Sunday, 12 April

भोपाल। आईएएस अधिकारी राजीव शर्मा का इस्तीफा मंजूर…। डिप्टी कलेक्टर निशा बांगरे का इस्तीफा नामंजूर…। पदयात्रा पर निकली, भोपाल में प्रदर्शन, झूमाझटकी, कपड़े फटे, गिरफ्तार…। इसके पहले भी रमेश थेटे प्रकरण। शशि कर्णावत बर्खास्त..। 

इसे तमाम प्रकरण मध्य प्रदेश में प्रशासन में राजनीतिक हस्तक्षेप और प्रशासन के जातिगत विभाजन की दुखद तस्वीर को ही पेश करते हैं। ये बात और है कि कोई खुल कर इस पर चर्चा नहीं करता। पहले बात करते हैं वर्तमान के दो मामलों पर। राजीव शर्मा शहडोल कमिश्नर थे। पद पर रहते सोशल मीडिया पर काफी सक्रिय रहे। सरकार के पक्ष में भी काफी पोस्ट डालीं। अचानक वीआरएस का आवेदन दिया और उन्हें मंत्रालय भोपाल में सचिव के तौर पर पोस्टिंग दी गई, वीआरएस स्वीकृत कर लिया गया। 

इधर, छतरपुर में पदस्थ निशा बांगरे ने इस्तीफा दिया। आज तक स्वीकृत नहीं हुआ। उलटे बैतूल में गृह प्रवेश के कार्यक्रम को लेकर जांच शुरू हुई। निशा नौकरी जबरन छोड़ कर अपने घर बैतूल वापस आ गईं। इस्तीफा स्वीकार करवाने को लेकर आंदोलन शुरू कर दिया। बैतूल से भोपाल पदयात्रा की। भोपाल में पुलिस से मुठभेड़ हो गई। कपड़े फाड़ दिए गए। गिरफ्तारी भी हुई। रात को रिहाई की गई। 

इस मामले में नियम केवल जाति के आधार पर लागू होते हैं? सवाल तो उठेगा। राजीव शर्मा, शर्मा हैं और निशा बांगरे अनुसूचित जाति की। मुद्दा तो बनता है। ये भी, कि निशा बांगरे ने चुनाव लड़ने का ऐलान किया था, पर सत्ता पक्ष से नही। राजीव शर्मा का रुझान सत्ता पक्ष की तरफ रहा। वो भी चुनाव लडना चाहते हैं। अंतर तो है। 

कुछ साल पहले चलते हैं। मध्य प्रदेश में बहुजन समाज पार्टी की एंट्री जब हुई, अधिकारियों का एक वर्ग बीएसपी के पक्ष में खड़ा दिखने लगा। सत्ता ने इसे शायद जान बूझकर नजरंदाज किया। फिर एक अधिकारी बीजेपी से सांसद बन गए। उनकी बेटी आईपीएस अफसर बन गई। लेकिन पिता जी के पूर्व सत्ता प्रमुख के खास रहे और वर्तमान सत्ता पक्ष के साथ हैं सो उनपे साथ ऐसा कुछ नहीं हुआ। लेकिन आईएएस रही शशि कर्णावत के साथ क्या हुआ? पहली भिड़ंत मंडला में आईएएस पल्लवी जैन गोविल से हुई थी। यहीं से जातिगत विवाद भी शुरू हुआ। मंडला का मुद्दा भ्रष्टाचार के मुद्दे में बदला और शशि कर्णावत के साथ एक भी सवर्ण अफसर खड़ा नहीं दिखा। रमेश थेटे के खिलाफ भी पूरी लॉबी आ गई। लेकिन राघव चंद्रा के खिलाफ आज तक सरकार ने चालान पेश नहीं किया, जबकि इस मामले में कोर्ट ने पूर्व प्रमुख सचिव तक को फटकार लगाई थी। निकुंज श्रीवास्तव के खिलाफ भी भ्रष्टाचार का मामला आया, क्लीन चिट दे दी गई। जुलानिया के खिलाफ और भी बड़ा मामला आया, कुछ नही हुआ। फाइल ही दब गई। और भी दर्जनों मामले आए, जिनमें अफसर शाही में साफ साफ जातिगत विभाजन दिखा। और सत्ता पक्ष ने बकायद एक वर्ग का ही साथ दिया। पूर्व आईएएस मान दाहिमा का भी एक उदाहरण आया। उनके बेटे एक बार कुछ दिनों के लिए कलेक्टर बने, पर लगातार लूप लाइन में ही रहे। आज तक। 

ये हमारी उस व्यवस्था के उदाहरण हैं, जिसके कर्णधार दूसरो पर जातिगत राजनीति का आरोप लगा रहे हैं। और सब चुप हैं। लेकिन प्रशासन का ऐसा विभाजन ठीक नही कहा जा सकता। 

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