भोपाल। पिछले विधानसभा चुनाव में गृह मंत्री अमित शाह में भोपाल के चोहत्तर बंगला क्षेत्र में बाकायदा वार रूम बनाया था और वे यहींं पांचों राज्यों का कंट्रोल रूम भी बनाने वाले थे। लेकिन ऐन वक्त पर कार्यक्रम निरस्त हो गया था। इस बार तो सीएम शिवराज को किनारे करने के सारे इंतजाम कर दिए, गुजरात की तर्ज पर टिकट देने की तैयारी हो गई। पर आधे टिकट भी हाई कमान अपने हिसाब से नही बांट पाया। मोदी और शाह की रणनीति अभी से फ्लॉप होती दिखने लगी है।
चौथी सूची चर्चा का विषय
मध्य प्रदेश विधानसभा चुनाव के लिए बीजेपी ने कुल चार कैंडिडेट लिस्ट जारी कर दी हैं. वहीं, चौथी लिस्ट चर्चा का विषय बनी हुई है. बीजेपी ने अपनी इस उम्मीदवार सूची में 57 नामों का एलान किया है, जिसमें से 24 मंत्री हैं और बाकी विधायक. लिस्ट के मुताबिक, पार्टी ने उन विधायकों को भी वापस से टिकट दे दिया है, जिनसे कार्यकर्ता नाराज हैं और जिनके खिलाफ स्थानीय स्तर पर कार्यकर्ताओं में रोष है. ऐसे में राजनीतिक विशेषज्ञों का कहना है कि शायद साल 2018 के विधानसभा चुनाव से बीजेपी ने सबक नहीं लिया. बीजेपी 11 सीटों पर इस वजह से हारी थी क्योंकि नाराज वोटर्स ने ‘नोटा’ को हार-जीत के अंतर से ज्यादा वोट दिए थे. माना जा रहा था कि इसका एक बड़ा कारण पार्टी के पुराने परंपरागत चेहरे रहे।
शिवराज को टिकट देना ही पड़ा
चुनाव की तारीख आने के पहले से ही तय हो गया था कि सीएम शिवराज को न तो प्रोजेक्ट किया जायेगा और ना ही उन्हें टिकट दिया जाएगा। पर शिवराज ने ऐसी चाल चली कि मोदी शाह को अपना फैसला वापस लेना पड़ा। रणनीति ये थी कि तीन केंद्रीय मंत्रियों और महासचिव को मैदान उतार कर शिवराज के विकल्प ले तौर पर पेश किया जाएगा। टिकट तो कुल सात सांसदों को दे चुके, पर रणनीति अभी से फेल हो गई।केवल शिवराज को ही टिकट नहीं दिया गया, वो सारे पुराने चेहरे उतर दिए, जिनके हारने की संभावना अधिक थी। चौथी सूची में शिवराज के हिसाब से ही टिकट भी दे दिए गए। अब कौन जीतेगा , कौन हारेगा ये तो बाद की बात है, ये चर्चा बीजेपी के लिए घाटे का सौदा बनती जा रही है कि एमपी के जो शिवराज चाहेंगे, वही होगा। यानि एंटी इनकंबेंसी का इलाज नहीं हो पाया।
कांग्रेस बैठे बिठाए फायदे में
कांग्रेस टिकट वितरण में भले ही लेट हो गई, लेकिन अब विश्लेषक मान रहे हैं कि उसे विलंब का फायदा मिलना तय है। वैसे भी बीजेपी के अंदर चल रही उठापटक ही उसके लिए नुकसानदेह रहेगी। कहा जा रहा है कि शिवराज के मुकाबले तीन केंद्रीय मंत्री, एक महासचिव और चार सांसद बीजेपी के मैदान में हैं, कितने सीएम बनेंगे? ऐसा पहले कांग्रेस के साथ होता था। इस बीच मोदी द्वारा कथित तौर पर शिवराज की उपेक्षा का लाभ भी कांग्रेस को ही मिलेगा, ऐसा माना जा रहा है। जनता शिवराज को तमाम योजनाओं के बावजूद पसंद नही कर रही है, ये हर सर्वे में सामने आ रहा है। पुराने विधायकों में से अधिकांश का केवल कार्यकर्ताओं में ही नहींजनता में भी विरोध है। बोल कोई कुछ नही रहा, चुनावनोआ इंतजार है।
नोटा ने बदल दिए विधानसभा चुनाव के नतीजे
पिछले चुनाव की बात करें तो एक महत्वपूर्ण फैक्टर नोटा भी रहा। नोटा पर ज्यादा वोट पड़ने के चलते 2018 के विधानसभा चुनाव में कुछ सीटों पर ये रहे थे परिणाम-
ब्यावरा में कांग्रेस ने 826 वोट से जीत हासिल की, जबकि नोटा को 1481 वोट मिले.
दमोह में पूर्व वित्तमंत्री जयंत मलैया 798 वोट से हारे और नोटा को 1299 मत मिले.
गुन्नौर में भी जीत-हार का अंतर 1984 रहा, लेकिन नोटा को 3734 लोगों ने चुना.
ग्वालियर दक्षिण का फैसला 121 वोटों से हुआ, लेकिन 1550 मतदाताओं ने नोटा दबाया.
जबलपुर में पूर्व राज्यमंत्री शरद जैन 578 वोट से हारे और 1209 लोगों ने नोटा को चुना.
जोबट में 2056 मतों से फैसला हुआ और नोटा में 5139 वोट पड़े.
मंधाता में भी जीत-हार का फैसला 1236 वोटों से हुआ था, जहां 1575 मतदाताओं ने नोटा को विकल्प बनाया.
नेपानगर में बीजेपी प्रत्याशी को जीतने के लिए 732 वोट चाहिए थे पर 2551 मतदाताओं ने नोटा का बटन दबाया.
