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देश के मशहूर सैनिटरी पैड में कैंसर पैदा करने वाले हानिकारक रसायन:रिपोर्ट

देश के मशहूर सैनिटरी पैड में कैंसर पैदा करने वाले हानिकारक रसायन:रिपोर्ट



नईदिल्ली
दो दिन पहले महिलाओं के बारे में एक रिपोर्ट आई. जिसमें स्वीडिश एनजीओ इंटरनेशनल पॉल्युटेंट्स इलिमिनेशन नेटवर्क (IPEN) ने लोकल संस्था टॉक्सिक लिंक के साथ मिलकर हिंदुस्तान में बनते सैनिटरी पैड्स की जांच की, और पाया कि इनमें जहर होता है. वो भी कोई ऐसा वैसा नहीं बल्कि कैंसर पैदा करने वाला जहर.

अध्ययन में पाया गया कि देश में इन रसायनों के उपयोग को सीमित करने के लिए किसी अनिवार्य नियम के अभाव में निर्माता मुश्किल से उन दीर्घकालिक प्रतिकूल प्रभावों पर ध्यान देते हैं जो इन रसायनों के चलते महिलाओं के स्वास्थ्य पर पड़ते हैं.

‘रैप्ड इन सीक्रेसी’ शीर्षक वाली यह रिपोर्ट एक विस्तृत जांच पेश करती है जो शोधकर्ताओं ने दो विशिष्ट रसायनों- थैलेट्स और वाष्पशील कार्बनिक यौगिक (वोलेटाइल ऑर्गेनिक कंपाउंड- वीओसी) की मौजूदगी का पता लगाने के लिए की थी.

थैलेट्स का उपयोग विभिन्न उत्पादों में प्लास्टिसाइज़र के रूप में किया जाता है. प्लास्टिसाइज़र वो रसायन होते हैं जो उत्पाद को नरम, लचीला बनाने और सतह पर इसके घर्षण को कम करने के लिए प्रयोग किए जाते हैं. इन्हें लगभग एक सदी से विभिन्न प्लास्टिक उत्पादों में उपयोग किया जाता रहा है.

रिपोर्ट के लेखकों का दावा है कि उनका उपयोग सैनिटरी पैड में उनकी विभिन्न परतों को जोड़ने और उनकी इलास्टिसिटी (लोच) बढ़ाने के लिए किया जाता है. शोधकर्ताओं ने बाजार में उपलब्ध 10 विभिन्न प्रकार के सैनिटरी पैड- ऑर्गेनिक और इनऑर्गेनिक – को जांचा. उन्होंने रिपोर्ट में इनमें से हर एक उत्पाद के लिए मिली थैलेट और वीओसी की मात्रा को अलग-अलग पेश किया है.

रिपोर्ट बताती है कि भारत में सबसे अधिक बिकने वाले दो सैनिटरी पैड में छह प्रकार के थैलेट होते हैं. थैलेट्स की कुल मात्रा 10 से 19,600 माइक्रोग्राम प्रति किलोग्राम तक थी और इन उत्पादों में कुल 12 तरह के अलग-अलग थैलेट पाए गए.

विभिन्न वैज्ञानिक अध्ययनों का हवाला देते हुए रिपोर्ट में थैलेट्स से होने सकने वाले कई स्वास्थ्य खतरों की ओर इशारा किया गया है. इसमें एंडोमेट्रियोसिस, गर्भावस्था से संबंधित जटिलताएं, भ्रूण के विकास में मुश्किल, इंसुलिन रेसिस्टेन्स, उच्च रक्तचाप जैसी कई समस्याएं शामिल हैं. हालांकि, यह रिपोर्ट में यह नहीं बताया गया है कि इसके प्रभाव कितने स्पष्ट हो सकते हैं.

रिपोर्ट के लेखकों में से एक प्रीति महेश ने बताया कि इस दस्तावेज़ में किसी भी तरह से यह दावा नहीं किया गया है कि केवल सैनिटरी पैड्स से ही कोई थैलेट्स के संपर्क में आता है. उन्होंने बताया, ‘कई अन्य तरीकों से भी यह जोखिम संभव है, लेकिन योनि के ऊतक की त्वचा बाकी ऊतकों की तुलना में अधिक संवेदनशील होती है.’

यह पूछे जाने पर कि क्या थैलेट्स का कोई विकल्प नहीं है, प्रीति, जो टॉक्सिक्स लिंक के चीफ प्रोग्राम कोऑर्डिनेटर भी हैं, ने द वायर को बताया, ‘है तो, लेकिन थैलेट्स सबसे आसानी से उपलब्ध हैं. चूंकि कोई विनियमन नहीं है, इसलिए उद्योगों की ओर से अन्य विकल्पों पर विचार करने का कोई प्रयास नहीं किया गया है.’

उन्होंने आगे कहा, ‘क्या थैलेट्स के विकल्प उत्पादन की प्रक्रिया को बदल देंगे या पैड से उन्हें हटाने पर उनकी बुनियादी कार्यक्षमता प्रभावित होगी- ये दो ऐसे सवाल हैं जिनसे उद्योग दो-चार हैं.’

टॉक्सिक्स लिंक्स ने रिपोर्ट जारी करने से पहले इन कंपनियों को नहीं लिखा था. प्रीति महेश ने कहा कि रिपोर्ट जारी होने के बाद अब ऐसा करेंगे.

सैनिटरी पैड में थैलेट की उपस्थिति को कई अन्य अध्ययनों में भी रेखांकित किया गया है, लेकिन लगभग सभी अध्ययन भारत के बाहर बेचे जाने वाले उत्पादों के लिए किए गए थे. 2020 में प्रकाशित एक रिपोर्ट ने संयुक्त राष्ट्र अमेरिका में बेचे जाने वाले पैड में इन हानिकारक रसायनों की मौजूदगी के बारे में बताया था. 2020 में ही प्रकाशित एक अन्य अध्ययन में चीन में बेचे जाने वाले मासिक धर्म संबंधी उत्पादों के लिए भी इसी तरह के निष्कर्ष मिले थे. इन दो अध्ययनों के अलावा रिपोर्ट में ऐसे कई अध्ययनों को शामिल किया गया है.

रिपोर्ट के लेखकों ने यह स्पष्ट किया कि परीक्षण किए गए सभी नमूनों में मौजूद थैलेट यूरोपीय संघ द्वारा निर्धारित सीमा के भीतर थे.

नैपकिन में पाए जाने वाला एक चिंताजनक रसायन वीओसी भी है. ये रसायन हवा में आसानी से वाष्पित हो जाते हैं. इनका इस्तेमाल ज्यादातर पेंट, डिओडोरेंट, एयर फ्रेशनर, नेल पॉलिश, कीटनाशक, ईंधन और ऑटोमोटिव उत्पादों में होता है और उनमें से कुछ सेहत पर प्रतिकूल प्रभाव डाल सकते हैं. रिपोर्ट के लेखकों का कहना हैं कि सैनिटरी नैपकिन में इन्हें सुगंध के लिए प्रयोग किया जाता है.

रिपोर्ट के लेखकों में से एक प्रीति महेश ने बताया कि इस दस्तावेज़ में किसी भी तरह से यह दावा नहीं किया गया है कि केवल सैनिटरी पैड्स से ही कोई थैलेट्स के संपर्क में आता है. उन्होंने बताया, ‘कई अन्य तरीकों से भी यह जोखिम संभव है, लेकिन योनि के ऊतक की त्वचा बाकी ऊतकों की तुलना में अधिक संवेदनशील होती है.’

यह पूछे जाने पर कि क्या थैलेट्स का कोई विकल्प नहीं है, प्रीति, जो टॉक्सिक्स लिंक के चीफ प्रोग्राम कोऑर्डिनेटर भी हैं, बताया, ‘है तो, लेकिन थैलेट्स सबसे आसानी से उपलब्ध हैं. चूंकि कोई विनियमन नहीं है, इसलिए उद्योगों की ओर से अन्य विकल्पों पर विचार करने का कोई प्रयास नहीं किया गया है.’

उन्होंने आगे कहा, ‘क्या थैलेट्स के विकल्प उत्पादन की प्रक्रिया को बदल देंगे या पैड से उन्हें हटाने पर उनकी बुनियादी कार्यक्षमता प्रभावित होगी- ये दो ऐसे सवाल हैं जिनसे उद्योग दो-चार हैं.’

टॉक्सिक्स लिंक्स ने रिपोर्ट जारी करने से पहले इन कंपनियों को नहीं लिखा था. प्रीति महेश ने कहा कि रिपोर्ट जारी होने के बाद अब ऐसा करेंगे.

सैनिटरी पैड में थैलेट की उपस्थिति को कई अन्य अध्ययनों में भी रेखांकित किया गया है, लेकिन लगभग सभी अध्ययन भारत के बाहर बेचे जाने वाले उत्पादों के लिए किए गए थे. 2020 में प्रकाशित एक रिपोर्ट ने संयुक्त राष्ट्र अमेरिका में बेचे जाने वाले पैड में इन हानिकारक रसायनों की मौजूदगी के बारे में बताया था. 2020 में ही प्रकाशित एक अन्य अध्ययन में चीन में बेचे जाने वाले मासिक धर्म संबंधी उत्पादों के लिए भी इसी तरह के निष्कर्ष मिले थे. इन दो अध्ययनों के अलावा रिपोर्ट में ऐसे कई अध्ययनों को शामिल किया गया है.

रिपोर्ट के लेखकों ने यह स्पष्ट किया कि परीक्षण किए गए सभी नमूनों में मौजूद थैलेट यूरोपीय संघ द्वारा निर्धारित सीमा के भीतर थे.

नैपकिन में पाए जाने वाला एक चिंताजनक रसायन वीओसी भी है. ये रसायन हवा में आसानी से वाष्पित हो जाते हैं. इनका इस्तेमाल ज्यादातर पेंट, डिओडोरेंट, एयर फ्रेशनर, नेल पॉलिश, कीटनाशक, ईंधन और ऑटोमोटिव उत्पादों में होता है और उनमें से कुछ सेहत पर प्रतिकूल प्रभाव डाल सकते हैं. रिपोर्ट के लेखकों का कहना हैं कि सैनिटरी नैपकिन में इन्हें सुगंध के लिए प्रयोग किया जाता है.

25 प्रकार के वीओसी जांचने के लिए दस सैनिटरी नैपकिन उत्पादों का टेस्ट किया गया. रिपोर्ट में बताया गया है कि इन 25 वीओसी में से  दिमागी कामकाज को प्रभावित करने से लेकर त्वचा की सूजन, एनीमिया, लीवर और किडनी की कमजोरी से लेकर थकान और बेहोशी तक कई हानिकारक प्रभाव देखे जा सकते हैं.

टॉक्सिक्स लिंक के शोधकर्ताओं ने सभी जांचे गए उत्पादों में वजन [उत्पाद के] के अनुसार 1-690 माइक्रोग्राम प्रति किलोग्राम की सीमा में वीओसी का पता लगाया. दो सबसे लोकप्रिय उत्पादों में 14 वीओसी पाए गए. कुछ ऑर्गनिक पैड में इनऑर्गेनिक की तुलना में अधिक वीओसी मिले.

दोबारा, सैनिटरी नैपकिन में वीओसी की मैजूदगी के टेस्ट करने वाला यह पहला अध्ययन नहीं था, लेकिन पहले किए गए सभी अध्ययन भारत के बाहर बेचे जाने वाले उत्पादों पर किए गए थे. 2020 में प्रकाशित एक अध्ययन अमेरिका में किया गया था, जिसमें जांचे गए सभी महिला हाइजीन उत्पादों में वीओसी पाए गए. इस रिपोर्ट में ऐसे कई और अध्ययनों का भी हवाला दिया गया है.

2017 में दक्षिण कोरिया में महिलाओं के एक बड़े समूह ने कथित तौर पर वीओसी होने को लेकर नैपकिन बनाने वाली एक फर्म के खिलाफ मुकदमा दायर किया था. उनके आंदोलन के परिणामस्वरूप उत्पाद को बाजार से वापस ले लिया गया था. अमेरिका में महिलाओं के एक अन्य समूह ने 2014 में शुरू की गई एक जांच को लेकर भी इसी तरह के निष्कर्ष जारी किए.

औरतें पीरियड्स बंद करवा रही हैं. लगभग पूरे पश्चिम में मेन्सट्रुअल सप्रेशन का चलन आ गया है. पहला पीरियड आने के बाद कभी भी लड़की उसे रुकवा सकती है. हर महीने खून बहाकर, एनिमिक होकर, प्रेग्नेंसी झेलने का कोई मतलब नहीं. कोई मतलब नहीं, जब पीरियड्स के दर्द को नए जमाने का चोंचला कहकर मजाक बनाया जाए. या फिर खून-सोख्ता पैड में खतरनाक केमिकल भर दिया जाए कि औरत मर भी जाए तो किसे फर्क पड़ेगा.



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