लगता है कि नीतीश कुमार के लिए पटना का नाम पलटना ही रखना उचित रहेगा। वो कब पलटी मार जाएं, कोई नहीं बता सकता। सारी भविष्यवाणियां उनके सामने फेल हैं। गिरगिट भी शरमा जाए और उन्हें देखकर रंग बदलना भूल जाए। और अब जिस पार्टी के साथ वो फिर से जा रहे हैं, वो तो सरकारें गिराने और लपकने की चैम्पियन ही बन गई है। अब ये दुनिया के इस विशाल लोकतंत्र की विडम्बना है या अधिसंख्य जनमत की बेचारगी कि वो न तो ठीक से लोकतंत्र ही समझ पा रही है और न ही अपना भला-बुरा समझने की उसमें शक्ति बची है। वो तो जैसे बाढ़ वाली नदी में बहती चली जा रही है और समस्याओं के आगे समर्पण कर आत्महत्या ही उसके सामने शायद अंतिम विकल्प बचता है।
नीतीश की बात करें तो गठबंधन से अलग होने की नीतीश कुमार की अपनी अलग स्टाइल है। वह मुख्यमंत्री रहते चौथी बार अपनी एनडीए और लालू परिवार से गठबंधन तोड़ चुके हैं। कभी लालू तो कभी मोदी का साथ छोड़ा। गठबंधन तोडक़र भी वह सत्ता में रहे हैं। भ्रष्टाचार के मुद्दे पर 2017 में लालू परिवार का साथ छोड़ा, अब परिवारवाद का दाग लगाकर वह अलग हो गए हैं।
महागठबंधन में टूट की चर्चा तो काफी दिनों से हो रही थी, लेकिन कर्पूरी ठाकुर के बहाने नीतीश कुमार ने अपने स्टाइल में गठबंधन में टूट का संकेत दे दिया था। नीतीश के बयान के 24 घंटे बाद आए रोहिणी के ट्वीट ने बिहार की राजनीति की तस्वीर साफ कर दी और अब बिहार में नई सरकार की तैयारी है।
26 जुलाई 2017 को नीतीश कुमार ने भ्रष्टाचार के मुद्दे पर महागठबंधन से नाता तोड़ लिया था। बीजेपी के साथ मिलकर सरकार बनाई और खुद सीएम बन गए। भ्रष्टाचार को लेकर विपक्ष के सवालों का जवाब नीतीश कुमार ने महागठबंधन तोडक़र दिया।
महागठबंधन तोडऩे से एक माह पहले ही नीतीश कुमार की स्टाइल बदल गई थी। वह बार-बार तेजस्वी से विपक्ष के सवालों का जवाब मांग रहे थे, लेकिन तेजस्वी की खामोशी नहीं टूटी। नीतीश कुमार ने भ्रष्टाचार पर बयान दिया और फिर अचानक से इस्तीफा दे दिया। मौजूदा समय की तरह 2017 में भी पॉलिटिकल एक्सपर्ट सीएम के स्टाइल से भांप गए थे, वह बड़ा खेला करने वाले हैं। देखा जाए तो नीतीश कुमार जब भी किसी गठबंधन के बंधन से बाहर निकलते हैं, राजगीर चले जाते हैं। इसलिए अचानक शांत हो जाते हैं। कुछ दिन बाद फिर खुश होते हैं। इसके बाद कोई न कोई बड़ा निर्णय ले लेते हैं। अब तक की नीतीश कुमार की यही स्टाइल रही है। इस बार भी नीतीश कुमार 2017 को दोहराते दिखे हैं।
14 साल पुराने लैंड फार जॉब मामले में जुलाई 2023 में सीबीआई ने डिप्टी सीएम तेजस्वी यादव के खिलाफ ताजा चार्जशीट दाखिल कर दी। तेजस्वी के बहाने एक बार फिर सीएम नीतीश कुमार पर हमला बोला गया, लेकिन सीएम ने कोई जवाब नहीं दिया। नीतीश ने 2017 की तरह न तो तेजस्वी से जवाब मांगा और ना ही कोई प्रतिक्रिया व्यक्त की। वह शांत हो गए और फिर पुराने स्टाइल में दिखने लगे। राजनीतिक जानकारों को लग रहा था कि नीतीश कुमार एक बार फिर भ्रष्टाचार के मुद्दे पर लालू परिवार का साथ छोड़ एनडीए में चले जाएंगे। लेकिन, नीतीश की खामोशी ने सारी अटकलों पर सवाल खड़े कर दिए। इस बीच उन्होंने बड़ा फैसला लिया और ललन सिंह को हटाकर खुद जेडीयू की कमान संभाल ली। इसके बाद वह अपने स्टाइल में दिखने लगे। शांत हुए और राजगीर भी गए।
कर्पूरी ठाकुर को भारत रत्न की घोषणा के बाद नीतीश कुमार ने पीएम नरेंद्र मोदी की तारीफ की। साथ ही, कर्पूरी ठाकुर की जयंती पर परिवारवाद का मुद्दा उठाकर लालू पर सवाल खड़ा कर दिया। नीतीश कुमार ने परिवारवाद पर जब भी बोला है, बड़ा बवाल मचा है। नीतीश कुमार ने बिना नाम लिए परिवारवाद के मुद्दे पर लालू परिवार पर अटैक कर दिया था। 2020 में विधानसभा में नीतीश कुमार ने कहा, बेटियों पर नहीं था भरोसा, नौ-नौ बच्चे पैदा किए। इस बयान के बाद घमासान मच गया था। इसके पूर्व नीतीश कुमार ने तेज प्रताप और ऐश्वर्या को लेकर भी कटाक्ष किया था।
इसके बाद, तेजस्वी बौखला गए और विधानसभा में ही नीतीश के साथ टकराहट हो गई थी। इस बार भी परिवारवाद पर नीतीश कुमार ने जैसे ही बयान दिया, लालू परिवार की बौखलाहट बढ़ गई। तेजस्वी तो आक्रामक नहीं हुए, लेकिन रोहिणी के ट्वीट के बाद बिहार की राजनीति में आग में पेट्रोल का काम किया। जानकार मानते हैं कि नीतीश कुमार इधर काफी दिनों से असहज दिखाई पड़ रहे थे। वह खुद को सहज नहीं कर पा रहे थे। इसके पीछे बड़ा कारण राजनीतिक था। वह लालू परिवार के साथ रहकर विपक्ष के सवालों का जवाब नहीं दे पा रहे थे। नीतीश कुमार भ्रष्टाचार और कथित जंगलराज का विरोध कर सत्ता में आए थे। लैंड फॉर जॉब्स पर लालू परिवार पर फिर भ्रष्टाचार का आरोप लगने लगा। नीतीश कुमार इससे बाहर निकलने का बहाना ढूंढ रहे थे।
नीतीश कुमार को सही समय मिला तो परिवारवाद के मुद्दे पर अलग होने का कारण ढूंढ लिया। नीतीश कुमार ने 2020 का विधानसभा चुनाव बीजेपी के साथ मिलकर लड़ा और सफलता भी पाई। चुनाव में जेडीयू के हिस्से में महज 43 सीटें आईं, जबकि बीजेपी ने 74 पर विजय पताका लहराया। इसके बाद भी सीएम के पद पर नीतीश कुमार की ताजपोशी हुई, लेकिन 2022 में फिर नीतीश कुमार का एनडीए से मोह भंग हो गया।
दो साल बाद 2022 में नीतीश कुमार ने एक बार फिर अपने स्टाइल में गठबंधन तोड़ा और कहा कि उन्हें बीजेपी से दिक्कत होने लगी है। नीतीश कुमार ने सीएम पद से इस्तीफा दिया और बीजेपी का साथ छोड़ एक घंटे के अंदर राजद के साथ हो गए। नीतीश कुमार ने राजद, कांग्रेस और लेफ्ट के साथ मिलाकर सरकार बना ली और तेजस्वी को फिर से डिप्टी सीएम बना दिया। अब एक बार फिर नीतीश कुमार का आरजेडी से मोह भंग हुआ है और फिर से एनडीए गठबंधन का हिस्सा बनने जा रहे हैं। आज उनकी फिर ताजपोशी होना तय है और अब सत्ता में सहयोगी बनेगी भाजपा। शायद वो यह भी समझ गए कि राम लहर में भाजपा का विरोध उन्हें महंगा पड़ सकता है। और फिर तेजस्वी के बाद उनका भी नंबर आ सकता है। आखिर ईडी-सीबीआई के निशाने पर वह भी तो हैं। सो उन्होंने एक बार फिर चोला बदल लिया।
वाह रे लोकतंत्र। ताली बजाओ। दिखाने के लिए खुश हो जाओ। फिर उलझ जाओ अपनी समस्याओं में। कोसते रहो किस्मत को। बेचारगी, चमचागिरी, गिड़गिड़ाने की आदत, दरबार में हाजिरी लगाने का शौक। ये ही शायद अब हमारे लोकतंत्र की असल पहचान बन गए हैं। इनका चरम आत्महत्या तक ले जाता है। जयहिंद।
– संजय सक्सेना
