●सरकारी कामकाज में पारदर्शिता और भ्रष्टाचार पर लगाम लगाने के लिए 19 साल पहले लागू किए गए सूचना का अधिकार कानून काे सरकारी नुमाइंदे कमजाेर करने में लगे हैं
●समय बीतने के साथ ही कानून धारदार बनते हैं, लेकिन आरटीआई कानून काे लगातार कमजाेर करने की काेशिश….
- शेख अफ़रोज़ हरदा/ नियम कानून के नाम पर ,अपने वरिष्ठ अधिकारियों के समक्ष वाह वाही लूटने के उद्देश्य से कुछ तानाशाही ,हिटलर प्रवृत्ति के अधिकारी अपने अधीनस्थ काम करने वाले छोटे कर्मचारियों का काम के नाम पर ख़ून चूसने से तनिक भी परहेज नहीं कर रहे हैं , इन छोटे कर्मचारियों को 36-36 योजनाओ की जिम्मेदारी स्टॉफ कम होने के नाम पर थोपकर ,दिन तो दिन रातो में भी काम करवाते हैं ,पर जब बात इन स्वयं सम्भू अधिकारियों की आती है ,तो यह नियम कानून को ताख में रखकर मनमानी करते दिखाई पड़ते हैं ,वह चाहते हैं कि उनके द्वारा किया गया काला पीला किसी के सामने नहीं आए और यह शासन-प्रशासन के द्वारा दी जाने वाली राशि ,योजनाओं का मने माने तरीको से संचालन कर राशि का बंदर बाट करते रहे।इनकी सेटिंग इतनी जबरदस्त होती है के यह शासन के द्वारा समय- समय पर जनहित ,जनकल्याण से सबंधित चलाए जाने वाले अभियानों में लगने वाली सामग्री जैसे- विवाह सम्मेलनो में दी जाने वाले उपहार की सामग्री ,या फिर पौधेरोपण करने के नाम पर पौधे खरीदने की बात हो या फिर हर घर झंडा जैसे कार्यक्रम में झंडे खरीदना हो यह लोकल मार्केट में मिलने वाले रेट से भी कई गुना अधिक रेट में , घटिया किस्म की भोपाल जैसे बड़े शहरो से खुद का मौटा पर्सेंटेच ,मार्जिक मानी सेट करके ,अपने अधीनस्थ काम करने वाले कर्मचारियों को खरीदने के लिए मजबूर करके ख़रीदवाते हैं।
जबकि उससे कम कीमत में जिले में भी वही चीजे मौजूद हैं, मिलजाती है ।लेकिन यह खुद को महाज्ञानी, स्वयं सम्भू समझने वाले अधिकारियों का क्या कहना मिया मिट्ठू बने फिरते है,बात इनकी कार्यशैली की यदि की जाए तो उनके अधीनस्थ काम करने वाले जो भी जनप्रतिनिधि,या शासकीय,अर्धशासकीय जो भी संघ है उनमें जो वरिष्ठ पद लेकर बैठे है उनको छोड़कर सभी इन से दुखी है, यह उनको बार-बार झूठ ही अपने स्थांतरण होने की बात करके उनसे सहानुभूति बटोरते दिखाई पड़ते है संगठनों में वरिष्ठ पदों पर बैठे पदाधिकारीयो से इनकी खूब बनती क्योंकि यह उनकी चापलूसी करते नहीं थकते उन्हीं को आधार बना कर यह उनके साथ काम करने वाले छोटे कर्मचारियों का खूब शोषण करते हैं । यह स्वयं शंभू अधिकारी जहां पर भी सेवा देते वहा इनके चर्चे इनके जाने के बाद भी इनको जानने-पहचानने वाले लोगो और साथ मे काम करने वाले अधिकारी-कर्मचारियों के मध्य खूब सुने जा सकते हैं ,यह व्यक्तियों को उनके मौलिक अधिकारों से वंचित करने में भी परहेज नही करते हैं।जनता भी इनके कामो से संतुष्ट नही दिखाई देती हैं।
इससे मिलता-जुलता एक मामला जनपद पंचायत खिरकिया में देखने को भी मिला रहा हैं –
खिरकिया जनपद पंचायत में एक कथित आर टी आई कार्यकर्ता द्वारा उनकी स्वंय कि लगाई गई आर टी आई ,अपीलों पर विभाग द्वारा की गई कार्यवाहियों से सम्बंधित जानकारी rti में मांगी गई थी,क्योकि इनकी पुर्व में लगाई गई आरटीआई में जनहित से सम्बंधित कुछ अति महत्पूर्ण जानकारी,अपील जनपद पंचायत खिरकिया में की गई एवं सूचना मांगी गई थी,लेकिन यहा मौजूद लोक सूचना अधिकारी,अपील अधिकारी की मनमानी इस कदर हावी हुई के यह इस महत्वपूर्ण एक्ट को भी हवा में उड़ाते दिखाई दिये ना तो rti में मांगी गई जानकारी अब तक नही दी गई और ना ही ,अपील के किसी निर्णय ,सुनवाई के विषय मे सूचना ,जानकारी, पत्राचार किया गया।सबसे बड़ी बात तो यह के एक्ट को लागू हुए 19 वर्ष के आसपास होने को हैं ,लेकिन इसके बाद भी आज तक जनपद में rti सबंधित सूचना बोर्ड तक देखने को नही मिल रहा हैं ।यह जिम्मेदार अधिकारियों जानकारी को सार्वजनिक करने से किस लिए परहेज कर रहे हैं इनको किस बात का भय हैं और डर हैं ,यह एक बड़ा सवाल है?
