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Janmashtami 2022: श्री कृष्ण जन्माष्टमी का महत्व

Janmashtami 2022: श्री कृष्ण जन्माष्टमी का महत्व



Janmashtami 2022: श्रीकृष्ण वसुदेव और देवकी की 8वीं संतान थे । देवकी कंस की बहन थी । कंस एक अत्याचारी राजा था । उसने आकाशवाणी सुनी थी कि देवकी के आठवें पुत्र द्वारा वह मारा जाएगा । इससे बचने के लिए कंस ने देवकी और वसुदेव को मथुरा के कारागार में डाल दिया । मथुरा के कारागार में ही भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी को श्रीकृष्ण का जन्म हुआ । कंस के डर से वसुदेव ने नवजात बालक को रात में ही यमुना पार गोकुल में यशोदा के यहाँ पहुँचा दिया । गोकुल में उनका लालन-पालन हुआ था । यशोदा और नन्द उनके पालक माता-पिता थे ।

बाल्यावस्था में ही उन्होंने बड़े -बड़े कार्य किए जो किसी सामान्य मनुष्य के लिए भी सम्भव नहीं थे । अपने जन्म के कुछ समय बाद ही कंस द्वारा भेजी गई राक्षसी पूतना का वध किया , उसके बाद शकटासुर, तृणावर्त आदि राक्षस का वध किया, बाद में गोकुल छोड़कर नंद गाँव आ गए वहां पर भी उन्होंने कई लीलाएं की जिसमे गोचारण लीला, गोवर्धन लीला, रास लीला आदि मुख्य है । इसके बाद मथुरा में मामा कंस का वध किया । सौराष्ट्र में द्वारका नगरी की स्थापना की और वहाँ अपना राज्य बसाया । पांडवों की मदद की और विभिन्न संकटों से उनकी रक्षा की । महाभारत के युद्ध में उन्होंने अर्जुन के सारथी की भूमिका निभाई और रणक्षेत्र में ही उन्हें उपदेश दिया । 124 वर्षों के जीवनकाल के बाद उन्होंने अपनी लीला समाप्त की । उनके अवतार समाप्ति के तुरंत बाद परीक्षित के राज्य का कालखंड आता है । राजा परीक्षित, जो अभिमन्यु और उत्तरा के पुत्र तथा अर्जुन के पौत्र थे, इसी समय से ही कलियुग का आरंभ माना जाता है ।

 कर्म का ज्ञान देने वाले कर्मयोगी श्रीकृष्‍ण का अवतरण दिवस यूं तो कितना अचंभित सत्‍य है, ये कि जो अजन्‍मा है उसका जन्‍म । केवल कर्म की प्रधानता के बखान और असत्‍य पर सत्‍य की जीत के लिए । बिना कृष्‍ण तत्‍व को जाने और समझेे कृष्‍ण आराधना अधूरी ही है । मुनष्‍य ऊर्जा रहित है ।

श्रीकृष्ण की इच्छा थी कि उनके देह-विसर्जन के पश्चात द्वारकावासी अर्जुन की सुरक्षा में हस्तिनापुर चले जाएं । इसी अनुसार अर्जुन अन्त:पुर की स्त्रियों और प्रजा को लेकर जा रहे थे । रास्ते में डाकुओं ने लूटमार शुरू कर दी । अर्जुन ने तत्काल गाण्डीव के लिए हाथ बढ़ाया, पर गाण्डीव तो इतना भारी हो गया था कि प्रत्यंचा खींचना तो दूर, धनुष को उठाना ही संभव नहीं हो पा रहा था । महाभारत के विजेता, सर्वश्रेष्ठ धनुर्धारी विवश होकर अपनी आंखों के सामने अपना सब कुछ लुटता देख रहे थे । विश्वास ही नहीं हो रहा था कि यह वही है, जिसने अजेय योद्धाओं को मार गिराया था । बिजली की तरह से कृष्ण शब्द उनके मन में गूंज गए ‘ तुम तो निमित्त मात्र हो पार्थ ।’ यह प्रसंग जितना मार्मिक है, उतना ही एक अखंड सत्य का उद्घोषक भी है । जीवन में जब-जब कृष्ण तत्व अनुपस्थित होता है, तब-तब मनुष्य इसी तरह ऊर्जा रहित हो जाता है

श्रीकृष्ण को सनातन धर्म में पूर्णावतार माना गया है । पृथ्वी पर श्री कृष्ण से अधिक संपूर्ण किसी दैवीय तत्व ने जन्म नहीं लिया अतएव शास्त्रों ने श्रीकृष्ण को पूर्ण अवतार कहकर संबोधित किया है । शास्त्रों में वर्णित “कृष्‍णम वंदे जगतगुरू:” का अर्थ है की कृष्ण ही गुरु हैं और कृष्ण ही सखा हैं । कृष्ण ही श्री भगवान हैं तथा कृष्ण हैं राजनीति, धर्म, दर्शन और योग का पूर्ण वक्तव्य । शास्त्र कहते है “भजगोविंदम मूढ़मते” अर्थात कृष्ण को समझना और तथा उनके दिखाए पथ पर अग्रसर होना ही भगवत आराधन का मार्ग है ।
 

श्री कृष्ण अवतरण का वैज्ञानिक दृष्टिकोण

प्राचीन भारत महान खगोलशास्त्री और गणितज्ञ आर्यभट्ट जी के अनुसार महाभारत युद्ध 3137 ई.पू. में हुआ था तथा नए शोधानुसार महाभारत का युद्ध 3067 ई. पूर्व हुआ था । इस युद्ध के 35 वर्ष के बाद भगवान कृष्ण ने देह त्याग दी तथा तभी से कलयुग का प्रारंभ माना जाता है । इंग्लैंड निवासी शोधकर्ताओं ने पुरातात्विक तथ्यों तथा खगोलीय घटनाओं के आधार पर कृष्ण जन्म और महाभारत युद्ध के समय की सटीक व्याख्या की है । महाभारत में वर्णित 150 खगोलीय घटनाओं के आधार पर महाभारत युद्ध 22 नवंबर 3067 ईसा पूर्व को होना बताया है । उस समय श्री कृष्ण 55 – 56 वर्ष के थे ।
 

श्री कृष्ण अवतरण का ज्योतिषीय दृष्टिकोण

ज्योतिष शास्त्र के अनुसार भगवान श्री कृष्ण का जन्म भाद्रपद महीने की कृष्णपक्ष की अष्टमी तिथि को महानिशीथ काल में वृष लग्न में हुआ था । उस समय चंद्रमा रोहिणी नक्षत्र में भ्रमण कर रहे थे । रात्रि के ठीक 12 बजे क्षितिज पर वृष लग्न उदय हो रहा था तथा चंद्रमा और केतु लग्न में विराजित थे । चतुर्थ भाव सिंह राशि में सूर्यदेव, पंचम भाव कन्या राशि में बुध, छठे भाव तुला राशि में शुक्र और शनिदेव विराजित थे। सप्तम भाव वृश्चिक राशि में राहू, भाग्य भाव मकर राशि में मंगल तथा लाभ स्थान मीन राशि में बृहस्पति स्थापित थे। भगवान श्री कृष्ण की जन्मकुंडली में राहु को छोड़कर सभी ग्रह अपनी स्व राशि अथवा उच्च अवस्था में स्थित थे । 

श्री कृष्ण अवतरण ओर अंकशास्त्र

श्री कृष्ण का जन्म रात्रि के सात मुहूर्त निकलने के बाद आठवें मुहूर्त में हुआ । तब रोहिणी नक्षत्र तथा अष्टमी तिथि थी जिसके संयोग से जयंती नामक योग बन रहा था। कृष्ण जन्म के दौरान आठ का जो संयोग बना उसमें कई रहस्य छुपे हैं । श्री कृष्ण की आठ ही पत्नियां थी। आठ अंक का उनके जीवन में बहुत महत्व रहा है । अंकशास्त्र अनुसार अंक “8” शनि का प्रतीक है। आठ का संयोग अष्टमी तिथि, देवकी की आठवीं संतान, आठ पत्नियां, आठवां मुहूर्त । नक्षत्र सारिणी में शनि ही आठवें नक्षत्र पुष्य के स्वामी है । नक्षत्र सारिणी के अनुसार कृष्ण चौथे नक्षत्र रोहिणी के अर्ध चंद्रमा के साथ पैदा हुए थे अर्थात 8/2 = 4 यहां भी अंक आठ । शास्त्रों में वर्णित है कि शनिदेव कृष्ण जन्म से हजारों वर्ष पूर्व से ही कृष्ण भक्ति में लीन थे । 

श्री कृष्ण के जन्म योग

श्रीकृष्ण की जन्मकुण्डली के लग्न में उच्च राशिगत चंद्रमा द्वारा मृदंग योग बन रहा था जिसके फलस्वरूप श्रीकृष्ण कुशल शासक और जन-मानस प्रेमी बने । ज्योतिष के अनुसार जब कभी वृष लग्न मे चंद्रमा विराजित हो तब जातक जनप्रिय नेता और कुशल प्रशासक होता है । श्रीकृष्ण की जन्मकुण्डली के सभी ग्रह वीणा योग बना रहे थे । जिसके फलस्वरूप श्रीकृष्ण गीत, नृत्य, संगीत और कला क्षेत्र में निपुण थे । श्रीकृष्ण की जन्मकुण्डली में पर्वत योग बन रहा था जिसके कारण ये परम यशस्वी बने । पंचम स्थान में विराजित उच्च के बुध ने इन्हें कूटनीतिज्ञ विद्वान बनाया तथा मकर राशि के उच्च के मंगल ने यशस्वी योग बनाकर इन्हें पूजनीय बनाया । एकादश भाव में मेष राशि में उच्च के सूर्य ने भास्कर योग का निर्माण किया जिसके कारण श्रीकृष्ण पराक्रमी, वेदांती, धीर और समर्थ बनें ।

कृष्ण तो जगत का विस्तार हैं, चेतना के सागर हैं, जगद्गुरु हैं, योगेश्वर हैं । उन्हें शब्दों में बांधना उतना ही कठिन है जितना कि सागर की लहरों को गागर मे समेटना । 
बाल ग्वालों के साथ खेलने वाला सरल-सा कृष्ण इतना अगम्य है कि उसे जानने के लिए ज्ञानियों को कई जन्म लेने पड़ते हैं, तब भी उसे नहीं समझ पाते ।
श्री कृष्ण का जन्म जेल में हुआ । घनघोर बारिश में नंदगांव पहुंचे व जन्म से ही जिसकी हत्या की बिसात बिछाई गई, जन्म से ही अपने माता-पिता से अलग कर दिया गया, जिन्होंने अपना संपूर्ण जीवन तलवार की धार पर जिया हो, वही विराट व्यक्तित्व का धनी हो सकता है । कृष्ण जीवनभर यताति रहे, भटकते रहे, लेकिन दूसरों का सहारा बने रहे । बाल लीलाएं करके गांव वालों को बहुत सी व्याधियों से बचाया, दिखावे से दूर कर्मयोगी बनाया, अनुचित परंपराओं से आजाद कराया ।

कंस गोहत्या का प्रवर्तक था । उसके राज्य में नरबलि होती थी । जरासंध 100 राजाओं का सिर काटकर शिवजी पर बलि चढ़ाने वाला था । कृष्ण ने इन दोनों आसुरी शक्तियों का संहार किया । युधिष्ठिर के राजसूय यज्ञ में उन्होंने ब्राह्मणों की जूठी पत्तल उठाने का कार्य अपने हाथ में लिया था ।
श्रीकृष्ण का चरित्र व्यक्ति के सुखों एवं दुखों में आबद्ध है । कृष्ण का बाल्यकाल हर घर की शोभा है । हर मां अपने बालक के बचपन की तुलना कृष्ण के बचपन से करती है । श्रीकृष्ण का चरित्र सबको लुभाता है । कृष्ण संपूर्ण जिंदगी के पर्याय हैं । उनका जीवन संदेश देता है कि जो भी पाना है, संघर्ष से पाना है । कृष्ण आत्मतत्व के मूर्तिमान स्वरूप हैं । कृष्ण की लीलाएं बताती हैं कि व्यक्ति और समाज आसुरी शक्तियों का हनन तभी कर सकता है, जब कृष्णरूपी आत्म-तत्व चेतन में विराजमान हो । ज्ञान और भक्ति के अभाव में कर्म का परिणाम कर्तापन के अहंकार में संचय होने लगता है । कृष्णभाव का उदय इस अहंकार से हमारी रक्षा करता है

कृष्ण जन्माष्टमी के दिन हमें उस शाश्वत आनंद के अस्तित्व का एहसास होता है । शाश्वत आनंद क्यों, क्योंकि कृष्ण ने जीवन के सभी चरणों को मानव के रूप में अनुभव किया, चाहे वह गरीब हो या अमीर लेकिन उनका शाश्वत आनंद (आनंद, शुद्ध सुख) वही रहा, हम सभी के पास शाश्वत आनंद का स्रोत है, बस कंस को नियंत्रित करने या मारने की जरूरत है ( जो हमारा कभी न खत्म होने वाला अहंकार है ) और उस अहंकार को ईश्वरीय प्रेम से ही मारा जा सकता है
जब आप में दिव्य प्रेम जागृत होता है, तो आपकी पांचों इंद्रियां आपके नियंत्रण में होती हैं क्योंकि आप प्रेम की पवित्रता और शाश्वत प्रेम की दिव्यता में विलीन हो जाते हैं । कृष्ण प्रेम और शाश्वत आनंद के प्रतीक हैं, शाश्वत आनंद और दिव्य प्रेम में अहंकार को भंग किया जा सकता है । उनकी बाँसुरी है जीवन की मधुर संगीत, जो जीवन की बासुरी को समझ और जान लेता है, वह सदैव सुखमयी अवस्था में रहता है । बांसुरी में इतने सारे छेद होने के बावजूद, जो बांसुरी बजाना सीखता है, वह हमेशा शाश्वत प्रेम और आनंद की ध्वनि को प्रतिध्वनित करेगा
कृष्ण नाम का अर्थ है – सर्व- आकर्षक’ ईश्वर सबको आकर्षित करता है । हम इस दिन और अपनी जीवन यात्रा में मुस्कान और शाश्वत प्रेम फैलाने के लिए अपने धर्म और कर्म को प्रकट करें ।

मोरपंख जिम्मेदारियों का प्रतीक

राजा अपनी पूरी प्रजा के लिए ज़िम्मेदार होता है । वह ताज के रूप में इन जिम्मेदारियों का बोझ अपने सिर पर धारण करता है।
लेकिन श्री कृष्ण अपनी सभी जिम्मेदारी बड़ी सहजता से पूरी करते हैं । श्री कृष्ण को भी अपनी जिम्मेदारियां बोझ नहीं लगतीं हैं और वे विविध रंगों भरी इन जिम्मेदारियों को बड़ी सहजता से एक मोरपंख (जो कि अत्यंत हल्का भी होता है) के रूप में अपने मुकुट पर धारण किये हुए हैं ।
योगेश्वर श्रीकृष्ण ने भक्तों की रक्षा के लिए मानव रूप में अवतार लेकर संपूर्ण जगत का कल्याण किया । उन्होंने स्वयं गीता में उद्घोष किया, ‘जब-जब पापियों द्वारा धर्म की हानि होती है, तब-तब मैं उसकी पुनर्स्थापना के लिए पृथ्वी पर अवतार लेकर दुष्टों का दमन करता हूं ।’
सार यही है कि जो भक्त कृष्णयोग का रसपान करेगा, उसे सभी संकटों से मुक्ति अवश्य मिलेगी

लेखक – आचार्य पं.नारायण वैष्णव
महावीर गेट, सुदामानगर, इंदौर
मोबा. 99267-48588


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