मध्यप्रदेश हाईकोर्ट ने अंतरिम भरण-पोषण (मेंटेनेंस) से जुड़े एक मामले में महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए स्पष्ट किया है कि भरण-पोषण कानून का उद्देश्य आर्थिक रूप से जरूरतमंद जीवनसाथी को सहायता उपलब्ध कराना है, न कि समान आर्थिक स्थिति वाले पक्ष को अतिरिक्त आर्थिक लाभ दिलाना। अदालत ने कहा कि जिस पत्नी की मासिक आय करीब 1.25 लाख रुपये है, उसके द्वारा पति से अंतरिम भरण-पोषण की मांग करना परिस्थितियों में उचित नहीं माना जा सकता।
हाईकोर्ट ने शेक्सपियर के ‘मर्चेंट ऑफ वेनिस’ का दिया संदर्भ
मामले की सुनवाई करते हुए जस्टिस विवेक जैन की एकलपीठ ने टिप्पणी की कि महिला की मांग प्रसिद्ध साहित्यकार विलियम शेक्सपियर के नाटक ‘मर्चेंट ऑफ वेनिस’ के उस प्रसंग की याद दिलाती है, जिसमें एक पात्र “एक पाउंड मांस” की मांग करता है। अदालत ने कहा कि इस मामले में पति से अंतरिम भरण-पोषण की मांग भी उसी प्रकार अनुचित आर्थिक लाभ लेने का प्रयास प्रतीत होती है, जिसकी अनुमति नहीं दी जा सकती।
क्या था पूरा मामला?
मामला भोपाल निवासी एक दंपती से जुड़ा है। दोनों के बीच तलाक की कार्यवाही लंबित है। इस दौरान पत्नी ने अंतरिम भरण-पोषण और मुकदमे के खर्च के लिए पारिवारिक न्यायालय (फैमिली कोर्ट) में आवेदन दिया था। उसका तर्क था कि उसकी आय पहले की तुलना में कम हो गई है, इसलिए उसे पति से आर्थिक सहायता मिलनी चाहिए।
हालांकि फैमिली कोर्ट ने उपलब्ध दस्तावेजों और आय संबंधी जानकारी के आधार पर यह आवेदन खारिज कर दिया। इसके बाद महिला ने इस आदेश को मध्यप्रदेश हाईकोर्ट में चुनौती दी।
महिला की आय पर कोर्ट की अहम टिप्पणी
सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने महिला की आय का रिकॉर्ड देखा। अदालत ने पाया कि महिला स्वयं नौकरी कर रही है और उसकी वार्षिक आय लगभग 14.81 लाख रुपये है, जो औसतन करीब 1.25 लाख रुपये प्रतिमाह बैठती है।
कोर्ट ने कहा कि इस आय के आधार पर महिला अपने भरण-पोषण में सक्षम है। ऐसे में अंतरिम भरण-पोषण देने का आधार नहीं बनता।
पति-पत्नी की आय में बड़ा अंतर नहीं
हाईकोर्ट ने अपने आदेश में यह भी उल्लेख किया कि दंपती की कोई संतान नहीं है, जिसकी जिम्मेदारी किसी एक पक्ष पर हो। साथ ही पति और पत्नी की आय में ऐसा बड़ा अंतर भी नहीं पाया गया जिससे महिला को आर्थिक रूप से पति पर निर्भर माना जा सके।
अदालत ने कहा कि जब दोनों पक्ष लगभग समान आर्थिक स्थिति में हों और पत्नी स्वयं सम्मानजनक आय अर्जित कर रही हो, तब अंतरिम भरण-पोषण का दावा कानून की मंशा के अनुरूप नहीं माना जा सकता।
फैमिली कोर्ट का आदेश बरकरार
इन सभी तथ्यों पर विचार करने के बाद मध्यप्रदेश हाईकोर्ट ने महिला की याचिका खारिज कर दी और फैमिली कोर्ट द्वारा पारित आदेश को सही ठहराया। अदालत ने स्पष्ट किया कि अंतरिम भरण-पोषण का प्रावधान केवल उन परिस्थितियों के लिए है, जहां किसी पक्ष को वास्तविक आर्थिक सहायता की आवश्यकता हो।