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श्रावण पूर्णिमा 2022 – श्रावण पूर्णिमा उपाकर्म

श्रावण पूर्णिमा 2022 – श्रावण पूर्णिमा उपाकर्म



भारतवर्ष उत्सवों, पर्वों और व्रतों का देश है । श्रावणी पर्व का भी भारतीय समाज में विशेष महत्व है । श्रावण मास की पूर्णिमा के साथ श्रवण नक्षत्र का संयोग होने के कारण इसे श्रावणी कहा जाता है । श्रावणी पूर्णिमा को ज्ञान की साधना का पर्व माना गया है । यह वैदिक पर्व है । हमारे वैदिक ग्रंथों में इसे उपाकर्म भी कहा जाता है । यह पर्व हमारे ज्ञान रूपी यज्ञ का प्रतीक है । श्रावणी आध्यात्मिक ग्रंथों के स्वाध्याय के प्रचार का पर्व है । सद् ज्ञान, बुद्धि, विवेक की वृद्धि के लिए हमारे ऋषियों ने इसे निर्मित किया था । प्राचीन काल में ऋषि-मुनि इसी दिन से वेद पारायण आरंभ करते थे ।

गुरुकुलों में ज्ञान की साधना के लिए छात्रों का यज्ञोपवीत संस्कार के साथ इसी श्रावणी के पावन अवसर पर प्रवेश एवं वेद अध्ययन प्रारंभ होता था। गुरुकुलों में इसी दिन से शिक्षण सत्र का आरंभ भी होता था । बड़े-बड़े यज्ञों का आयोजन भी किया जाता था । श्रावण पूर्णिमा (रक्षाबंधन) को हेमाद्रि संकल्प और श्रावणी उपाकर्म भी किया जाता है । इसके अंतर्गत दशविधि स्नान आते हैं, जिनमें भस्म, मृतिका, गोमय, पंचगव्य, गोरज, धान्य, स्नान, फल, सर्वोषधि (हल्दी इत्यादि), कुशोदक और हिरण्य (स्वर्ण) स्नान के बाद पितरों का तर्पण और ऋषियों का आवाहन पूजन किया जाता है । नये जनेऊ धारण किया जाता है । श्रावण पूर्णिमा यज्ञोपवीत बदलने से लेकर भाई-बहनों में रक्षाबंधन और शुभ संकल्पों का मिलाजुला उत्सव है । यज्ञोपवीत संस्कार को उपनयन भी कहा गया है । इस संस्कार से शिष्य को गुरु के पास लाया जाता है, इसलिए इसे उपनयन कहते हैं । दीक्षा वह जो दिशा बताए और दृष्टि खोले । उपनयन का अर्थ दूसरी आंख या नई दृष्टि भी होता है । यज्ञोपवीत संस्कार का एक कर्म है मेखला बंधन । मेखला बंधन अर्थात व्रतबंधन, आने वाली कठिनाइयों से संघर्ष की तत्परता का संदेश है मेखला बंधन । जीवन के देवासुर संग्राम में आसुरी वृत्ति हावी न हो, इसके लिए सतत जागृति की आवश्यकता है । विभिन्न कर्मकांडों का संदेश यह भी है कि बाहरी शासन कितना ही समर्थ क्यों न हो, बदलाव लाने या संस्कारित करने में असफल ही रहता है ।

इन संस्कारों में गुरु की या आचार्य की प्रमुख महत्ता है । जैसे माता-पिता के संतुलित सहयोग से काया जनती है, वैसे ही गुरुकृपा और शिष्य के समर्पण से साधक द्विज बनता है । बीज प्रकृति के प्रति समर्पण दिखाता है । उसके प्रवाह में अपना अस्तित्व मिलाने- गलाने के लिए तैयार होता है, तो प्रकृति का भी प्रभाव दिखाई देने लगता है । साधक जब अपनी सीमित क्षमताओं को समर्थ गुरु के प्रति समर्पित कर देता है तो एक जीवंत साधक का जन्म होता है, जिसके पुरुषार्थ के सफल परिवार एवं समाज को धन्य बनाने लगते हैं । ऐसे समर्पित साधक को द्विज की संज्ञा दी जाती है । श्रावणी पर्व का संदेश – है कि दोनों प्रक्रियाएं प्रखर बनें । समर्थ गुरु और समर्पित साधक इस दिशा में पहल करें । लिए गए संकल्प और अपनाए गए अनुशासन के निर्वाह में जो भूल हुई हों, उन्हें चिह्नित कर, उसके अनुसार विधिवत प्रायश्चित करें ।

प्रायश्चित कर्म- तीन चरणों में प्रायश्चित का विधान पूरा होता है । गलतियों को स्वीकार करना, उन्हें स्वीकार करने का साहस, गलतियों के लिए तप और इच्छापूर्ति अर्थात जो क्षति हुई है, उसकी भरपाई करना । तीनों चरण जिस ईमानदारी से उठाए जाते हैं, उसी अनुपात में ऋषियों और देवताओं के अनुग्रह भी साधक के साथ जुड़ जाते हैं ।

पर्व पर हेमाद्रि संकल्प सहित दस स्नान, शिखाबंधन, यज्ञोपवीत पूजन और धारण के साथ, देव और ऋषि पूजन के लाभ तैयारी के साथ श्रद्धा व निष्ठा से विधि-विधान के साथ पूरा करने पर ही मिलते हैं ।

मशीनी ढंग से कर्मकांड पूरे कर लेने भर से कोई लाभ नहीं होता। अपने भावों, विचारों और कर्मों को पाशविक संकीर्णता से ऊपर उठने का संकल्प कोई भी ले सकता है । वैसे प्रयास भी कर सकता है । पुरुषसूक्त के अनुसार, जन्म से तो सभी श्रम की क्षमता लिए रहते हैं। संस्कार से वे द्विज बन जाते हैं । वर्ण चार हैं, चारों वर्ण समाज में ज्ञान और संस्कार के साथ सुरक्षा, समृद्धि और श्रम की आवश्यकताएं पूरी करते हैं । समाज को उठाने और आगे बढ़ाने में चारों का अपना योगदान होता है ।
लाभ उठाना है, तो केवल पर्व के दिन ही कुछ कर लेना काफी नहीं है । सतत प्रयास जरूरी है । पर्व पर दो प्रक्रियाएं खासकर अपनाई जाती हैं । एक पहले अपनाए गए अनुशासन संकल्पों के निर्वाह में जो भूल हुई हों, उन्हें ठीक करने के लिए प्रायश्चित्त करना और आगे के लिए बेहतर लक्ष्य निर्धारित करना । उन्हें निष्ठा से निभाने का संकल्प और उन्हें पूरा करने के लिए ऋषियों, देवताओं से उचित शक्ति अनुदान प्राप्त करना । इसके लिए देवपूजन तथा रक्षाबंधन, पौधरोपण जैसे उपचार किए जाते हैं ।
तीन चरणों में पूरा होता है उपाकर्म-
संप्राते श्रावणास्यान्त पौणिंमास्या दिनोदये ।
स्नानं कुवींत मतिमान् श्रुति स्मृति विधानतः ॥
बुद्धिमान पुरुष को चाहिए कि श्रावण की पूर्णिमा को प्रातः ही श्रुति-स्मृति विधानानुसार स्नानादि करे । यह आत्मशोधन का पुण्य पर्व है । प्रायश्चित संकल्प है ।
श्रावण उपाकर्म के तीन पक्ष हैं- पहला पक्ष प्रायश्चित्त संकल्प, दूसरा संस्कार और तीसरा पक्ष स्वाध्याय कहलाता है । उपाकर्म के पहले पक्ष में प्रायश्चित्त करने के लिए हेमाद्रि स्नान का संकल्प लिया जाता है ।

ऋषियों के प्रति आभार – इस पर्व ऋषि तर्पण भी कहा जाता है । ऋषि तर्पण का आशय है ऋषियों को संतुष्ट करना । ऋषियों के तपोबल के माध्यम से जो वेद ज्ञान की निधि हमें प्राप्त हुई है उसके प्रति कृतज्ञता का भाव प्रकट करना । वैदिक ग्रंथों के ज्ञान को अपने जीवन में आत्मसात करके यह ऋषियों के ऋण से उऋण होने का अवसर है । यह श्रावणी पर्व अपने जीवन में विद्या एवं ज्ञान की निरंतर वृद्धि करने की प्रेरणा देता है । आध्यात्मिक ज्ञान का मनुष्य के जीवन में सर्वोपरि महत्व है । ज्ञान को हमारे ऋषियों ने प्रकाश के समान माना है । जो हमारे जीवन रूपी पथ को निरंतर आलोकित करता रहता है । अज्ञानता अभिशाप एवं दुखों का मूल है । अज्ञानता से ही मनुष्य के जीवन में अशांति, दुख, कलेश, चिंता और संताप का वातावरण पनपता है ।

विज्ञान भी मानता है उपाकर्म का महत्व- ऐसा नहीं है कि श्रावण उपाकर्म का महत्व वैदिक काल के साथ ही समाप्त हो गया हो । बल्कि आज का विज्ञान भी उपाकर्म के महत्व को मानता है । वैज्ञानिक भाषा में कहा जाए तो पवित्र मंत्रों के उच्चारण के दौरान सकारात्मक ऊर्जा का प्रवाह होता है ।
बारिश के बाद नदियों का पानी फिर से साफ हो जाता है । ऐसे में किसी नदी के घाट पर नहाने से चर्म रोग दूर होते हैं । यज्ञकृहवन आदि से मानसिक शांति मिलती है । 6 माह तक गुरू के सानिध्य में वेद पढने से न केवल ज्ञान का विस्तार होता है बल्कि जीवन में सकारात्मकता (पॉजिटिवी) भी आती है । जनेउ हमें हर रोज वह सारे नियम और संकल्प याद दिलाता है जो हमनें अपने ईश्वर के आगे किए हैं । इस दृष्टिकोण से विज्ञान श्रवण उपाकर्म को जीवन की अनिवार्य प्रक्रिया मानता है । मृतिका, भस्म, गोमय, कुशा, दूर्वा आदि सभी स्वास्थ्यवर्द्धक एवं रोगनाशक होती हैं । हवनध्यज्ञ से निकला धुआं वातावरण में आक्सीजन के प्रतिशत को बढ़ाता है।

सनातन धर्म में दशहरा क्षत्रियों का प्रमुख पर्व है । दीपावली वेश्यों का प्रमुख त्यौहार माना जाता है । होली समाज के हर वर्ग का पर्व है, जबकि सभी ऊच नीच का भेद भूलकर एक दूसरे को गले लगाते हैं और श्रावण शुक्ल पूर्णिमा को मनाया जाने वाला श्रावण उपाकर्म ब्राह्मणों का प्रमुख पर्व है । इसलिए हर ब्राम्हण अपने जीवन में वर्ष में एक बार यह उपाकर्म जरूर करता है । हिंदूओं में विशेषकर ब्राम्हणों के लिए यह पर्व कई मायनों में महत्वपूर्ण है । यह वर्ष का एकमात्र दिन है, जो मानव शरीर की इंद्रियों को पवित्र करने, अपनी सभी गलतियों, पापों के लिए क्षमा मांगने का, प्राश्चित करने का अवसर देता है ।

उपाकर्म की विधि पूरी होने के बाद रक्षा बंधन मनता है । जिसके बारे में कई पौराणिक कहानियां है. एक कथा के अनुसार इसी दिन इंद्र को देवासुर संग्राम के लिए विदा हुए थे और उनकी पत्नी शची ने उनकी भुजा पर रक्षा−सूत्र बाँधा था । यही वह दिन है जब भगवान् वामन ने राजा बलि को रक्षा सूत्र बाँधकर दक्षिणा प्राप्त की थी ।

लेखक – आचार्य पं.नारायण वैष्णव
महावीर गेट, सुदामानगर, इंदौर
मोबा. 99267-48588


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