Wednesday, 1 April

नई दिल्ली। केंद्र ने 11 अगस्त को एक बड़े कदम के तहत हुए आईपीसी, सीआरपीसी और भारतीय साक्ष्य अधिनियम की जगह लेने के लिए लोकसभा में तीन नए विधेयक पेश किए थे। उस दौरान कहा गया था कि राजद्रोह कानून को पूरी तरह समाप्त किया जा रहा है। लेकिन सुप्रीम कोर्ट केंद्र के बात से इत्तेफाक नहीं रखता। यही वजह है कि राजद्रोह कानून पर सीजेआई चंद्रचूड़ की अगुवाई वाली बेंच खुद सुनवाई करने जा रही है।

सुप्रीम कोर्ट की वेबसाइट पर 12 सितंबर के लिए अपलोड किए गए केसों की लिस्ट के अनुसार आईपीसी की धारा 124ए (राजद्रोह) की वैधता को चुनौती देने वाली याचिकाएं सीजेआई डीवाई चंद्रचूड़, जस्टिस जेबी पारदीवाला व जस्टिस मनोज मिश्रा की बेंच के समक्ष सुनवाई के लिए आएंगी।

मई 2022 में शीर्ष न्यायालय ने राजद्रोह से जुड़े कानून पर लगा दी थी रोक

ध्यान रहे कि 11 मई 2022 को एक ऐतिहासिक आदेश में शीर्ष न्यायालय ने राजद्रोह से जुड़े कानून पर तब तक के लिए रोक लगा दी थी, जब तक कि सरकारी इसकी समीक्षा नहीं करती। अदालत ने केंद्र और राज्यों को इस कानून के तहत कोई नई FIR दर्ज नहीं करने का निर्देश दिया था। न्यायालय ने व्यवस्था दी थी कि देशभर में राजद्रोह कानून के तहत जारी जांच, लंबित मुकदमों और सभी कार्यवाही पर भी रोक रहेगी।

क्रांतिकारियों पर अंकुश के लिए आजादी से 57 साल पहले आया था कानून

इस कानून के तहत अधिकतम आजीवन कारावास तक की सजा का प्रावधान है। इसे देश की आजादी से 57 साल पहले लागू किया गया था। जब ये कानून बनाया गया तब आईपीसी को बने लगभग 30 साल हो चुके थे। उसके बाद 1890 में क्रांतिकारियों पर अंकुश के लिए अंग्रेजी सरकार ने इस कानून को लागू किया था। अंग्रेजी सरकार समझती थी कि आजादी की अलख जगाने वालों के लिए एक सख्त कानून की जरूरत है।

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