राहुल गांधी ने विदेश यात्रा के दौरान हालांकि एक बार फिर भारत में लोकतंत्र कमजोर होने का बयान दिया, लेकिन रूस और यूके्रन के मामले में उन्होंने मोदी सरकार के कदमों का समर्थन किया और कहा कि विपक्ष की सरकार होती तो वह भी लगभग यही नीति अपनाती। एक दूसरी घटना पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के इंटरव्यू के रूप में सामने आई, जिसमें भारत जिस दिशा में आगे बढ़ रहा है, उसके बारे में उन्होंने कुल मिलाकर आशावादी नजरिया ही जाहिर किया। इतना जरूर कहा कि देश में अगर सामाजिक मेलजोल का माहौल रहे तो वह और बेहतर प्रदर्शन कर सकता है।
हालांकि इन्हीं मनमोहन सिंह की आर्थिक नीतियों की तत्कालीन विपक्ष ने जमकर आलोचना की थी और संसद में लगातार हंगामा भी किया गया था। देखा जाए तो यह सब भारतीय राजनीति के लिए कोई नई बात नहीं है। विदेश नीति और रणनीतिक मामलों में सत्ता पक्ष और मुख्य विपक्ष के बीच पहले भी एक सहमति देखी गई है। लेकिन हाल के दिनों में, हमारी राजनीति में इतना विभाजन और ध्रुवीकरण होता दिखने लगा है कि कही जाने वाली चंद सामान्य बातें भी अब सुर्खियों के काबिल मानी जा सकती हैं। यह देखने वाली बात है कि वाजपेयी दौर के बाद से ही कांग्रेस और भाजपा के रिश्ते में खटास पैदा होने लगी थी। आडवाणी दौर में शुद्ध कटुता हावी होती दिखने लगी थी।
2005 से 2008 के बीच भारत-अमेरिका परमाणु संधि के मामले में सही बात तो यह थी कि यूपीए सरकार ने वाजपेयी सरकार के कदम को ही आगे बढ़ाया, लेकिन विपक्ष में आई भाजपा ने इसे आत्मसमर्पण मान लिया और इस संधि को लेकर सरकार के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव के पक्ष में वोट भी दिया। संसद में उस समय सुषमा स्वराज ने कहा था, यह संधि वैसी ही है जैसी मुगल बादशाह जहांगीर ने ईस्ट इंडिया कंपनी को भारत में कारोबार करने की इजाजत दी थी। बाद में खुद मोदी सरकार उसी नीति पर आगे बढ़ती देखी गई।
इसी तरह, भाजपा ने भारत-बांग्लादेश सीमा समझौते में भी अड़ंगा लगाया था। इस समझौते के तहत दोनों देश अपने-अपने अंदरूनी क्षेत्र में बसी बस्तियों का आदान-प्रदान करने वाले थे। भाजपा इसके पीछे के तर्क को, या यह भी समझने को राजी नहीं थी कि इस समझौते के तहत शेख हसीना की अवामी लीग सरकार को मजबूती देने और इस प्रक्रिया में अपने एक सीमा विवाद को निपटाना भारत के ही व्यापक हित में था। आज मोदी सरकार भी उसी नीति को अपनाते दिख रही है। यहां एक मामले का उदाहरण और दिया जा सकता है, वो है एफडीआई का। मनमोहन के समय भाजपा ने इस कदम का जोरदार विरोध किया और इसे भारत की आर्थिक आजादी पर हमला बताया। उसने पड़ोस की परचून की दुकानों के भविष्य को लेकर चिंता जताते हुए इस कदम के खिलाफ संसद में वोट देकर इसे रोक दिया। लेकिन यह आर्थिक दृष्टि से महत्वपूर्ण कदम बताया जा रहा था।
और विशेषज्ञों की नजर में भारत आज अगर आर्थिक ताकत है तो ऐसे कदमों की ही वजह से।
अब करीब एक दशक बाद मल्टीपल ब्रांड रिटेल वाले मामले का क्या हुआ? प्रतिबंधों को एक-एक करके खत्म या हल्का कर दिया गया। और ई-कॉमर्स के मामले में भी सरकार उसी रास्ते पर चल रही है। चाहे वह ग्लोबल मार्केट लीडर अमेजॉन हो या विदेशी पैसे से चलने वाले स्टार्टअप, भारत में खुलकर कारोबार कर ही रहे हैं। आज की सरकार में बैठे उसी पार्टी के लोग अब ये नहीं कहते कि हमारी किराने की दुकान का क्या होगा? अब वे इसे विश्व गुरू बनने की नीति मानते हैं। यूक्रेन-रूस मसले पर यदि राहुल गांधी ने और कांग्रेस ने मोदी सरकार का समर्थन किया है, तो यह मिसाल मानी जा सकती है। लेकिन सत्तापक्ष की तरफ से विपक्ष का जो व्यवहार एकदम दुश्मन की तरह से होता जा रहा है, यह ठीक नहीं है। वह एकला चलो की तर्ज पर चल रही है, जो कि किसी भी लोकतंत्र में नहीं होता। होना भी नहीं चाहिए।
लोकतंत्र में सत्तापक्ष की अहमियत होती है तो विपक्ष की भूमिका भी उससे कम महत्वपूर्ण नहीं होती। अब यदि राहुल गांधी लोकतंत्र कमजोर होने की बात करते हैं, तो क्या गलत करते हैं। हाल में हुए जी 20 सम्मेलन के दौरान अमेरिका से आए मीडिया के लोगों की निराशा की देश के बाहर चली खबरें इसके लिए काफी हैं। हम कूप मंडूक बने केवल वही देख पा रहे हैं जो हमें सत्तापक्ष दिखाना चाहता है। और गोदी मीडिया भी। बाइडेन को भारत के रुख के चलते विएतनाम में जाकर प्रेस कान्फें्रस करनी पड़ी। भारत में जी 20 के दौरान प्रेस कान्फ्रेंस को लेकर व्हाइट हाउस तक से अनुरोध किया गया था, लेकिन भारत की तरफ से साफ इंकार कर दिया गया। शायद यहां के शासक किसी सवाल का सामना करने के लिए तैयार नहीं थे। दुनिया भर के तमाम मीडिया ने इसकी आलोचना की। विपक्ष को साथ लेकर चलने की बात नहीं है, किसी मुद्दे पर सहमति के प्रयास तो होने चाहिए। ये भावना जब तक हम पैदा नहीं करेंगे, लोकतंत्र की बात करना बेमानी है। यदि आलोचना को विरोध या देशद्रोह तक की भावना से देखेंगे, तो कुछ नहीं होगा। जनता भी आज नहीं तो कल, जागेगी जरूर।
– संजय सक्सेना
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