मध्य प्रदेश हाई कोर्ट की जबलपुर पीठ ने भरण-पोषण से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में स्पष्ट किया है कि अदालतों का उद्देश्य केवल तकनीकी आधार पर मामलों का निपटारा करना नहीं, बल्कि वास्तविक और प्रभावी न्याय सुनिश्चित करना है। कोर्ट ने कहा कि यदि किसी याचिका में गलती से गलत कानूनी धारा का उल्लेख कर दिया गया हो, तो केवल इसी वजह से जरूरतमंद व्यक्ति को राहत से वंचित नहीं किया जा सकता।
फैमिली कोर्ट के आदेश को हाई कोर्ट ने बरकरार रखा
न्यायमूर्ति द्वारिकाधीश बंसल की एकलपीठ ने सतना निवासी गंगा सिंह की पुनरीक्षण याचिका खारिज कर दी। इसके साथ ही फैमिली कोर्ट के उस आदेश को बरकरार रखा, जिसमें उनकी बेटी रक्षा सिंह के पक्ष में प्रति माह 2,000 रुपये अंतरिम भरण-पोषण देने के निर्देश दिए गए थे।
हालांकि, फैमिली कोर्ट ने पत्नी की ओर से किए गए भरण-पोषण के दावे को इस आधार पर स्वीकार नहीं किया था कि प्रथम दृष्टया वैध विवाह के पर्याप्त प्रमाण प्रस्तुत नहीं किए गए थे।
पिता की आपत्तियों को अदालत ने नहीं माना
सुनवाई के दौरान पिता की ओर से दलील दी गई कि बालिग बेटी को दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 125 के तहत भरण-पोषण नहीं दिया जा सकता। यह भी कहा गया कि बेटी ने पिता के खिलाफ शिकायतें दर्ज कराई हैं, इसलिए उसे राहत नहीं मिलनी चाहिए।
हाई कोर्ट ने इन सभी तर्कों को स्वीकार करने से इनकार कर दिया और कहा कि मामले का मूल्यांकन केवल इन आधारों पर नहीं किया जा सकता।
हिंदू दत्तक ग्रहण एवं भरण-पोषण अधिनियम का दिया हवाला
अदालत ने अपने आदेश में स्पष्ट किया कि फैमिली कोर्ट के पास हिंदू दत्तक ग्रहण एवं भरण-पोषण अधिनियम, 1956 की धारा 20(3) के तहत भी राहत देने का अधिकार है। ऐसे में यदि आवेदन में किसी अन्य कानूनी धारा का उल्लेख कर दिया गया हो, तो यह न्याय देने में बाधा नहीं बन सकता।
कोर्ट ने कहा कि न्यायालयों को तकनीकी त्रुटियों के बजाय मामले के वास्तविक तथ्यों और न्यायसंगत अधिकारों पर ध्यान देना चाहिए।
बालिग अविवाहित बेटी के अधिकार पर महत्वपूर्ण टिप्पणी
हाई कोर्ट ने अपने फैसले में यह भी स्पष्ट किया कि किसी बालिग अविवाहित बेटी को भरण-पोषण पाने के लिए दिव्यांग होना अनिवार्य नहीं है। यदि वह अपनी आय या संपत्ति से स्वयं का पालन-पोषण करने में सक्षम नहीं है, तो उसे अपने पिता से भरण-पोषण प्राप्त करने का कानूनी अधिकार होगा।
यह टिप्पणी भविष्य में ऐसे मामलों के लिए भी महत्वपूर्ण कानूनी संदर्भ मानी जा सकती है।
बकाया राशि की वसूली के निर्देश
सुनवाई के दौरान अदालत के संज्ञान में आया कि पिता ने अंतरिम भरण-पोषण की बकाया राशि जमा नहीं की है। इस पर हाई कोर्ट ने फैमिली कोर्ट को निर्देश दिया कि बकाया राशि की शीघ्र वसूली सुनिश्चित की जाए।
अदालत ने यह भी कहा कि आवश्यकता पड़ने पर पिता का बचाव (डिफेंस) समाप्त करने जैसी कानूनी कार्रवाई भी की जा सकती है। साथ ही मां और बेटी को लंबित आवेदन में उपयुक्त कानूनी प्रावधान जोड़ते हुए संशोधन करने की अनुमति भी प्रदान की गई।
