देश के प्रधान न्यायाधीश डी वाई चंद्रचूड़ की अगुआई वाली सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने पंजाब सरकार की ओर से दायर एक याचिका की सुनवाई करते हुए राज्यपालों की भूमिका पर जो कुछ भी कहा है, वह सभी संबंधित पक्षों के लिए चेतावनी की तरह है। भले ही सुप्रीम कोर्ट ने अभी उन सबको आत्मावलोकन की सलाह भर दी हो, परंतु यह स्थिति सचमुच चिंताजनक है कि राज्यपालों से सामान्य जिम्मेदारी का निर्वाह कराने के लिए भी राज्य सरकारों को सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाने की आवश्यकता पड़ रही है।
पिछले कुछ वर्षों से राज्यपालों और सरकारों के बीच टकराव के मामले लगातार बढ़े हैं। कह सकते हैं कि बढ़ते जा रहे हैं। राज्यपाल केंद्र सरकार द्वारा नियुक्ति किए जाते हैं, उनके संवैधानिक दायित्व और अधिकार गैर राजनीतिक होते हैं, परंतु वे राष्ट्रपति के प्रतिनिधि के बजाय राजनीतिक सरकार के प्रतिनिधि की तरह काम करते हैं। इससे सीधे टकराव की नौबत आ जाती है। जहां तक पंजाब सरकार का मामला है तो वहां राज्यपाल द्वारा विधानसभा में पारित विधेयक ही रोक लिए गए। इसी के चलते सरकार सर्वोच्च न्यायालय पहुंची है।
आखिर विधानसभा में पारित विधेयकों को मंजूरी देना राज्यपाल का संवैधानिक दायित्व है। उसकी प्रक्रिया भी पहले से तय है। यदि कोई आपत्ति है तो राज्यपाल या तो उसे राज्य सरकार को दोबारा विचार के लिए लौटा सकते हैं या फिर उसे राष्ट्रपति के पास भेज सकते हैं। किसी भी स्थिति में उन बिलों को लंबित करके रखने का भला क्या औचित्य हो सकता है। और यह अकेले पंजाब का मामला नहीं है। इसी साल अप्रैल में तेलंगाना की सरकार भी राज्यपाल के खिलाफ ऐसी ही शिकायत लेकर सुप्रीम कोर्ट आई थी।
केरल और तमिलनाडु दो और राज्य हैं, जो इसी कतार में खड़े नजर आते हैं। केरल की ओर से सीनियर एडवोकेट केके वेणुगोपाल ने सीजेआई की बेंच के सामने अर्जेंट लिस्टिंग की अर्जी डाल रखी है जबकि तमिलनाडु के मामले पर इसी महीने की 10 तारीख को सुनवाई होनी है। पश्चिम बंगाल में तो राज्यपाल और सरकार के बीच लंबा शीत युद्ध सा चल रहा है। कई बार टकराव होने की खबरें आती रहती हैं और ऐसा लगता है, मानो कहीं न कहीं राज्यपाल राजनीतिक विचारधारा के वशीभूत होकर काम कर रहे हैं।
गौर करने की बात यह है कि इन सभी राज्यों में गैर बीजेपी दलों की सरकार है। स्वाभाविक ही पहला संदेह यही होता है कि कहीं राज्यपालों की इस भूमिका के पीछे राजनीतिक समीकरणों की तो कोई भूमिका नहीं है। यह भूमिका हो या न हो, ऐसा विवाद पैदा होना दुर्भाग्यपूर्ण है। इस तरह के मामलों में तो सभी पक्षों को अतिरिक्त सावधानी बरतनी चाहिए ताकि गलती से भी यह संकेत न जाए कि देश में संवैधानिक संस्थाओं के कामकाज में राजनीति आड़े आ रही है।
स्पष्ट है कि इस कसौटी पर शासन तंत्र अपेक्षित जिम्मेदारी नहीं दिखा पा रहा। हालांकि इसके लिए किसी भी एक पक्ष पर पूरा दोष नहीं डाला जा सकता। अगर पंजाब की ही बात करें तो बिलों को मंजूरी मिलने में हुई देरी का सवाल अपनी जगह जायज हो सकता है, लेकिन विधानसभा की बैठकों के बीच तीन महीने के अंतराल का भला क्या औचित्य हो सकता है? विधानसभा का बजट सत्र मॉनसून सत्र से जा मिला। राज्य सरकार कानूनी व्याख्याओं का सहारा भले लेती रहे, यह बात स्थापित परंपराओं के खिलाफ है।
ऐसे में सुप्रीम कोर्ट ने बिल्कुल ठीक कहा कि आत्मचिंतन की जरूरत सभी पक्षों को है। लेकिन वर्तमान दौर की सबसे बड़ी विडम्बना संभवत: यही है कि आत्मचिंतन जैसी बात कहीं नहीं दिखती। सब अपनी लाइन दूसरे की लाइन को काटकर बड़ी करना चाहते हैं। अपने कपड़े कैसे ही हों, दूसरों के उघाडऩे की होड़ सी मची हुई है। संविधान से लेकर परंपराओं की व्याख्या अपने हिसाब से की जा रही है। दूसरों पर जितना कीचड़ उछाल सकते हैं, उछाल रहे हैं। न तो शब्दों की मर्यादा बच रही है और न ही राजनीति में मर्यादा की कोई जगह बची दिख रही है।
परंतु यदि राज्यपाल के संवैधानिक पद पर सुप्रीम कोर्ट तक को टिप्पणी करनी पड़े, तो यह बहुत गंभीर मामला हो जाता है। हां, इसे राजनीतिक चश्मे से हटकर देखना होगा। लेकिन लगता नहीं, इस तरह की सोच फिलहाल देखने को मिले। फिर भी उम्मीद तो कर ही सकते हैं। आज मेरी तो कल तेरी बारी भी आनी है…। परिवर्तन प्रकृति का नियम है, इसे कोई चुनौती नहीं दे सकता है। देरी हो सकती है, बस।
– संजय सक्सेना
