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लता ताई तुम्हें कैसे भुला पाएँगे “मेरी आवाज ही मेरी पहचान है…!”

लता ताई तुम्हें कैसे भुला पाएँगे  “मेरी आवाज ही मेरी पहचान है…!”

लेखक- ऋतुपर्ण दवे

स्वर कोकिला, स्वर साम्राज्ञी, हर दिल अजीज, सुरों की मलिका, बच्चे, बड़े, बूढ़े हर किसी को अपनी आवाज से गुनगुनाने को मजबूर करने वाली अजीम शख्सियत लता दीदी कहें लता ताई या लता जी नहीं तो लता मंगेशकर कुछ भी कह लें बड़ी ही खामोशी से खामोश हो गईं। जिसने भी सुना सन्न रह गया, हर किसी को अपनी आवाज से सुकून देने वाली जानी-पहचानी और सबसे अलग आवाज की ऐसी विदाई ने हर किसी को गमगीन कर दिया। सचमुच ऐसा लगता है कि एक युग का अंत हो गया है। चीनी घुली वो, मखमली मीठी आवाज जो उम्र के आखिरी मुकाम तक जस की तस बनी रही बल्कि जवाँ होती रही सचमुच किसी वरदान से कम नहीं थी। इससे भी बढ़कर ये कहें कि दुनिया की उन चंद आवाजों में शुमार बल्कि सबसे बड़े लोकतंत्र और दूसरी आबादी वाली देश की ये महान गायिका ऐसी इकलौती हैं जिनके गीत चौबीसों घण्टे, अनवरत बिना रुके दुनिया भर में कहीं न कहीं अपनी मिठास घोलते रहते हैं। सच में लता मंगेशकर ने जो मुकाम हासिल किया वो बेहद बड़ा बल्कि सबसे ऊंचा था जिसके बाद क्या होता है कोई जानता नहीं है और जानने की कोशिश की।


अद्वितीय प्रतिभा की धनी लता जी की आवाज में जबरदस्त कशिश थी वो लाजवाब थी, मजाक में ही सही अक्सर इस बात पर भी चर्चाएँ सुनाई देतीं थी उनके गले पर रिसर्च होनी चाहिए।1969 में पद्म भूषण,1989 में दादा साहब फाल्के पुरस्कार 1999 में पद्म विभूषण, 2001 में भारत रत्न 2008 में भारत की स्वतंत्रता की 60 वीं वर्षगांठ पर “वन टाइम अवार्ड फॉर लाइफटाइम अचीवमेंट” सम्मान सहित न जाने कितने प्रतिष्ठित पुरस्कारों एवं सम्मानों से सम्मानित लता दीदी भारत की वो अनमोल रत्न थीं जो तीन पीढ़ियों से सारे देश पर अपनी आवाज से राज कर रहीं थीं और कोई नहीं जानता कि कितने सैकड़े बरस तक राज करती रहेंगी। उनकी सौम्यता और प्रतिभा पर सबको बेहद फक्र है। लता जी वो सितारा हैं जो नाशवान शरीर के रूप में भले ही हम से छिन गयी हो लेकिन अनंत में चमकते तारे के रूप में प्रकृति के साथ चमकती, दमकती रहेंगी। सच है कि एक सूरज, एक चाँद और एक ही लता मंगेशकर ने इस धरती पर अपनी आवाज का जादू बिखेरा। कहने को तो हमेशा यह नारा सुनाई देता है कि जब तक सूरज चाँद रहेगा लता दीदी तेरा नाम रहेगा। लेकिन लता जी के लिए यह हकीकत है। उनकी जगह कोई ले पाए यह मुमकिन नहीं और कोई दूसरी लता मंगेशकर दुनिया में आ पाए यह नामुमिकन है।

8 दशकों के अपने संगीत के सफर में लता ताई ने सुरों की वो माला गूथी और सुरों की जो बंदिगी की है वो बानगी है। अपने सुरों से ना सिर्फ प्लेबैक सिंगिंग को नये आयाम देने वाली बल्कि गायकों की तमाम पीढ़ियों को प्रोत्साहित करने वाली लता जी जन्म 28 सितंबर, 1929 को मध्यप्रदेश के इंदौर में एक मराठी परिवार में जन्मीं। जन्म के साथ उन्हें हेमा नाम दिया गया था लेकिन पिता को पसंद नहीं आया और उन्होंने नाम बदलकर लता रख दिया। उनके पिता पंडित दीनानाथ मंगेशकर मराठी रंगमंच से जुड़े थे। केवल 5 वर्ष की आयु में अपने पिता के साथ नाटकों में अभिनय किया और संगीत सीखने लगीं। जाने माने उस्ताद अमानत अली खां से भी शास्त्रीय संगीत सीखना शुरू किया लेकिन वो विभाजन में पाकिस्तान चले गए। तब अमानत खां से संगीत शिक्षा लीं। पंडित तुलसीदास शर्मा और उस्ताद बड़े गुलाम अली खां जैसी जानी मानी शख्सियतों से भी संगीत के गुर सीखे।
लता जी का शुरुआती सफर चुनौतियों से भरा हुआ था। बॉलीवुड में 1940 के दशक में प्रवेश के साथ वहाँ नूरजहां, शमशाद बेगम और जोहरा बाई अंबाले वाली जैसी वजनदार आवाजों के सामने उनकी महीन आवाज फीकी लगने लगी। लेकिन तब कौन जानता था कि इसी महीन आवाज की मल्लिका एक दिन दुनिया में अपना वो जादू ऐसा बिखेरेगी कि हर कोई उनकी आवाज का दीवाना भर नहीं बल्कि मुरीद होकर रह जाएगा। तब इसी आवाज के चलते उनके कई मौके बेकार गए क्योंकि उस समय बहुत से फिल्म प्रोड्यूसरों और संगीत निर्देशकों को उनकी बहुत ऊंची और पतली आवाज पर भरोसा नहीं था। 1942 में 13 वर्ष की छोटी सी उम्र में सिर से पिता का साया उठने के बाद परिवार की जिम्मेदारी उन पर आ गई और एक बेहद कठिन इम्तिहान से गुजरना पड़ा। पूरा परिवार पुणे से मुंबई आ गया। जहाँ उन्हें फिल्मों में अभिनय से नापसंदगी के बावजूद परिवार की आर्थिक जिम्मेदारी को उठाने की मजबूरी में अभिनय करना पड़ा।


1942 में ‘कीर्ती हसाल’ के लिए अपना पहला गाना गाया जो उनके पिता को पसंद नहीं आया और उन्होंने फिल्म से गाने को हटवा दिया। 1942 से 1948 के बीच लता ने लगभग आठ हिन्दी और मराठी फिल्मों में काम किया। आखिरकार 7 साल के संघर्ष के बाद वह दौर भी आया जब 1949 में फिल्म ‘महल’ के गाने ‘आयेगा आने वाला ..’ के बाद लता मंगेशकर बॉलीवुड में अपनी पहचान बनाने मे सफल हुईं। इसके बाद वह राजकपूर की फिल्म ‘बरसात’ के गाने ‘जिया बेकरार है’, ‘हवा मे उड़ता जाए’ जैसे गीत गाने के बाद बॉलीवुड में एक सफल पाश्र्वगायिका के रूप मे स्थापित हो गईं और फिर उनकी सफलता का परचम जैसे कदम चूमते हुए आसमान की उन ऊंचाइयों पर जा पहुँचा जहाँ पहुंच पाना किसी के लिए भी नामुमकि है। उन्होंने 36 भाषाओं में 30 हजार से ज्यादा गाने गाए हैं। 1991 में ही गिनीस बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड्स ने माना था कि वे दुनिया भर में सबसे अधिक रिकॉर्ड की गई गायिका हैं। लता मंगेशकर को मिले पुरुस्कारों की सूची इतनी बड़ी है कि वह पूरी हो जाए यह भी नामुमकिन सा है। देश-विदेश में संगीत और गायन के क्षेत्र में मिले अनगिनत पुरुस्कारों का अनवरत सा सिलसिला है। उनके पुरुस्कारों को यदि एक जगह संग्रहित किया जाए तो यह भारत की अनमोल विरासत वाला नया म्यूजियम होगा। आगे ऐसा ही हो यह उम्मीद की जा सकती है।


नेहरू जी के बारे में जाहिर था कि वो कभी सार्वजनिक तौर पर रोते नहीं दिखे और न किसी को देखना पसंद करते थे। 27 जनवरी 1963 को जब लता मंगेशकर ने राष्ट्रपति डॉ. एस राधाकृष्णन और प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू की मौजूदगी में नेशनल स्टेडियम में ऐ मेरे वतन के लोगों…. गाना गाया तो नेहरू जी की आंखें छलक गईं। लता ताई को बस एक ही अफसोस ता-उम्र रहा कि रियाज में कभी भी कमीं नहीं करने वाली और बहुत छोटी सी उम्र में जिस शास्त्रीय संगीत को सीखा उससे वो दूर हो गईं। 1942 से 2015 तक के लंबे करियर में 1942 में आई मराठी फिल्म ‘पहली मंगलागौर’ में गाना गाया। हिंदी फिल्मों में उनकी एंट्री साल 1947 में फिल्म ‘आपकी सेवा’ के जरिए हुई। उन्होंने 80 साल के सिंगिंग करियर में अब तक 36 भाषाओं में करीब 30 हजार से ज्यादा गाने गाए हैं। साल 2015 में लता जी ने आखिरी बार निखिल कामत की फिल्म ‘डुन्नो वाय 2’ में गाना गाया था। अजीब दास्तां है ये…, अल्लाह तेरो नाम…, होठों पे ऐसी बात…,कितनी अकेली कितनी तन्हा…, आप की नजरों ने समझा…, मेरा साया…, तस्वीर तेरे दिल में, बिन्दिया चमकेगी…., इन्हीं लोगों ने ले लीना दुपट्टा मेरा…, बीती न बिताई…, रूठे-रूठे पिया…. ऐसे न जाने कितने गीत हैं जिन्हें समेटने में ही कई पुस्तकें भर जाएँगी। यह तो सच है समूची दुनिया में इस वक्त भी लता जी के गीत गुनगुनाए और सुने जा रहे हैं। बस नहीं है तो वो खुद जो अनंत में विलीन होकर भी अपनी मंत्रमुग्ध आवाज को सुन आनन्दित हो रही होंगी और ईश्वर भी इस नायाब कोहिनूर को अपने श्री चरणों में पा चकित तो होगा। शास्वत सत्य है कि लता जी को काल के क्रूर हाथों ने हम से छीन लिया। दुनिया को हिला कर रख देने वाली महामारी कोविड से भारत के लिए परमात्मा का वरदान भारत रत्न स्व. लता मंगेशकर पर समूचे देश को है, था और रहेगा अभिमान। लोग तड़प कर रह गए। खामोश, शांत लेकिन गरिमामय विदाई और मुंबई के प्रख्यात शिवाजी पार्क में पंचतत्वों में विलीन हो समाधिस्थ लता जी की हमेशा गूंजने वाली आवाज अब हर रोज उनकी याद और श्रध्दांजलि होगी।

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