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अनुपम आस्था का केंद्र बुंदेलखंड की अयोध्या कहा जाने वाला टीकमगढ़

अनुपम आस्था का केंद्र बुंदेलखंड की अयोध्या कहा जाने वाला टीकमगढ़


टीकमगढ़ मध्य प्रदेश का एक छोटा शहर और जिला मुख्यालय है। यह जिला ऐतिहासिक एवं सांस्कृतिक दृष्टि से धनी कहा जा सकता है। टीकमगढ़ अपनी बिरासत में सांस्कृतिक, साहित्यक, भौगोलिक, एवं राजनीतिक दृष्टि से बहुत कुछ संजोये हुए है। फिलहाल विगत दो वर्ष पूर्व कुछ राजनीतिक एवं प्रशासनिक कारणों व जरूरतों के हिसाब से टीकमगढ़ जिला दो भागों विभक्त हो गया है। टीकमगढ़ जिले की ही एक पुरानी तहसील निवाड़ी को मध्य प्रदेश शासन द्वारा जिले का दर्जा प्रदान कर दिया गया।

भगवान कृष्ण के नाम ‘टीकम’ से बनी टीकमगढ़ की पहचान

जिले के अंतर्गत क्षेत्र ओरछा के सामंती राज्य जो वर्तमान मे नवनिर्मित निवाड़ी जिले का एक हिस्सा गया है। वह भारतीय संघ के साथ अपने विलय तक हिस्सा था। ओरछा राज्य रुद्रप्रताप सिंह द्वारा 1501 में स्थापित किया गया था। विलय के बाद यह 1948 में विंध्य प्रदेश के आठ जिलों में से एक बन गया। 1 नवम्बर को राज्यों के पुनर्गठन के बाद सन् 1956 में यह नए नक्काशीदार मध्य प्रदेश राज्य का एक जिले में बन गया। दो वर्ष पूर्व टीकमगढ़ जिले के उदर से उत्पन्न नवनिर्मित निवाड़ी जिले ने वर्तमान में जिले का भौगोलिक एवं सांस्कृतिक परिदृश्य ही बदल कर रख दिया है। पूर्व में बेतवा नदी जिले की पूर्वी सीमा के साथ बहती थी। उसकी सहायक नदियों में से एक के उत्तर पश्चिमी सीमा के साथ वहती है।बेतवा की सहायक नदियों इस जिले से जामनी, बागड़ी और वरुआ हैं। पूर्व में ऐतिहासिक एवं सांस्कृतिक दृष्टि से श्रीरामराजा सरकार की नगरी ओरछा भी जहां टीकमगढ़ जिले का प्रमुख अंग हुआ करती थी। वहीं अब टीकमगढ़ जिले के लोगों को बतौर जिले की सीमा के अंर्तगत आने वाले कुण्डेश्वर महादेव के प्राचीन एवं ऐतिहासिक स्थल से संतोष करना पड़ रहा है। कुंडेश्वर गांव टीकमगढ़ से 5 किमी दक्षिण में जमड़ार नदी के किनारे बसा है। कुण्डेश्वर महादेव मंदिर के लिए प्रसिद्ध है। कहा जाता है कि मंदिर के शिवलिंग की उत्पत्ति एक कंड से हुई थी। गांव के दक्षिण में बारीधर नामक एक खूबसूरत पिकनिक स्पाट और आकर्षक ऊषा वाटर फॉल है। विनोबा संस्थान और पुरातत्व संग्रहालय भी यहां देखा जा सकता है। पूर्व में टीकमगढ़ शहर का मूल नाम टेहरी था जो पुरानी टेहरी के नाम से जाना जाता था। 1783 ई . में ओरछा विक्रमजीत 1776 1817 ई . के शासक ने ओरछा से अपनी राजधानी टेहरी जिला टीकमगढ़ में स्थानांतरित करदी थी। टीकमगढ़ ‘टीकम’ श्रीकृष्ण का एक नाम जुड़ा हुआ है। टीकमगढ़ जिला बुंदेलखंड क्षेत्र का एक हिस्सा है।

टीकमगढ़ और विभाजित हुए निवाड़ी जिले के प्रमुख ऐतिहासिक एवं सास्कृतिक स्थल 

जैन तीर्थ पपौरा जी, अहार जी, सूर्य मंदिर मड़खेरा, बंधा जी, प्राचीन किला बल्देवगढ़ स्थित बल्देवगढ़ की तोप, विध्यावासिनी माता मंदिर, कुण्डेश्वर मंदिर टीकमगढ़, मखेरा, श्रीरामराजा की नगरी ओरछा, प्राचीन किला पचेर, हजरत अब्दाल शाह पहाड़ी (पीर पावनी) जतारा, दूधदेई मंदिर, कालका माता देरी, किला गढ़ कुण्डार आदि।

महाराजा प्रताप सिंह आधुनिक टीकमगढ़ के निर्माता

Orchha

सन 1783 में झांसी के मराठा प्रबंधकों की लूट आतंक से त्रस्त होकर महाराजा विक्रमाजीत ने ओरछा राजधानी को छोड़कर टेहरी को राजधानी बना लिया था।  चूंकिि महाराजा विक्रमादित्य सिंह श्री कृष्ण यानी टीकम के अनन्य भक्त थे।इसलिये उन्होंने किले का नामकरण टीकमजी के नाम पर टीकमगढ़ रख दिया था।जब नगर की बसाहट हो गई तो नगर की बस्ती भी टीकमगढ़ नाम से जानी जाने लगी थी। विक्रमाजीत सिंह ने अपने जीवनकाल में ही पुत्र धर्मपाल सिंह को राजा बना दिया था, जिनका निःसन्तान निधन हो गया था।तत्पश्चात उनकी मझली महारानी लड़ई सरकार रोजेन्ट बनी थी।जिन्होंने दिगौड़ा के जागीरदार के ज्येष्ठ पुत्र हमीर सिंह को गोद लेकर 1854 में ओरछा, टीकमगढ़ का राजा बना दिया था। मात्र 16 वर्ष बाद 1870 में हमीर सिंह का निधन हो गया।जिस कारण रौजेंट महारानी लड़ई सरकार हमीर सिंह के छोटे भाई प्रताप सिंह दिगौड़ा को गोद लेकर ओरछा टीकमगढ़ का राजा बनाया था। राजगद्दी पर बैठते समय वह मात्र 20 वर्ष के थे, जिस कारण राज्य शासन व्यवस्था की देखरेख के लिए अंग्रेजी सरकार ने एक अंग्रेज अधिकारी मेजर ए .मायने को नियुक्त किया था।वास्तव में वर्तमान टीकमगढ़ को भव्य एवं सुंदर रूप देने में प्रताप सिंह जू देव एवं अंग्रेज अधिकारी मायने का बहुत बड़ा योगदान है।  सन 1887 में महाराजा प्रताप सिंह ने महेन्द्र सागर तालाब बनवाया था, जिसमें अनूठा महिला स्नान घाट, देवी मंदिर, चित्रगुप्त मंदिर प्रतापेश्वरमहादेव मंदिर, तालकोठी हनुमान मन्दिर, बजाज की बगिया का मंदिर है। महाराजा प्रताप सिंह का सैरगाह महेन्द्र वाग है जो अतिसुन्दर बगीचा है।ओरछा, टीकमगढ़ के महाराजा प्रतापसिंह जू देव ने अयोध्या में कनक भवन और सीता जी की जन्मस्थली नेपाल के जनकपुर की खोज कर वहां नौलखा मंदिर का निर्माण भी कराया।यह जानकारी ओरछा रियासत के सांस्कृतिक इतिहास के प्रमुख जानकार पुष्पेन्द्र सिंह परमार ने प्रदेश टुडे से साझा करते हुए बताई कि राज्य में जल प्रबंधन पर विशेष ध्यान दिया था। चिरंजीलाल माथुरकूत वीरसिंह देव चरित्र नामक ऐतिहासिक पुस्तक के पृष्ठ दो पर उल्लेखित है कि राज्य में 7086 कुआं बावड़ी बनवाए थे। 73 तालाब, स्टॉप डैम कृषि सिंचाई सुविधा के लिए खुदवाए थे। 450 प्राचीन चन्देली तालाबों की मरम्मत कराकर उनमें जल निकासी के लिये कुठियां, औनें एवं सुलूस बनवाए थे।  तालाबों से खेतों तक नहरें खुदवाई थी। इससे कृषि क्षेत्र में इजाफा हुआ था। महाराजा प्रताप सिंह के बाद वीर सिंह जू देव द्वितीय तक टीकमगढ़ को ओरछा राजवंश के द्वारा संवारी गई। वीर सिंह महाराज ने देश स्वतंत्र होने पर अपना राज्य भारत सरकार को सर्वप्रथम सौप कर देश के प्रति अपनी निष्ठा मजबूत की।आज महाराजा मधुकर शाह जूदेव नाती राजा ओरला रियासत के वंशज है। ओरछा राजवंश हमेशा से जिस कारण से देश में महत्वपूर्ण एवं गरिमा के साथ जाना जाता है, उसमें ओरछा राजवंश द्वारा हिन्दू धर्म के पहचान अयोध्या जनकपुरी की खोज एवं वहां कनकभवन एवं नौलखा मंदिर का निर्माण, मथुरा कृष्ण जन्मभूमि पर सिकंदर लोदी द्वारा तोड़े गए मंदिर केभव्य पुनर्निर्माण प्रमुख है। जिसे 1669 में पुनः तोड़ दिया गया था।पूर्ववर्ती टीकमगढ़ जिले की धरोहर ओरछा देश की 252 रियासतों में मात्र एक ऐसा राज्यवंश रहा, जिसने उस समय हिन्दू धर्म स्थलों पर मंदिर बनवाये।जब पूरे देश में मुगलों द्वारा हिन्दू मंदिर तोड़े जा रहे थे। ओरछा में रामराजा का मंदिर में जो रामराजा सरकार विराजमान है शायद अयोध्या में भी उत्तनी प्राचीन प्रतिमा न मिले। कृष्ण भगवान के लिए नाथद्वार एवं रामराजा के लिए ओरछ आज भारत के सबसे बड़े तीर्थ हैं, जिसमें मुगलकार के मूर्ति खंडन नीति के बाद भी हिन्दू धर्म के प्राचीन विग्रहों को सुरक्षित रखा जा सका।बुंदेलखंड क्षेत्र को वास्तव में आबाद करने का श्रेय सर्वप्रथम चन्देल राजा मदनवर्मन को जाता है, जिसने 1030-1165 ई. में ग्वालसागर, मदनसागर, अहार, जतारा, महोबा, मदनपुर सहित 1100 तालाबों का निर्माण करा कर इस क्षेत्र में पूरे वर्ष जल उपलब्धता पर बहुत काम किया।

रानी ने किया श्रीराम से ओरछा चलने का आग्रह  

Tikamgarh

रानी गणेशकुवरी ने भगवान श्रीराम से ओरछा चलने का निवेदन किया।उस समय श्रीराम ने रानी से तीन शर्ते रखी थी।पहली मैं जिस जगह पर बैठ जाऊंगा वहां से दूंगा नहीं। दूसरी शर्त यह थी कि वह ओरछ इसी शर्त पर जाएंगे कि उस इलाके उन्हीं का राजपात रहेगा। तीसरी शर्त यह थी कि वह अयोध्या से बाल्यावस्था में साधु – संतों के साथ पैदल पुष्य नक्षत्र ले जाए जाएंगे। अयोध्या से श्रीराम को रानी साधु – संतों के साथ 8 माह और 28 दिनों की पदयात्रा के बाद संवत 1631 चैत्र शुक्ल नवमी के दिन ओरछा लेकर आई थी। इसके बाद से ओरछ में मधुकरशाह ने श्रीराम के लिए राजपाट त्याग दिया और ओरछा में श्रीराम को सत्ता सौंपकर उनके नाम से राजकाज करने लगे।

ऐसे पहुंचे श्रीराम अयोध्या से ओरछा

अयोध्या में बसने वाले श्रीराम आखिर ओरछा कैसे पहुंचे और फिर वहाँ के होकर कैसे रह गए। इसकी कहानी भी बड़ी रोचक और एक महारानी की रामभक्ति की अद्भुत दास्तान है।दो वर्ष पूर्व टीकमगढ़ जिले से पृथक हुए निवाड़ी जिले की तहसील ओरछा में उस वक्त राजा‌‌  मधुकरशाह का राजपाट था।  उनकी रानी का नाम गणेशकुंवरी था। राजा मधुकरशाह कृष्णभक्त थे। जबकि रानी गणेशकुंवरी रामभक्त थी।एक बार राजा ने अपनी रामभक्त रानी से वृंदावन चलने को कहा।रानी श्रीराम को अपना इष्टदेव मानती थी इसलिए उन्होंने वृंदावन जाने से मना कर दिया राजा को रानी की यह बात अच्छी नहीं लगी और उन्होंने रानी गणेशकुंवरी को उलाहना दिया की यदि तुम इतनी रामभक्त हो तो अपने राम को अयोध्या ले आओ। रानौ गणेशकुंवरी को राजा मधुकरशाह की बात चुभ गई। रानी अयोध्या चली गई और सरयू किनारे कुटिया बनाकर साधना करने लगी। अयोध्या में संत तुलसीदास से आशीर्वाद पाकर उनकी तपस्या और ज्यादा कठोर हो गई। कठोर तप के बाद भी जब रानी को प्रभू श्रीराम के दर्शन नहीं हुए तो वह जलसमाधि के लिए सरयू के तट पर पहुंची। उस वक्त अयोध्या के संतों ने आक्रमणकारियों से बचाने के लिए जन्मभूमि में विराजमान श्रीराम के विग्रत को जलसमाधि देकर बालू में दबा दिया था। कहा जाता है कि उस वक्त रानी गणेशकुंवरी को सरयू के जल में श्रीराम के उसी विग्रह के दर्शन हुए।

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