HomeOpinionSpecial

मानवीय एकता का सार समझाते रवीन्द्रनाथ टैगोर

मानवीय एकता का सार समझाते रवीन्द्रनाथ टैगोर

Rabindranath Tagore

अपने पूरे जीवनकाल में रवींद्रनाथ टैगोर ने करीब 2230 गीत लिखे और बांग्ला साहित्य के जरिए भारतीय सांस्कृतिक चेतना में नई जान डाली. उनके अनुसार भारत भी एक दिन विश्व का मार्गदर्शन कर मानवीय एकता में आदर्श को प्राप्त करेगा.

अपने 80 साल के जीवनकाल करीब एक हजार कविताएं 8 उपन्यास 8 कहानी संग्रह 2200 से ज्यादा गीत व अलग-अलग विषयों पर ढेरों लेख लिखने वाले गुरुदेव रवीन्द्रनाथ टैगोर एक कवि, उच्च कोटि के साहित्यकार, उपन्यासकार और नाटककार के अलावा संगीत प्रेमी, अच्छे चित्रकार तथा दार्शनिक भी थे. वह विश्व की एकमात्र ऐसी महान शख्सियत हैं, जिनके लिखे गीतों की छप तीन देशों के राष्ट्रगान में साफ परिलक्षित है. भारत का राष्ट्रगान ‘जन गण मन अधिनायक उन्हों के द्वारा मूल रूप से बांग्ला भाषा में लिखा गया था, जबकि बांग्लादेश का राष्ट्रगान भी उन्हीं के गीत से लिया गया है, जिसमें बांग्लादेश का गुणगान है. इसके अलावा श्रीलंका के राष्ट्रगान का एक हिस्सा भी उनके एक गीत से ही प्रेरित माना गया है.

7 मई 1861 को कोलकाता में साहित्यिक माहौल वाले कुलीन धनाढ्य परिवार में जन्मे रवीन्द्रनाथ टैगोर एशिया के प्रथम ऐसे व्यक्ति थे, जिन्हें नोबेल पुरस्कार से सम्मानित किया गया था. उन्हें वर्ष 1913 में विश्वविख्यात महाकाव्य गीतांजली’ की रचना के लिए नोबेल पुरस्कार दिया गया था. हालांकि उन्होंने यह पुरस्कार स्वयं समारोह में उपस्थित होकर नहीं लिया था, बल्कि ब्रिटेन के एक राजदूत ने यह पुरस्कार लेकर उन तक पहुंचाया था. नोबेल पुरस्कार में मिले करीब एक लाख आठ हजार रुपये की राशि टैगोर ने किसानों की बेहतरी के लिए कृषि बैंक तथा सहकारी समिति की स्थापना और भूमिहीन किसानों के बच्चों की शिक्षा के लिए स्कूल बनाने में इस्तेमाल की टैगोर की महान रचना ‘गीतांजली’ का प्रकाशन वर्ष 1910 में हुआ था, जो उनकी 157 कविताओं का संग्रह है. इसी काव्य संग्रह को बाद में दुनिया की कई भाषाओं में प्रकाशित किया गया.

वर्ष 1912 में टैगोर ने अपने बेटे के साथ समुद्री मार्ग से भारत से इंग्लैंड जाते. समय खाली समय का सदुपयोग करने के लिए अपने कविता संग्रह ‘गीतांजली’ का अंग्रेजी अनुवाद शुरू किया था. लंदन में उनके अंग्रेज चित्रकार मित्र विलियम रोथेनस्टाइन ने जब टैगोर के कविता संग्रह गीतांजली का अंग्रेजी अनुवाद पढ़ा तो वह इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने अपने मित्र कवि डब्ल्यू. बी. यीट्स को गीतांजली के बारे में बताया और पश्चिमी जगत के लेखकों, कवियों, चित्रकारों, चिंतकों से टैगोर का परिचय कराया. ‘गीतांजली’ के अंग्रेजी के मूल संस्करण की प्रस्तावना स्वयं बीट्स ने लिखी और सितम्बर 1912 में अंग्रेजी अनुवाद की कुछ प्रतियां इंडिया सोसायटी के सहयोग से प्रकाशित हुई.

मार्च 1913 में लंदन की मैकमिलन एंड कंपनी ने इसे प्रकाशित किया और 13 नवम्बर 1913 को नोबेल पुरस्कार की घोषणा से पहले इसके दस संस्करण छापे गए भारतीय स्वतंत्रता के इतिहास में बंग भंग विरोधी आंदोलन का बड़ा महत्व रहा है, जिसमें समूचे भारत के देशभक्त नागरिकों ने एकजुट होकर ब्रिटिश सरकार को झुकने पर विवश कर दिया था. उसी दौरान टैगोर ने 1905 में बांग्ला में एक गीत लिखा था, आमार शोनार बांग्ला, आमि तोमाए भालोबाशी.

विरोदिन तोमार आकाश तोमार बाताश, आमार प्राने बजाए बाशी इसका अर्थ है कि मेरा सोने जैसा बंगाल, मैं तुमसे प्यार करता हूं. सदैव तुम्हारा आकाश, तुम्हारी वायु, मेरे प्राणों में बांसुरी सी बजाती है. हालांकि जिस समय उन्होंने इस गीत की रचना की थी, उस समय उन्होंने स्वयं कल्पना तक नहीं की होगी कि करीब 66 वर्षों बाद बांग्लादेश अस्तित्व में आएगा और उनका यही गीत उसका राष्ट्रगान बन जाएगा. उनकी कुछ कविताएं तो बांग्लादेश के स्कूली पाठ्यक्रम का हिस्सा भी हैं.

जहां तक भारत के राष्ट्रीय गीत ‘जन गण मन की बात है कि इसे भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के कलकत्ता अधिवेशन के दूसरे दिन का काम शुरू होने से पहले 27 दिसम्बर 1911 को पहली बार गाया गया था. हालांकि उस दौरान इस बात को लेकर भी कुछ विवाद चला कि कहीं उन्होंने यह गीत अंग्रेजों की प्रशंसा में तो नहीं लिखा लेकिन इसके रचयिता टैगोर ने स्पष्ट करते हुए कहा था कि इस गीत में वर्णित ‘भारत भाग्य विधाता’ के केवल दो हो अर्थ हो सकते हैं. देश की जनता या फिर सर्वशक्तिमान ऊपर वाला, फिर चाहे उसे भगवान कहें या देव. राष्ट्रपिता महात्मा गांधी तथा रवीन्द्रनाथ टैगोर राष्ट्रीयता, देशभक्ति, तर्कशक्ति इत्यादि विभिन्न मुद्दों पर अलग-अलग राय रखते थे लेकिन दोनों एक-दूसरे का बहुत सम्मान भी किया करते थे.

अपने जीवनकाल में उन्होंने करीब 2230 गीतों की रचना की और बांग्ला साहित्य के जरिए भारतीय सांस्कृतिक चेतना में नई जान डाली. अपनी अधिकांश रचनाओं में उन्होंने इंसान और भगवान के बीच के संबंधों तथा भावनाओं को उजागर किया. गुरुदेव के अनुसार निर्धन भारत भी विश्व का मार्गदर्शन कर मानवीय एकता में आदर्श को प्राप्त कर सकता है.

(लेखक- योगेश कुमार गोयल)

RECOMMENDED FOR YOU

Loading...