हाल ही में संपन्न पांच राज्यों के चुनाव में से तीन राज्यों में चुनाव प्रचार के दौरान कांग्रेस ने अन्य मुद्दों के साथ ही जातिगत जनगणना के मुद्दे को आक्रामक ढंग से उठाया, परंतु इसमें कांग्रेस को खास फायदा नहीं मिला। चुनाव परिणाम तो बताते हैं कि यह मुद्दा वोटरों के फैसले को निर्णायक ढंग से प्रभावित नहीं कर सका। इसके बाद से माना जा रहा है कि अब शायद इस मुद्दे को पहले जितनी अहमियत न मिले। लेकिन यह देखना दिलचस्प है कि परोक्ष रूप में ही सही, यह मुद्दा विपक्ष के साथ ही सत्ता पक्ष में भी अपनी अहमियत बनाए हुए है।
कांग्रेस में विशेष तौर पर कर्नाटक के अंदर इस पर उलझन बरकरार है। यही सवाल पिछले दिनों राज्यसभा में बहस के दौरान बीजेपी की ओर से उठाया गया कि कर्नाटक सरकार आखिर कास्ट सर्वे की रिपोर्ट को सार्वजनिक क्यों नहीं कर पा रही। यह कोई छुपी हुई बात नहीं है कि वहां मुख्यमंत्री सिद्दारमैया और उपमुख्यमंत्री डीके शिवकुमार इस मसले पर अलग-अलग राय रखते हैं।
राज्यसभा में कांग्रेस अध्यक्ष खरगे ने यह कहकर परोक्ष रूप से शिवकुमार पर भी आक्षेप किया कि जब भी ऐसा मुद्दा सामने आता है, तो सवर्ण जातियों के नेता एकजुट हो जाते हैं और सब मिलकर इसका विरोध करते हैं। इसके बाद हालांकि डीके शिवकमुार ने यह स्पष्टीकरण दिया कि वह जातिगत आधार पर सर्वे की रिपोर्ट सार्वजनिक किए जाने का विरोध नहीं कर रहे हैं, परंतु यह अवश्य चाहते हैं कि यह काम व्यवस्थित और वैज्ञानिक तरीके से हो।
दिलचस्प है कि इस स्ष्टीकरण से एक बार फिर इस बात की पुष्टि हुई कि उनका रुख जातिगत सर्वेक्षण की रिपोर्ट को अटकाने वाला ही है। इसके पीछे कारण भी है। वहां राजनीतिक तौर पर सबसे ज्यादा ताकतवर मानी जाने वाली दो प्रमुख जातियां – वोक्कालिगा और लिंगायत समुदाय इसके विरोध में हैं।
कांग्रेस नेता राहुल गांधी यह कहते रहे हैं कि उनकी पार्टी देशभर में जातिगत जनगणना करवाएगी। ऐसे में इस मसले पर पीछे हटने की ज्यादा गुंजाइश कांग्रेस के सामने नहीं रह गई है। लेकिन देखना होगा कि कर्नाटक में वह इस रिपोर्ट को लटकाए रखने के अलावा भी कोई हल निकाल पाती है या नहीं। अगर वह कर्नाटक के अंतर्विरोध को दूर करने का कोई प्रभावी रास्ता ढूंढ लेती है तो अगले चुनाव में इसे ज्यादा कारगर और विश्वसनीय ढंग से उठा सकती है वरना इसकी चुनावी प्रासंगिकता और कम होती जाएगी।
मध्यप्रदेश जैसे राज्य में जहां ओबीसी यानि पिछड़ा वर्ग पचास प्रतिशत से अधिक है, वहां भी जातिगत जनगणना और ओबीसी आरक्षण का मुद्दा कांग्रेस को बहुत अच्छे परिणाम नहीं दे पाया। जहां तक बीजेपी की बात है तो इस मुद्दे से दूरी बनाए रखते हुए भी वह ओबीसी वोट को साधने की समानांतर कोशिशें जारी रखे हुए है। मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ में बीजेपी ने जो मुख्यमंत्री और उप-मुख्यमंत्री बनाए हैं, उसका मकसद लोकसभा चुनाव में जातीय समीकरण को साधना ही है।
लेकिन दूसरी तरफ कांग्रेस ओबीसी का मुद्दा तो उठाती है, लेकिन मध्यप्रदेश जैसे बड़े राज्य में ओबीसी को नेतृत्व देने से कतराती आ रही है। कमलनाथ, दिग्विजय सिंह जैसे बड़े नेता पिछड़ी जातियों की बात करते हैं, परंतु पूरा रिमोट अपने हाथ में ही रखते हैं। पदों की दौड़ में ही अगड़े आगे रहते हैं। कमलनाथ ने तो पूर्व में प्रदेश अध्यक्ष और नेता प्रतिपक्ष दोनों ही पद अपने पास रखे हुए थे। इस बार भी वो खुद ही मुख्यमंत्री पद के दावेदार थे, दूसरी तरफ भाजपा ने लगातार बीस साल से केवल ओबीसी को ही सीएम बनाया है।
कांग्रेस के जातिगत सर्वे और ओबीसी की महिलाओं के आरक्षण का मुद्दा फ्लाप होने का एक बड़ा कारण यह भी है। ये कहते कुछ हैं और करते कुछ। पिछला इतिहास देखें तो भी कांग्रेस ने एक बार आदिवासी मुख्यमंत्री का मुद्दा उठाया और अगड़ा मुख्यमंत्री बनाया। एक बार ओबीसी के नाम पर शुक्ल बंधुओं को दौड़ में पछाड़ दिया, लेकिन दिग्विजय सिंह की ताजपोशी कर दी गई। टिकट वितरण के मामले में भी हमेशा से कांग्रेस में ऐसा ही होता आया है। इसलिए कांग्रेस को पहले ओबीसी आरक्षण या जातिगत जनगणना का मामला तब उठाना फायदेमंद साबित होगा, जब वो इन पर खुद अमल करे। नहीं तो भाजपा या अन्य पार्टियां लाभ उठाती रहेंगी और कांग्रेस केवल मुद्दे उठाती रह जाएगी।
– संजय सक्सेना

