नई दिल्ली में रविवार को विदेश मंत्री डॉ. एस. जयशंकर ने अमेरिकी विदेश मंत्री मार्क रुबियो के साथ अहम द्विपक्षीय वार्ता की। बातचीत में व्यापार समझौता, ऊर्जा सुरक्षा, रक्षा सहयोग, नई तकनीक और ईरान-इज़राइल तनाव के बीच समुद्री व्यापार की सुरक्षा जैसे मुद्दे केंद्र में रहे। यह बैठक ऐसे समय हुई जब पश्चिम एशिया में अस्थिरता बढ़ रही है, वैश्विक तेल बाजार दबाव में हैं और इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में चीन की गतिविधियों को लेकर अमेरिका अपने साझेदारों के साथ रणनीतिक तालमेल तेज कर रहा है। 26 मई को होने वाली क्वाड बैठक से पहले हुई इस बातचीत को भारत-अमेरिका रिश्तों के अगले चरण की तैयारी माना जा रहा है।
दिल्ली में कई कूटनीतिक मुलाकातें होती हैं। बयान जारी होते हैं, हाथ मिलते हैं, तस्वीरें आती हैं और खबर खत्म हो जाती है। लेकिन इस बैठक के बाद जिस तरह “ऊर्जा सुरक्षा”, “समुद्री स्थिरता” और “क्रिटिकल टेक्नोलॉजी” जैसे शब्द लगातार सामने आए, उसने संकेत दिया कि बातचीत का दायरा सामान्य प्रोटोकॉल से बड़ा था।
भारत अभी एक साथ कई दबावों को संभाल रहा है। घरेलू स्तर पर महंगाई को नियंत्रित रखना है, बाहर चीन की आक्रामकता है, पश्चिम एशिया में युद्ध जैसे हालात हैं और वैश्विक सप्लाई चेन लगातार अस्थिर बनी हुई है। ऐसे में अमेरिका के साथ बढ़ती नजदीकी अब सिर्फ रणनीतिक फोटो-ऑप नहीं रह गई। इसका सीधा रिश्ता भारतीय अर्थव्यवस्था और सुरक्षा से जुड़ चुका है।
ऊर्जा को लेकर जयशंकर का जोर खास था। भारत जानता है कि अगर ईरान-इज़राइल तनाव और बढ़ा तो सबसे पहले असर तेल बाजार पर दिखाई देगा। पेट्रोल-डीजल महंगा होता है तो उसका असर सिर्फ ट्रांसपोर्ट पर नहीं, सब्जियों से लेकर फैक्ट्री लागत तक पहुंचता है। यही वजह है कि भारत अब ऊर्जा आपूर्ति के मामले में “एक स्रोत पर निर्भर” मॉडल से दूर जा रहा है। रूस से तेल खरीद जारी रखने के साथ अमेरिका से ऊर्जा सहयोग बढ़ाने की बात उसी रणनीति का हिस्सा है।
वॉशिंगटन भी इस रिश्ते को अलग नजर से देख रहा है। अमेरिकी विदेश मंत्री मार्क रुबियो ने भारत को “सबसे महत्वपूर्ण वैश्विक साझेदारों” में बताया। यह बयान सिर्फ कूटनीतिक शिष्टाचार नहीं माना जा रहा। अमेरिका को इंडो-पैसिफिक में एक ऐसे सहयोगी की जरूरत है जो चीन के बढ़ते प्रभाव के सामने आर्थिक और सामरिक संतुलन बना सके। भारत इस भूमिका में फिट बैठता है, लेकिन अपनी शर्तों पर।
दिलचस्प यह है कि नई दिल्ली अब भी “गठबंधन राजनीति” वाली भाषा से दूरी रखती है। भारत रूस के साथ भी संवाद बनाए रखता है, अमेरिका के साथ रक्षा सहयोग भी बढ़ाता है और खाड़ी देशों के साथ ऊर्जा संबंध भी मजबूत करता है। विदेश नीति के भीतर यही संतुलन आज भारत की सबसे बड़ी ताकत माना जा रहा है।
इस बातचीत में रक्षा तकनीक और नई टेक्नोलॉजी का मुद्दा भी अहम रहा। सेमीकंडक्टर, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और एडवांस डिफेंस सिस्टम अब सिर्फ तकनीकी सेक्टर की चर्चा नहीं रहे। आने वाले दशक में यही क्षेत्र तय करेंगे कि वैश्विक शक्ति संतुलन किस तरफ झुकेगा। भारत लंबे समय तक सिर्फ बाजार की भूमिका में रहा, लेकिन अब वह टेक्नोलॉजी पार्टनर की भूमिका चाहता है।
क्वाड बैठक से ठीक पहले यह वार्ता होने का अपना महत्व है। अमेरिका, जापान और ऑस्ट्रेलिया के साथ भारत का सहयोग बढ़ रहा है, लेकिन नई दिल्ली अब भी इस मंच को सैन्य गठबंधन की तरह पेश करने से बचती है। चीन पर खुली बयानबाजी से दूरी रखते हुए भी भारत धीरे-धीरे इंडो-पैसिफिक रणनीति में अपनी स्थिति मजबूत कर चुका है।
दिल्ली के नीति विशेषज्ञों का मानना है कि भारत की विदेश नीति अब “प्रतिक्रिया आधारित” नहीं रही। पहले संकट होता था, फिर प्रतिक्रिया आतीo थी। अब भारत पहले से अपनी स्थिति तय करने की कोशिश कर रहा है। यही वजह है कि व्यापार, ऊर्जा, रक्षा और समुद्री सुरक्षा चारों मुद्दे अब एक-दूसरे से जुड़े हुए दिखाई देते हैं।
इस मुलाकात का असली संदेश शायद यही है: भारत अब सिर्फ वैश्विक घटनाओं पर नजर रखने वाला देश नहीं रहना चाहता। वह उन टेबल्स पर अपनी जगह स्थायी करना चाहता है जहाँ दुनिया की अगली रणनीतियाँ तय होंगी।
