एक तरफ केंद्रीय एजेंसियाँ धड़ाधड़ छापे मार रही हैं, दूसरी ओर सुप्रीम कोर्ट में चुनावी चंदे के मामले में बहस चल रही है। दोनों ही मुद्दे लोकतंत्र और देश के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। छापे पड़ रहे हैं चुनावी राज्य छत्तीसगढ़-राजस्थान के साथ ही तमिलनाडु और दिल्ली में भी। दिल्ली में तो हाल यह है कि मंत्रियों के साथ ही एक सांसद भी घेरे में आ गए और अब मुख्यमंत्री की बारी है। चर्चा है, यही हाल रहा तो किसी दिन अरविंद केजरीवाल को जेल में ही केबिनेट मीटिंग न करनी पड़ जाए? सभी जगह विपक्षी दल सत्ता में हैं। सो सवाल तो उठता ही है और विपक्ष पूछ भी रहा कि ईडी और आईटी के छापे विपक्षी नेताओं पर ही क्यों पड़ रहे हैं? क्या सत्ता पक्ष के नेता सबके सब पाक-साफ़ हैं?
दूसरी तरफ़ चुनावी बॉन्ड से चंदा लेने पर बहस छिड़ी हुई है। सत्ता पक्ष और विपक्ष किसी के पास कोई जवाब नहीं है। चीफ जस्टिस डी वाई चंद्रचूड़ की अगुआई वाली बेंच ने अपना फैसला सुरक्षित रख लिया है, लेकिन सुनवाई के दौरान जिस तरह से इस मसले के अलग-अलग पहलू उभरे वह भी काफी महत्वपूर्ण है।सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश तक ने कह दिया कि राजनीतिक दलों की चंदा लेने की यह प्रक्रिया पारदर्शी नहीं है। इसका कोई उचित और पारदर्शी उपाय सोचना चाहिए और उसे लागू करना चाहिए। कोर्ट ने यहाँ तक कहा कि कारपोरेट घराने सत्ता पक्ष को ही ज़्यादा चंदा देते हैं। फिर सरकार से तरह- तरह के फ़ायदे लेते हैं।
वैसे भी इसकी गोपनीयता दूसरे राजनीतिक दलों और आम जनता के लिए ही है। जिस पार्टी को चंदा मिलता है, उसे तो पता रहता ही है कि किसने कितना दिया। जहां तक सरकार का सवाल है, उसे तो एक एक पैसे के लेनदेन का पता रहता है। ऐसे में इस छितरी हुई या एकाकी गोपनीयता का क्या मतलब है? सुप्रीम कोर्ट में बहस के दौरान न केवल चुनावी फंडिंग से बल्कि डोनेशन देने वाली कंपनियों, डोनेशन पाने वाले दलों और इन राजनीतिक दलों को अपने वोट से चुनने वाले वोटरों के अधिकारों से भी जुड़ी अलग-अलग राय सामने आई।
यह सवाल उठा कि सुप्रीम कोर्ट को इस मसले पर विचार करने का अधिकार है भी या नहीं। अदालत ने साफ किया कि चुनावी फंडिंग का जो फॉर्मैट कार्यपालिका ने बनाया है, वह संविधान की कसौटियों पर खरा उतरता है या नहीं, यह देखना उसकी जिम्मेदारी है और इसी सवाल पर वह विचार करेगी। अगर उसमें कमी पाई जाती है तो उसे कैसे ठीक किया जाए या उसकी जगह कोई दूसरा फॉर्मैट लाना है तो वह कैसा हो और कैसे आए, यह देखना सरकार का काम होगा। सुनवाई के दौरान यह बात बार-बार कही गई कि चुनावी बॉन्ड से जुड़ा कानून लाने के पीछे मंशा अच्छी थी। इस पर किसी पक्ष ने आपत्ति भी नहीं की। बावजूद इसके, फंडिंग के इस तरीके में कई तरह की दिक्कतों की बात सामने आई।
भले ही कानून लाने के पीछे कैश डोनेशन रोकने और फर्जी कंपनियों के डोनेशन पर लगाम लगाने का इरादा रहा हो, लेकिन व्यवहार में हो यह रहा है कि डोनेशन बनाम चंदे से जुड़ी विस्तृत जानकारी तक सिर्फ सरकार और सत्तारूढ़ पार्टी की पहुंच होती है किसी और की नहीं। इसका परिणाम यह देखा जा रहा कि इलेक्टोरल बॉन्ड का तकरीबन सारा हिस्सा सत्तारूढ़ दलों को जाता है और बाकी पार्टियों को नाम मात्र का हिस्सा मिलता है। या दिया जाता है। इस धारणा की पुष्टि के लिए हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग से इलेक्टोरल बॉन्ड के जरिए मिले फंड का ब्योरा पेश करने को कहा है।
परंतु यहां दो सवाल उठते हैं। पहला यह कि कहीं इससे विभिन्न राजनीतिक दलों के समानता के अधिकार की धज्जियां तो नहीं उड़ रहीं? और दूसरा, कहीं यह रिश्वत को लीगलाइज करने का तरीका तो नहीं बन गया है? दोनों के ही जवाब अप्रत्यक्ष तौर पर हां में ही सामने आ रहे हैं। एक महत्वपूर्ण मुद्द यह भी सामने आया कि अपने डोनेशन को गोपनीय रखने का कंपनियों का अधिकार ज्यादा अहम है या राजनीतिक दलों को मिल रही फंडिंग का सोर्स जानने का आम नागरिकों और वोटरों का हक? इस मसले से जुड़े इन तमाम पहलुओं पर सुप्रीम कोर्ट आखिरकार क्या रुख अपनाता है यह तो उसके फैसले से ही पता चलेगा, लेकिन फिलहाल यह उम्मीद जरूर की जा सकती है कि कोर्ट का आदेश आने वाले दिनों में चुनावी फंडिंग का स्वरूप तय करने के साथ ही चुनाव सुधारों को भी नई दिशा देने का काम करेगा।
अब आते हैं ऐन चुनावी वक्त पर डाले जा रहे छापों पर। विपक्ष का कहना है कि चुनाव के समय चुनावी राज्यों में विपक्ष को गिराने के लिए, उसके नेताओं को प्रक्रियाओं में उलझाए रखने के लिए ऐसा किया जा रहा है। जिन नॉन इलेक्शन स्टेट में छापे मारे जा रहे हैं वहाँ सत्ता पक्ष का उद्देश्य यह है कि वहाँ के नेता प्रचार करने के लिए चुनावी राज्यों में न जा पाएँ। या वहां से कोई मदद इन राज्यों को न पहुंचाई जा सके।
जहां तक सत्ता पक्ष का सवाल है उसका कहना है कि अगर विपक्षी नेता इतने ही पाक- साफ़ हैं तो डर क्यों रहे हैं? हालाँकि सत्ता पक्ष की इस बात में कोई सकारात्मक तर्क नजऱ नहीं आता। लेकिन सत्ता पक्ष का मुँह आखिर कौन बंद करा सकता है? और वहां तो ज्यादा बोलने वालों की लाइन ही लगी हुई है। खुलकर बोलने की पूरी आजादी। इधर कोई बोले तो दर्जनों एफआईआर। वैसे सही बात तो यह है कि राजनीति में प्राय: कोई भी पाक- साफ़ नहीं है। राजनीति हमाम है। हां, सत्ता का इतना लाभ उठाया जा सकता है कि विपक्षियों को पूरी तरह से तोड़ दिया जाए, ताकि वो लडऩे की स्थिति में न रहें। लेकिन लोग ये भी भूल जाते हैं कि आज तेरी तो कल मेरी बारी है…। यहां किसे रहना है, चलने की तैयारी है…।
– संजय सक्सेना
