Saturday, 11 April

भोपाल। मध्यप्रदेश में बीजेपी की जीत हुई, लेकिन राजनीतिक जंग में शिवराज सिंह चौहान की हार हुई। बीते साढ़े पंद्रह साल से मध्य प्रदेश के सिंहासन पर बैठे शिवराज ने इस्तीफा तो सौंप दिया लेकिन बार बार उनका दर्द छलक छलक कर सामने आ रहा है। कहीं बहनों से लिपट कर रो रहे हैं तो कहीं कबीर के दोहे बोल रहे हैं। 

राजनीतिक जीवन में कुछ लोगों को खाली हाथ भी रह जाना पड़ता है। लेकिन शिवराज जैसे लोगों को उम्मीदों से बहुत ज्यादा मिला। युवा मोर्चा राष्ट्रीय अध्यक्ष से लेकर बीजेपी महासचिव, संसदीय बोर्ड, संसदीय दल के साथ ही कई अन्य प्रभार और फिर मध्य प्रदेश बीजेपी अध्यक्ष और उसके बाद एमपी के सबसे ज्यादा समय तक सीएम बनने का रिकॉर्ड शिवराज के नाम ही है। विधायक सांसद सब कुछ रहे। एक दो बार नहीं पूरे साढ़े पंद्रह साल सीएम रहना कम तो नहीं होता। और एक रिकॉर्ड तो केवल शिवराज के नाम ही है, वो ये कि हारने के बाद भी उन्हें सीएम का पद मिल गया। इससे बड़ी बात क्या हो सकती है। फिर भी पद छूटने का दर्द…! 

जस की टस तज दीनी चदरिया…। किसी और ने सीएम की शपथ ली तो शिवराज कबीर दास बन गए। इस बात से कोई इनकार नहीं कर सकता है कि एमपी के चुनाव में शिवराज सिंह एक बड़ा फैक्टर रहे हैं। अब ऐसे में किसी और सीएम को देखकर एमपी की जनता को भी काफी हैरानी हुई है। दुख भी दिख रहा है और दर्द भी झलक रहा है। 

उनका ये कथन भी गले नही उतरा.. “एक बात मैं बड़ी विनम्रता के साथ कहता हूं, अपने लिए कुछ मांगने से बेहतर, मैं मरना पसंद करूँगा. वह मेरा काम नहीं है और इसी वजह से मैंने कहा था कि मैं दिल्ली नहीं जाऊंगा.” अब और क्या महत्वाकांक्षा बची ? क्या पीएम भी बनना चाह रहे हैं? शिवराज के इस बयान से साफ़ जाहिर हो रहा है कि उन्हें उम्मीद थी कि पार्टी उन्हें फिर से प्रदेश की कमान सौंपेगी या फिर दिल्ली जाने की इच्छा? 

लेकिन ऐसा नहीं हुआ और शिवराज सिंह की इच्छा शायद दबी रह गयी। शिवराज ने पहले तो इसे पार्टी का फैसला मानकर स्वीकार कर लिया लेकिन अब उनका दर्द छलक कर बहार आ गया है. इससे ये भी जाहिर होता है कि महत्वाकांक्षाओं को अंत नहीं होता।

कबीर के दोहे के मार्फत शिवराज ने ये बताने का प्रयास किया है कि उन्होंने कुछ किया नहीं, कुछ लिया नहीं। अब ये सब जानते हैं कि शिवराज ने और उनके परिवार में क्या क्या कर लिया है। और सरकार की बात करें तो दिग्विजय, जिन्हे पूरी बीजेपी मिस्टर बंटाधार कहती आई है, उनकी सरकार ने तीस हजार करोड़ से कम कर्ज छोड़ा था, शिवराज ने कथित विकास किया और पौने चार लाख करोड़ का कर्ज चढ़ा दिया। अब ये कैसी जस की तस चदरिया छोड़ी है…? महिला अपराध, बेरोजगारी, प्रशासनिक अराजकता, किसानों की अनगिनत समस्याएं, महंगाई, जैसे वो मुद्दे जिनके बावजूद बीजेपी जनता को मूर्ख बना कर जीत हासिल करती आ रही है, शिवराज सरकार की देन है। 

अब एक तरफ कबीर का दोहा और दूसरी तरफ राजनीतिक महत्वाकांक्षा का बार बार छलकता दर्द…व्यक्तिगत उपलब्धियों का अंबार.. फिर भी और पाने की इच्छा…! शायद यही इंसान होने का अर्थ है। फिलहाल शिवराज की राजनीतिक विदाई का क्षण उनके बयानों से तो लग ही रहा है.. नेता रिटायर नहीं होते…हां, ये बड़े ….. होकर कूंचे से निकलते दिख रहे हैं। 

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