हर साल जुलाई आते ही देशभर के लाखों टैक्सपेयर्स इनकम टैक्स रिटर्न (ITR) दाखिल करने की तैयारी में जुट जाते हैं। फॉर्म 16, एनुअल इंफॉर्मेशन स्टेटमेंट (AIS), फॉर्म 26AS और बैंक स्टेटमेंट जैसे दस्तावेजों की जांच के बीच हाल ही में हेलिओस कैपिटल के संस्थापक समीर अरोड़ा का एक बयान चर्चा में आ गया। उन्होंने कहा कि सिंगापुर में टैक्स रिटर्न भरने में केवल पांच मिनट लगते हैं। इस टिप्पणी के बाद सोशल मीडिया पर भारत और दूसरे देशों के टैक्स सिस्टम की तुलना तेज हो गई।
हालांकि सवाल यह है कि क्या वास्तव में दूसरे देशों में टैक्स रिटर्न दाखिल करना इतना आसान है, या इसके पीछे अलग तरह की टैक्स व्यवस्था काम करती है। टैक्स विशेषज्ञों का कहना है कि अलग-अलग देशों के नियम, प्रक्रियाएं और अनुपालन व्यवस्था एक-दूसरे से काफी भिन्न हैं।
जापान और ब्रिटेन: नौकरीपेशा कर्मचारियों के लिए अलग व्यवस्था
जापान में ‘नेनमात्सु चोसेई’ (Year-End Adjustment) प्रणाली लागू है। इसके तहत वर्ष के अंत में नियोक्ता ही कर्मचारी की टैक्स देनदारी का समायोजन कर देता है। इसलिए अधिकांश नौकरीपेशा लोगों को अलग से टैक्स रिटर्न दाखिल करने की आवश्यकता नहीं पड़ती।
ब्रिटेन में भी ‘पे-एज-यू-अर्न’ (PAYE) व्यवस्था लागू है। यदि किसी व्यक्ति की आय का मुख्य स्रोत केवल नौकरी है और उसकी आय में कोई अतिरिक्त जटिलता नहीं है, तो सामान्य परिस्थितियों में उसे वार्षिक टैक्स रिटर्न दाखिल नहीं करना पड़ता।
सिंगापुर: कई लोगों को रिटर्न भरने की जरूरत ही नहीं
सिंगापुर में टैक्स फाइलिंग आसान होने की बड़ी वजह सिर्फ डिजिटल पोर्टल नहीं, बल्कि वहां की टैक्स व्यवस्था है। वहां की टैक्स अथॉरिटी कंपनियों से कर्मचारियों की आय का विवरण सीधे प्राप्त करती है। इसके आधार पर कई योग्य टैक्सपेयर्स को ‘नो-फाइलिंग सर्विस’ के तहत शामिल किया जाता है।
ऐसे मामलों में यदि पहले से उपलब्ध जानकारी सही होती है तो संबंधित व्यक्ति को अलग से टैक्स रिटर्न दाखिल नहीं करना पड़ता। टैक्स विभाग सीधे टैक्स आकलन जारी कर देता है।
अमेरिका: टैक्स रिटर्न प्रक्रिया सबसे ज्यादा जटिल
अमेरिका की टैक्स व्यवस्था अपेक्षाकृत अधिक जटिल मानी जाती है। वहां अधिकांश नागरिकों को हर साल टैक्स रिटर्न दाखिल करना अनिवार्य होता है, चाहे उनकी आय पर टैक्स पहले ही काट लिया गया हो।
इसके अलावा कई राज्यों में टैक्सपेयर्स को फेडरल टैक्स रिटर्न के साथ-साथ अलग से स्टेट टैक्स रिटर्न भी जमा करना पड़ता है। यही वजह है कि अनुपालन प्रक्रिया लंबी और अधिक जटिल हो जाती है।
भारत: डिजिटल बदलाव से प्रक्रिया हुई पहले से आसान
भारत का टैक्स सिस्टम कई मायनों में अमेरिका और सिंगापुर के बीच की स्थिति में माना जा सकता है। यहां नौकरीपेशा लोगों को आमतौर पर ITR दाखिल करना पड़ता है, भले ही उनका टैक्स टीडीएस के माध्यम से पहले ही जमा हो चुका हो।
हाल के वर्षों में आयकर विभाग ने प्री-फिल्ड रिटर्न, AIS, फेसलेस असेसमेंट और तेज रिफंड जैसी डिजिटल सुविधाएं शुरू की हैं। इन बदलावों से टैक्स फाइलिंग पहले की तुलना में काफी सरल हुई है।
हालांकि विशेषज्ञ सलाह देते हैं कि रिटर्न जमा करने से पहले प्री-फिल्ड जानकारी का मिलान फॉर्म 26AS, AIS और बैंक रिकॉर्ड से जरूर करना चाहिए। सामान्य परिस्थितियों में एक नौकरीपेशा व्यक्ति 1 से 2 घंटे के भीतर अपना ITR दाखिल कर सकता है।
तुलना में आबादी और पैमाना भी अहम
विशेषज्ञों का मानना है कि भारत और सिंगापुर जैसे देशों की तुलना करते समय दोनों देशों के आकार और टैक्सपेयर्स की संख्या को भी ध्यान में रखना चाहिए। भारत में हर साल करोड़ों टैक्स रिटर्न प्रोसेस किए जाते हैं, जबकि कई देशों की कुल आबादी इससे कम है।
बड़ी आबादी और भारी वित्तीय लेनदेन के बावजूद भारत ने टैक्स प्रशासन में ऑटोमेशन और डिजिटल इंटीग्रेशन को तेजी से बढ़ाया है। AIS, प्री-फिल्ड डेटा और ऑनलाइन सेवाओं जैसी सुविधाओं ने टैक्स अनुपालन को पहले की तुलना में कहीं अधिक सुविधाजनक बना दिया है।
