हमारे युवाओं की एक चौथाई ग्रामीण आबादी ऐसी है, जो पढ़ रहे हैं, लेकिन अपनी क्षेत्रीय भाषा में कक्षा दो स्तर की पाठ्य सामग्री भी धाराप्रवाह नहीं पढ़ सकते हैं। जबकि हम आज जब ग्रामीण भारत की बात करते हैं तो तमाम ऐसे दावे सामने आते हैं, जिनसे लगता है कि हम वाकई विकसित देश का हिस्सा बन रहे हैं। आज ही छपी एक सर्वे रिपोर्ट के आंकड़ों ने हमें न केवल आइना दिखा दिया है, अपितु तमाम दावों की पोल भी खोल दी है।
अंतरराष्ट्रीय स्तर की सर्वे रिपोर्ट और शोध को तो हम सिरे से नकार देते हैं। उन्हें भारत के प्रति साजिश का हिस्सा कह देते हैं। लेकिन ये तो हमारी ही एक वार्षिक रिपोर्ट के आंकड़े हैं। यह है एनुअल स्टेटस ऑफ एजुकेशन रिपोर्ट (ग्रामीण) 2023- बियॉन्ड बेसिक्स। पहले रिपोर्ट की बात करते हैं, जिसमें कहा गया है कि 14 से 18 आयु वर्ग में 86.8 प्रतिशत युवा किसी न किसी शैक्षणिक संस्थान में नामांकित भी हैं और अपनी पढ़ाई कर रहे हैं। लडक़े और लड़कियों के नामांकन करीब-करीब बराबर हैं और अंतर कम है। लेकिन, आयु के हिसाब से देखें तो यह गैप ज्यादा नजर आता है। इस आयु वर्ग में करीब 13 प्रतिशत युवा जो पढ़ाई नहीं कर रहे हैं, उनके ज्यादा उम्र के छात्रों की संख्या है। 14 वर्ष के 3.9 प्रतिशत और 18 वर्ष के 32.6 प्रतिशत छात्र नामांकित नहीं है। इस सर्वे में ग्रामीण भारत में छात्रों की स्कूली शिक्षा और सीखने की स्थिति की तस्वीर बयां की गई है। यह सर्वे 26 राज्यों के 28 जिलों में किया गया और 34,745 युवाओं तक इस सर्वे की पहुंच रही।
यह रिपोर्ट कहती है कि ग्रामीण युवाओं की पसंद आर्ट्स विषय ही हैं। 14 से 18 आयु वर्ग में ज्यादातर छात्र आर्ट्स और ह्यूमैनिटीज विषयों की पढ़ाई कर रहे हैं। उसके बाद साइंस का नंबर आता है। कक्षा 11-12 में 55.7 प्रतिशत ग्रामीण युवाओं की पसंद आर्ट्स विषय ही हैं। साइंस-टेक्नॉलजी-इंजिनियरिंग एंड मैथमैटिक्स में 31.7 प्रतिशत छात्रों की रुचि है। ग्रामीण छात्रों में कॉमर्स को चुनने वालों की संख्या मात्र 9.4 प्रतिशत है, जबकि दिल्ली विश्वविद्यालय में कॉमर्स विषयों में दाखिले के लिए खासी मारामारी देखने को मिलती है। गणित विषयों में नामांकन करवाने वालों में लडक़ों की संख्या 36.3 प्रतिशत है, जबकि लड़कियों का आंकड़ा 28.1 प्रतिशत है।
सर्वे में एक और खास बात निकलकर सामने आई है कि वोकेशनल ट्रेनिंग में अभी ग्रामीण युवा पीछे हैं। सर्वे में शामिल युवाओं में केवल 5.6 प्रतिशत ही वोकेशनल ट्रेनिंग ले रहे है और हम कागजों पर वोकेशनल ट्रेनिंग के नाम पर करोड़ों का खर्च दिखा रहे हैं। हजारों संगठनों को अनुदान दिया जा रहा है। कॉलेजों में पढऩे वाले 16.2 प्रतिशत युवा वोकेशनल ट्रेनिंग ले रहे हैं और ज्यादातर 6 महीने का कोर्स कर रहे हैं। सरकार वोकेशनल ट्रेनिंग को गांवों तक ले जाने की कई अहम योजनाओं पर काम कर रही है। पिछले साल की रिपोर्ट के अनुसार, 6 से 14 वर्ष की आयु वर्ग के छात्रों के पंजीकरण का स्तर 2010 में 96.6 प्रतिशत, 2014 में 96.7 प्रतिशत और 2018 में 97.2 प्रतिशत से बढक़र 2022 में 98.4 प्रतिशत हो गया है।
हालांकि रिपोर्ट में इस आशंका को निराधार बताया गया है कि कोविड-19 महामारी के दौरान आजीविका का साधन नहीं होने के कारण छात्रों ने स्कूल छोड़ दिया था। लेकिन कई जगह यह भी सच्चाई ही है। सर्वे में शामिल किए गए युवाओं को बुनियादी चीजें पढऩे, गणित और अंग्रेजी पढऩे को कहा गया। आधे से ज्यादा युवा डिविजन (3 अंक से 1 अंक) का सवाल नहीं कर पाते हैं, सिर्फ 43.3 प्रतिशत छात्र यह सवाल सही कर पाए, जबकि इस तरह के सवाल करने की क्षमता कक्षा 3 या 4 में होनी चाहिए। करीब 57.3 प्रतिशत अंग्रेजी में वाक्य पढ़ सकते हैं और इनमें से तीन चौथाई (73.4 प्रतिशत) उनका अर्थ बता सकते हैं। बेसिक लर्निंग पर अभी भी बहुत ज्यादा ध्यान दिए जाने की जरूरत है। लडक़ों (70.9 प्रतिशत) के मुकाबले ज्यादा लड़कियां (76प्रतिशत) अपनी भाषा में कक्षा 2 स्तर का पाठ पढ़ सकती हैं। इसके विपरीत गणित और अंग्रेजी में लडक़ों का प्रदर्शन थोड़ा बेहतर रहा है। युवाओं को ओआरएस पैकेट पर दिए निर्देश पर आधारित कुछ सवाल पूछे गए, लगभग दो तिहाई युवाओं ने 4 में से 3 सवालों का जवाब दिया।
मजे की बात यह है कि जो लोग न तो ठीक से गणित का सवाल हल कर पाते हैं, न ठीक से हिंदी या क्षेत्रीय भाषा पढ़ पाते हैं, वो स्मार्ट फोन चलाने में माहिर हैं। इस रिपोर्ट में बताया गया है कि करीब 90 प्रतिशत युवाओं के घर में स्मार्टफोन हैं और उतने ही युवा इसका प्रयोग करना जानते हैं। लड़कियों (19.8 प्रतिशत) की तुलना में दोगुने से अधिक लडक़ों (43.7प्रतिशत) के पास खुद का स्मार्टफोन है। 90.5 प्रतिशत सोशल मीडिया का प्रयोग कर रहे हैं और सुरक्षा संबंधित सेटिंग्स के बारे में ज्यादातर छात्र जानते हैं। एक अच्छी बात यह है कि दो तिहाई ने स्मार्टफोन का प्रयोग पढ़ाई से संबंधित गतिविधियों के लिए किया। वहीं, जिनके घर पर कंप्यूटर या लैपटॉप है, उनकी संख्या करीब 9 प्रतिशत ही है।
कुल मिलाकर ये सर्वे कई मायनों में महत्वपूर्ण कहा जा सकता है। हम जिस तरह से अपनी शिक्षा पद्धति में बदलाव करते जा रहे हैं, उसका मूल्यांकन भी हो रहा है। यानि हम क्या पढ़ा रहे हैं? ये सर्वे बता रहा है। या तो हमारी पद्धति ठीक नहीं है या फिर हम उसे जमीन पर आज भी नहीं उतार पा रहे हैं। बचाव के लिए यह भी कहा जा सकता है कि सर्वे सैम्पल के आधार पर होते हैं, लेकिन योजना का मूल्यांकन करना हो तो सर्वे ही एक माध्यम होता है। हां, हम चाहें तो इन आंकड़ों को सही मानकर कमजोरी दूर करने का प्रयास भी कर सकते हैं। और मूल्यांकन इसका भी होना चाहिए कि जिन विभागोंं या संगठनों को हम करोड़ों-अरबों रुपए दे रहे हैं, उनकी उपलब्धि का सही प्रतिशत क्या है? क्या ये रिपोर्ट उनकी लापरवाही और उनके भ्रष्टाचार की कहानी नहीं कह रही है? क्या ये रिपोर्ट सरकारी उपलब्धियों को कागजी साबित करने के लिए पर्याप्त नहीं है?
– संजय सक्सेना

