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इंटरनेशनल लेबर डे- देश की इस ‘नींव’ को मजबूती की दरकार

इंटरनेशनल लेबर डे- देश की इस ‘नींव’ को मजबूती की दरकार


International labour Day

1 मई का दिन हर साल ‘इंटरनेशनल लेबर डे’ या ‘मजदूर दिवस’ के रूप में मनाया जाता है, जिसे ‘मई दिवस’ भी कहते हैं. यह दिन समाज के उस वर्ग के नाम किया गया है, जिसके कंधों पर सही मायनों में दुनिया की उन्नति का दारोमदार है.

मई का दिन हर साल अंतर्राष्ट्रीय श्रमिक दिवस’ या ‘मजदूर दिवस’ के रूप में मनाया जाता है, जिसे ‘मई दिवस’ भी कहा जाता है, यह दिवस समाज के उस वर्ग के नाम किया गया है, जिसके कंधों पर सही मायनों में विश्व की उन्नति का दारोमदार है. इसमें कोई दो राय नहीं कि किसी भी राष्ट्र की आर्थिक प्रगति तथा राष्ट्रीय हितों की पूर्ति का प्रमुख भार इसी वर्ग के कंधों पर होता है, उद्योग, व्यापार, भवन निर्माण, पुल, सड़कों का निर्माण, कृषि इत्यादि समस्त क्रियाकलापों में श्रमिकों के श्रम का महत्वपूर्ण योगदान होता है.

वर्तमान मशीनी युग में भी उनकी महत्ता कम नहीं है. इस वर्ष यह दिवस एक बार फिर ऐसे विकट अवसर पर मनाया जा रहा है, जब कोरोना की दूसरी भयावह लहर के कारण रोज कमाने, रोज खाने वाले मजदूरों के सामने फिर से रोजी-रोटी का बड़ा संकट पैदा हो गया है. पिछले साल लगे लंबे लॉकडाउन के कारण उद्योगों की सेहत पर बहुत बुरा असर पड़ा था, जिसका असर अभी तक महसूस किया जा रहा था और एक बार फिर वैसी परिस्थितियां बन चुकी‌‌ श्रमिक दिवस और श्रम के महत्व को रेखांकित करते हुए फ्रँकलिन डी रूजवेल्ट का कहना था कि किसी व्यवसाय को ऐसे देश में जारी रहने का अधिकार नहीं हैं जो अपने श्रमिकों से जीवन निर्वाह के लिए आवश्यक मजदूरी से भी कम मजदूरी पर काम करवाता है जीवन निर्वाह के लिए आवश्यक मजदूरी से उनका आशय सम्मानपूर्वक जीवन निर्वाह के लिए आवश्यक मजदूरी से था. इसी प्रकार अब्राहम लिंकन ने कहा था कि अगर कोई व्य‌‌क्ति कहे कि वह अमेरिका पर भरोसा करता है, फिर भी मजदूर से डरता है तो वह एक बेवकूफ है और अगर कोई कहे कि वह अमेरिका से प्यार करता है, फिर भी मजदूर से नफरत करता है तो वह झूठा है. मार्टिन लूथर किंग जूनियर के शब्दों में कहें तो इंसानियत को ऊपर उठाने वाले सभी श्रमिकों को अपनी प्रतिष्ठा और महत्व है, अतः श्रम साध्य उत्कृष्टता के साथ किया जाना चाहिए, एडम स्मिथ ने बहुत ही स्पष्ट शब्दों में कहा था कि दुनिया की सारी सम्पदा को सोने अथवा चांदी से नहीं बल्कि मजदूरी के द्वारा खरीदा जा सकता है.

अब जान लें कि अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर श्रमिक दिवस कब से और क्यों मनाया जाता है? अमेरिका में 8 घंटे से ज्यादा काम न कराने के लिए की गई कुछ मजदूर यूनियनों की हड़ताल के बाद 1 मई 1886 से अंतर्राष्ट्रीय श्रमिक दिवस मनाए जाने की शुरुआत हुई थी. दरअसल वह ऐसा समय था, जब कार्यस्थल पर मजदूरों को चोट लगना या काम करते समय उनको मृत्यु हो जाना आम बात थी. ऐसी दुर्घटनाओं को रोकने, कार्य करने के घंटे कम करने तथा सप्ताह में एक दिन के अवकाश के लिए मजदूर संगठनों द्वारा पुरजोर आवाज उठाई गई. 

1 मई 1886 का ही वह दिन था, जब वह हड़ताल हुई थी और शिकागो शहर के हेय मार्केट चौराहे पर उनकी रोज सभाएं होती थी. 4 मई 1886 को जब शिकागों के हेय मार्केट में उस हड़ताल के दौरान पुलिस भीड़ को तितर बितर करने का प्रयास कर रही थी, उसी दौरान किसी अज्ञात शख्स ने एकाएक भीड़ पर बम फेंक दिया. उसके बाद पुलिसिया गोलीबारी के कारण कई श्रमिक मारे गए, हालांकि उस समय अमेरिकी प्रशासन पर उन घटनाओं का कोई असर नहीं पड़ा लेकिन बाद में श्रमिकों के लिए 8 घंटे काम करने का समय निश्चित कर दिया गया. मजदूरों पर गोलीबारी और मौत के दर्दनाक घटनाक्रम को स्मरण करते हुए ही 1 मई 1886 से अंतर्राष्ट्रीय श्रमिक दिवस मनाया जाने लगा. 1889 में पेरिस में अंतर्राष्ट्रीय महासभा की द्वितीय बैठक में फ्रांसीसी क्रांति को याद करते हुए एक प्रस्ताव पारित किया गया कि इसे अंतर्राष्ट्रीय मजदूर दिवस’ के रूप में मनाया जाए, उसी समय से दुनियाभर के 80 देशों में मई दिवस’ को राष्ट्रीय अवकाश के रूप में मान्यता प्रदान की गई. भारत में ‘मई दिवस’ मनाए जाने की शुरुआत किसान मजदूर पार्टी के कामरेड नेता सिंगारावेलू चेट्यार के सुझाव पर 1 मई 1923 को हुई थी. उनका कथन था कि चूँकि दुनियाभर के मजदूर इस दिन को मनाते हैं, इसलिए भारत में भी इसे मनाया जाना चाहिए, इस प्रकार भारत में 1 मई 1923 से मई दिवस को राष्ट्रीय अवकाश के रूप मान्यता दी गई. जहां तक मजदूरों द्वारा अपने अधिकारों की मांग का सवाल है तो मजदूरों के संगठित क्षेत्र द्वारा ऐसी मांगों पर उन्हें अक्सर कारखानों के मालिकों की मनमानी और तालाबंदी का शिकार होना पड़ता है और प्रायः जिम्मेदार अधिकारी भी कारखानों के मालिकों के मनमाने रवैये पर लगाम लगाने की चेष्य नहीं करते, जहां तक मजदूर संगठनों के नेताओं द्वारा मजदूरों के हित में आवाज उठाने की बात है तो आज के दौर में अधिकांश ट्रेड यूनियनों के नेता भी भ्रष्ट राजनीतिक तंत्र का हिस्सा बने हैं, जो विभिन्न मंचों पर श्रमिकों के हितों के नाम पर शोर तो बहुत मचाते नजर आते हैं लेकिन अपने निजी स्वार्थों को पूर्ति हेतु कारखानों के मालिकों से सांठगांठ कर अपने ही श्रमिक भाइयों के हितों पर कुल्हाड़ी चलाने में संकोच नहीं करते.

(लेखक- योगेश कुमार गोयल)

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