Friday, 10 April

क्या हमारे देश में शिक्षा का अर्थ केवल नौकरी वाले रोबोट पैदा करने तक सीमित रह गया है? क्या हम अपनी अगली पीढ़ी को आर्टीफिशियल इंटेलीजेंस का गुलाम बनाने की तैयारी कर रहे हैं? ऐसे और भी तमाम सवाल हैं, जो हमारे समाज के लिए विचारणीय हो गए हैं, लेकिन इसे विडम्बना ही कहेंगे कि हमारे पास ऐसे मुद्दों पर ध्यान देने तक का समय नहीं है। हम तो धर्म, जाति, संप्रदाय जैसे उन मुद्दों में ही उलझ कर रह गए हैं, जो केवल और केवल समाज के विघटन का ही कारण बन रहे हैं।

अपने परिवारों का विघटन तो हम पहले की कर चुके हैं, अब समाज की बारी है। देश की बात तो बाद में होगी(यह बात और है कि देश या राष्ट्र के नाम पर केवल राजनीति हो रही है)। पहले आते हैं सबसे अहम मुद्दा, शिक्षा का। शिक्षा को हम कहां लेकर आ गए हैं और कहां ले जाना चाहते हैं, इस पर शायद ही कोई विचार कर रहा होगा। हां, दिखाने के लिए संगोष्ठियों और सम्मेलनों का आयोजन जरूर किया जाता है। और इनके लिए भी एक वाक्य कहा जाता है- केवल दुकान जमाने के लिए।

कोचिंग के हब कोटा से लेकर दिल्ली के कुछ इलाकों की बात करें या भोपाल जैसे शहरों के कोचिंग संस्थानों की, तो स्कूल, कोचिंग और ऑनलाइन कंपनियां बच्चों का शोषण ही कर रही हैं और तगड़ी मलाई खा रही हैं। सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज जेएस वर्मा कमेटी ने 2012 की रिपोर्ट में लिखा था कि हजारों बी-एड कॉलेजों की गुणवत्ता के बजाय व्यापार में दिलचस्पी है। रिपोर्ट में सुकरात को उद्धृत करते हुए शिक्षण में रट्टामारी के बजाय विवेक के महत्व को बताया था। संस्था की रिपोर्ट के अनुसार अधिकांश बच्चों की हिंदी, गणित और अंग्रेजी कमजोर होने से उनकी नींव कमजोर है। स्कूल और कॉलेज में पढ़ाई नहीं होने से बच्चे ट्यूशन और कोचिंग के लिए बाध्य हैं। और अब अधिकांश पालकों व बच्चों का भरोसा भी कोचिंग-ट्यूशन पर ज्यादा हो चला है। एक अनुमान के अनुसार 85 लाख छात्रों से कोचिंग का सालाना कारोबार करीब 58 हजार करोड़ रुपए का है। रिपोर्ट यह भी कहीती है कि स्किल डेवलपमेंट और स्वरोजगार के दावों के बीच करोड़ों युवा नौकरियों के लिए भटक रहे हैं।

कोचिंग माफिया पर लगाम के लिए शिक्षा मंत्रालय ने 15 दिन पहले गाइडलाइंस जारी की हैं। ये 11 पेज की गाइडलाइंस किस कानून के तहत बनाई गई हैं? उन्हें किस अधिकारी की अनुमति से जारी किया गया है? सरकारी दस्तावेज का फाइल नंबर और जारी करने की तारीख क्या है? वेबसाइट में उपलब्ध गाइडलाइंस में इसका विवरण नहीं है। आत्महत्या की मीडिया रिपोर्टिंग के दबाव में अधकचरी गाइडलाइंस से समाधान के बजाय लालफीताशाही और भ्रष्टाचार ही बढ़ेगा, ऐसा विशेषज्ञों का मानना है।

 पीआईएल मामले में सुप्रीम कोर्ट ने 2017 में कहा था कि कोचिंग से जुड़े मर्ज को खत्म करने के लिए नियम बनाकर सरकार को कार्रवाई करनी चाहिए। उसके बाद कई कमेटी बनाने के साथ संसद में भी खूब बातें हुईं। राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 में भी कोचिंग के बढ़ते मर्ज पर चिंता व्यक्त की गई। समवर्ती सूची में होने की वजह से शिक्षा में राज्यों की महत्वपूर्ण भूमिका है। लेकिन प्रस्तावित बिल या जारी की गई गाइडलाइंस में राज्यों के साथ जरूरी परामर्श तक नहीं किया गया।

सरकारी गाइडलाइंस में अनेक जेनरिक और आदर्श नियम बनाए गए हैं। सुरक्षित जगह, ग्रेजुएट टीचर, सही फीस, वेबसाइट में सारे विवरण, भ्रामक वायदे नहीं, सीसीटीवी कैमरे, 5 घंटे से ज्यादा पढ़ाई नहीं, पसंद नहीं आने पर फीस वापसी, देर रात कोचिंग नहीं और रिजल्ट सार्वजनिक नहीं करना आदि। इन नियमों का पालन कैसे होगा और कौन कराएगा, इस बारे में गाइडलाइंस मौन हैं। इनमें उपभोक्ता संरक्षण कानून और सिविल प्रोसिजर कोड के तहत दंड का जिक्र है। लेकिन क्या इनमें से किसी एक बिंदु पर भी अमल शुरू हो सका है? किसी भी कोचिंग संस्थान में जाकर देखो, वहां क्या हालात हैं।

 लेकिन इन कानूनों के तहत मुकदमेबाजी महंगी होने के साथ पीडि़त को मुआवजा और न्याय मिलने मे कई बरस लग जाते हैं। आज भी बच्चों के बेहतर रिपोर्ट कार्ड और विजिटिंग कार्ड के सब्जबाग के नाम पर कोचिंग का धंधा चल रहा है। एनसीआरबी के आंकड़ों के अनुसार 2022 में लगभग 13000 छात्रों ने आत्महत्या की। नई गाइडलाइंस बाध्यकारी नहीं हैं। इनके मनमाफिक अमल से डमी स्कूलों और ऑनलाइन माध्यम से कोचिंग का ट्रेंड बढऩे पर शोषण के साथ काले धन का प्रभाव ही बढ़ेगा। बैंकिंग, रेलवे, नीट, जेईई और यूपीएससी जैसी परीक्षाओं में नकल और पेपर लीक रोकने के लिए सख्त सजा वाले कानून का बिल संसद में पेश होगा। लेकिन नए आपराधिक कानूनों में संगठित अपराधों के खिलाफ सख्त सजा का प्रावधान है, उन कानूनों को राष्ट्रपति की मंजूरी मिलने के बावजूद अभी तक लागू नहीं किया गया है।

देखा जाए तो हमारे देश में तमाम मुद्दों पर गाइडलाइंस बनी हैं। कानून बने हैं। लेकिन समाज में उन पर पालन करने की नीयत खत्म होती जा रही है। जो पावर में आ जाता है, वह मनमानी पर उतर जाता है। हमारे यहां पावर का मतलब तानाशाह हो जाना होता है। हम समाज को सही दिशा में ले जाने की बात तो करते हैं, लेकिन दिग्दर्शक ही तो इसे भटकाने में लगे हुए हैं। धर्मगुरूओं पर टिप्पणी तो नहीं करना चाहिए, लेकिन हाल में जिस तरह से साधु-संतों और धर्मगुरूओं की खेमेबाजी, बयानबाजी हुई और हो रही है, वो उचित नहीं जान पड़ती। फिर हम किस शिक्षा की बात करें। शिक्षा का अर्थ केवल नौकरी पाने तक सीमित करके हमने जो भूल की है, उसका प्रायश्चित कैसे होगा, नहीं कहा जा सकता।

– संजय सक्सेना

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