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डिण्डौरी
विष्व आदिवासी दिवस की 30 वीं वर्षगांठ के अवसर पूरे जिले में कार्यक्रमों का आयोजन किया गया, जिला मुख्यालय में सर्व आदिवासी समाज संगठन के तात्वाधान में बस स्टेण्ड जिला अस्पताल के सामने मनाया गया, इस अवसर पर सांस्कृतिक कार्यक्रम का आयोजन तथा रैली एंव मंचीय उदबोधन विद्वानों ने व्यक्त किया, कार्यक्रम के मुख्य वक्ता विजय भाई संस्थापक भारत जन आंदोलन (उड़ीसा) ने अपने उदबोधन मे ंकहा कि अनुसूचित क्षेत्रों में वर्तमान में कोई भी कानून का संचालन पाॅचवी अनुसूची के तहत नहीं किया जा रहा है, इस संबध में राज्य को कानून बनाना था लेकिन 75 वर्षो के बाद भी हमारे गांव में हमारे राज की संकल्पना नहीं हो सकी है, वंही अमान सिह पोर्ते एंव राजाबली मरावी ने कह कि बड़ी विडम्बना है कि राज्य में 22 प्रतिषत आदिवासी आबादी होने के बाद भी एक दिन का अवकाष मध्यप्रदेष सरकार द्वारा नहीं रखा गया है, अवकाष ना होने के कारण बहुत से कर्मचारी, छात्र छात्राऐं कार्यक्रम में उपस्थित नहीं हो सके।
देष में आदिवासी समुदाय 8.5 प्रतिषत निवासरत है, तथा मध्यप्रदेष में 22 प्रतिषत जनसंख्या है। जल जंगल जमीन के अधिकारों को लेकर समुदाय आजादी के पूर्व से संघर्ष कर रहा है, लाखों आदिवासी महिला पुरूष आजादी के संघर्ष में शहीद हो गए, आजादी के बाद संविधान में अधिकार तो दिए लेकिन समय पर उन अधिकारों पर कानून ना बनने से पाॅचवी अनुसूचित क्षेत्र में गैर आदिवासियों ने आदिवासी समाज सामाजिक, आर्थिक, धार्मिक शोषण किया है, जिससे आदिवासी समाज देष की मुख्य धारा के साथ नहीं चल सका, देष के विकास में सरकारी आंकड़ो में दो करोड़ से ज्यादा आदिवासी विस्थापन हो चुका है, ओर वर्तमान में जो परियोजनाऐं, अभ्यारण्य कारीडोर, नवीन खनिज उत्खनन क्षेत्र तथा अन्य विकासषील कार्यो में 05 लाख से ज्यादा आदिवासी देष में विस्थापन होना है। स्वतंत्र भारत में आदिवासियों के अधिकारों को अमान्य कर उनके साथ ऐतिहासिक अन्याय हुआ?
भारत की स्वतंत्रता के साथ-साथ अग्रेंजों के बनाए विभिन्न कानून सम्पूर्ण भारत सहित आदिवासी क्षेत्रों में लागू हुए, जिससे कि कभी भी पराधीन न होने वाला आदिवासी समाज, आजादी के साथ कानूनी रूप से गुलाम बना, उनके अधिकारों का हनन प्रारंभ हुआ( अंग्रेजो द्वारा आदिवासी क्षेत्रों को विषेष अधिसूचित क्षेत्र घोषित किया गया था, जहां पर उनके धर्म, रीतिरिवाज, परम्पराओं में अंग्रेजो का हस्तक्षेप नहीं था। ) भारत के संविधान में आदिवासी क्षेत्र को अधिसूचित कर पांचवीं व छठी अनूसूची क्षेत्र घोषित किया गया, व उनके अधिकारों को संवैधानिक सरंक्षण प्रदान किया गया, परंतु शासन-प्रषासन की इच्छाशक्ति के अभाव में आदिवासी आज भी अपने संवैधानिक अधिकारों के लिए व अपने संसाधनों के सरंक्षण के लिए संघर्षरत है।
ज्ञापन के मुख्य बिंदु:
अनुसूचित क्षेत्रों में स्वशासनः(1) अनुसूचित क्षेत्र में मध्यप्रदेश पंचायतराज अधिनियम को खारिज़ कर पेसा कानून के तहत मध्यप्रदेश अनुसूचित क्षेत्र पंचायत अधिनियम बनाकर ’’ग्राम सरकार’’ (धारा 4 (घ)) तथा स्वशासी जिला सरकार, (धारा 4(ण)) का गठन तथा सुसंगत नियमन बनाया जावे।
(2) पेसा कानून 1996, मध्यप्रदेष पेसा नियम 2022 व स्वषासन – अनुसूचित क्षेत्रों मे स्वषासन (हमारे ग्राम में हमारा राज): मध्यप्रदेष में पेसा कानून 1996 व मप्र पेसा नियम 2022 लागू हैं। पेसा कानून की मंषा के अनुरूप् पारंपरिक ग्रामसभा को सषक्त करते हुए ‘‘ स्वषासन ’’ व ग्राम-सरकार की स्थापना व उसका नियमों के माध्यम से क्रियान्वयन सुनिष्चित किया जावे।
3. मध्यप्रदेश में वन अधिकार मान्यता कानून का मिशन मोड में कार्यन्वयन किया जावे।
4. विस्थापन विहीन विकास:- आदिवासी क्षेत्रों में बड़ी विकास परियोजनाओ के कारण विस्थापन पर रोक लगाना और परियोजनाओ का लाभ हानी की पड़ताल एवं परियोजनाओ का अन्य स्थाई विकल्प की तलाश किया जाये।
5. आदिवासी समाज को बांध विरोधी प्रचारित किया जाता है, आदिवासी बांध विरोधी नहीं विकास का विरोधी नहीं, विस्थापन का विरोध करता है, छोटे बांध हो कम विस्थापन हो जिससे आदिवासी समाज की सामाजिक रीति रिवाज पंरपराओं का संरक्षण हो सके।
एंव रोजगार, श्रमिक, कर्मचारियों, महिलाओं , षिक्षा स्वास्थ्य, सामाजिक सुरक्षा, आदि 26 सूत्रीय मांग रखी गई।
इस अवसर पर अतिथिगणों के साथ ही ननकू सिंह परस्ते, भगवंता परस्ते, महेन्द्र सिंह परस्ते, ओमकार तिलगाम रूपसिंह मरावी, वीरेन्द्र तेकाम, अमर सिंह मार्को, पप्पू करचाम, सरपंचगण, सहित हजारों कार्यकर्ता कार्यक्रम में सम्म्लित रहे। कार्यक्रम का सफल संचालन वरिष्ठ समाज सेवी हरी सिंह मरावी ने किया इस अवसर पर 26 सूत्रीय मांग पत्र महाहिम राष्ट्रपति महोदया, राज्यपाल, माननीय प्रधानमंत्री एंव अन्य मंत्रालय तथा आयोग के नाम मंच पर ज्ञापन दिया गया ज्ञापन लेने के लिए जिला कलेक्टर की और से श्रीमान तहसीलदार उपस्थित रहे।
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