नहीं की। पुलिस अधीक्षक को शिकायत देने के बावजूद कार्रवाई नहीं होने पर विशेष न्यायालय में आवेदन प्रस्तुत किया गया, जिसके आदेश के बाद 30 जनवरी 2026 को एफआईआर दर्ज हुई।
याचिका में यह भी कहा गया कि एफआईआर दर्ज होने के बाद भी मामले की विवेचना थाना प्रभारी द्वारा की जा रही है, जबकि नियम-7 के तहत इस प्रकार के मामलों की जांच डीएसपी से कम रैंक का अधिकारी नहीं कर सकता।
राज्य सरकार ने अदालत में क्या कहा?
राज्य की ओर से प्रस्तुत पक्ष में कहा गया कि एफआईआर दर्ज हो चुकी है और विवेचना कानून के अनुसार आगे बढ़ रही है। साथ ही यह भी दलील दी गई कि आरोपितों की गिरफ्तारी, संबंधित पुलिस अधिकारियों के विरुद्ध विभागीय कार्रवाई या जांच की न्यायिक निगरानी का आदेश देने जैसी असाधारण परिस्थितियां इस मामले में मौजूद नहीं हैं।
हाई कोर्ट ने क्या कहा?
न्यायमूर्ति हिमांशु जोशी की एकलपीठ ने दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद कहा कि एफआईआर दर्ज न होने संबंधी शिकायत का समाधान हो चुका है, लेकिन नियम-7 का पालन सुनिश्चित किया जाना आवश्यक है।
अदालत ने निर्देश दिया कि यदि मामले की विवेचना अब तक डीएसपी स्तर के अधिकारी को नहीं सौंपी गई है, तो शाहडोल के पुलिस अधीक्षक दो सप्ताह के भीतर इसकी समीक्षा करें और आवश्यकता होने पर जांच सक्षम अधिकारी को हस्तांतरित करें। साथ ही अदालत ने यह भी कहा कि विवेचना निष्पक्ष, स्वतंत्र और शीघ्र पूरी की जानी चाहिए।
इन मांगों को अदालत ने नहीं माना
हाई कोर्ट ने इस मामले में आरोपितों की तत्काल गिरफ्तारी, पुलिस अधिकारियों के खिलाफ विभागीय कार्रवाई तथा स्वतंत्र पर्यवेक्षण तंत्र गठित करने की मांग स्वीकार नहीं की। अदालत ने कहा कि उपलब्ध रिकॉर्ड में ऐसे आदेश पारित करने के लिए आवश्यक असाधारण परिस्थितियां या दुर्भावना का पर्याप्त आधार सामने नहीं आया।
