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ऊदन शाह का बसाया छोटासा गांव आज कहलाता है सागर

ऊदन शाह का बसाया छोटासा गांव आज कहलाता है सागर


मध्य प्रदेश का एक महत्वपूर्ण शहर है। सागर का इतिहास सन 1660 से आरंभ होता है , जब हुसैन शाह ने तालाब के किनारे स्थित वर्तमान किले के स्थान पर एक छोटे किले का निर्माण करवा कर उस के पास परकोटा नाम का गांव बसाया था ।निहालशाह के वंशज ऊदन शाह द्वारा बसाया गया वही छोटा सा गांव आज सागर के नाम से जाना जाता है। परकोटा अब शहर के बीचों बीच स्थित एक मोहल्ला है ।
वर्तमान किला और उसके अंदर एक बस्ती का निर्माण पेशवा के एक अधिकारी गोविंदराव पंडित ने कराया। सन 1735 के बाद जब सागर पेशवा के आधिपत्व में आ गया, तब गोविंदराव पंडित सागर और आसपास के क्षेत्र का प्रभारी था। समझा जाता कि इसका नाम ‘सागर’ उस विशाल सागर झील (लाखा बंजारा झील) के कारण पड़ा जिसके किनारे नगर स्थित है (बुन्देलखण्ड) सागर को स्मार्ट सिटी योजना में शामिल किया गया है वर्तमान में सागर जिले में 11 जनपद पंचायतें हैं। जिनके अंतर्गत 755 ग्राम पंचायतें आती हैं। 10 नगरीय निकाय है। सागर शहर नगर निगम की सीमा में आता है। सागर संभागीय मुख्यालय भी है । जिसके अंतर्गत 6 जिले सागर, दमोह, पन्ना, छतरपुर, टीकमगढ़ और निवाड़ी आते हैं। सागर जिले की स्थापना सन 1860 में हुई, सागर के प्रथम डिप्टी कमिश्नर केप्टिन जी एफ एस ब्राउन दिनांक 1-8-1860 19-9-1861 तक पदस्थ रहे।

रहली का सूर्य मंदिर 

रहली सागर जिला मुख्यालय के दक्षिण – पूर्व में करीब 42 किमी की दूरी पर सुनार और देहार नदियों के संगम पर स्थित है। बुदेलखंड में प्राचीन मंदिर बहुतायत में पाए जाते हैं। रहली इसका अपवाद नहीं और इसके आसपास कई सुंदर मंदिर। यहां से दो किमी दूर पंढलपुर ढाई सौ साल पुराना पंढरीनाथ का मंदिर है। यहां से करीब 5 किमी दूर तिखी में टिकी टोरिया का मंदिर है। यहां वास्तुकला की दृष्टि से एकमात्र महत्वपूर्ण वस्तु एक प्राचीन मंदिर के चबूतरे का एक भाग है।

गढ़पहरा

गढ़पहरा को पुराना सागर भी कहते हैं जोडांगी राज्य की राजधानी था। यह झांसी मार्ग पर सागर से करीब 10 किमी की दूरी पर स्थित है । इसकी प्राचीनता गौड शासक संग्रामसिंह के समय से मानी जाती है। उस समय गढ़पहराएक गढवा जिसमें 360 मौजे थे। बाद में डांगी राजपूतों ने इस भाग को जीतकर अपने राज्य में मिला लिया गढ़पहरा के अब भी कुछ ऐतिहासिक अवशेष बाकी हैं। कम ऊंचाई के क्षेत्र पर निर्मित किले के खंडहरों तक आज भी आसानी से पहुंचा जा सकता है।

राहतगढ़ जलप्रपात 

राहतगढ़ जलप्रपात भारत के मध्य प्रदेश प्रदेश मे स्थित एक जलप्रपात सागर-भोपाल मार्ग पर करीब 40 किमी दूर स्थित राहतगढ़ कस्बा वॉटरफॉल के कारण अब एक बेहद लोकप्रिय पिकनिक स्पॉट है। प्राचीन काल में यह अपने कंगूरेदार दुर्ग , प्राचीर द्वारों, महल और मंदिरों- मस्जिदों के लिए प्रसिद्ध था।कालांतर में सब नष्ट होता चला गया और अब यहाँ दुर्ग के सिर्फ अवशेष बचे हैं ।‌ बौना नदी के ऊँचे किनारे पर स्थित राहतगढ़ कस्बा पुरावशेषों के अनुसार ग्यारहवीं शताब्दी में परमारों के शासनकाल में बहुत अच्छी स्थिति था ।कस्बे सेकरीब 3 किमी दूर स्थित किले की बाहरी दीवारों में कभी बड़ी बड़ी 26 मीनारें थीं।‌ भीतर पहुँचने के लिए 5 बड़े दरवाजे थे।

धामोनी

धामोनी सागर झांसी मार्ग पर करीब 44 किमी की पर स्थित धामोनी अब उजाड़ हो चुका है लेकिन इसका ऐतिहासिक दृष्टि से बहुत महत्त्व है।गढ़ा मंडला के राज्यकाल महत्वपूर्ण होने के कारण इसे गढ़ बनाया गया था और इसके साथ 50 मौजे थे।गढ़ा मंडला वंश के एक वंशज सूरत शाह इस किले को बनाया था एक दंत कथा के अनुसार मुगलकाल का मशहूर इतिहासकार अबुल फजल भी यहीं पैदा हुआ था लेकिन इसका कोई प्रमाण आज उपलब्ध नहीं आइन – ए – अकबरी में इसका उल्लेख मालवा सूबे में रायसेन की सरकारके महाल के रूप में किया गया है। किसी जमाने हाथी बेचने के लिए बाजार भरता था। यह ओरछा के राजा वीरसिंहदेव के राज्य में (1605-27) सम्मिलित था। उन्होंने किले का फिर से निर्माण कराया था।पुराने खंडहरों के कारण धामोनी पुरातत्व की दृष्टि से बहुत महत्वपूर्ण स्थान है।किले के अलावा वहां रानी महल के नाम से विख्यात एक महल भी है यहां का एक अन्य उल्लेखनीय स्थान मुस्लिम संतों की दो मजारें भी हैं।इनमें से एक बालजीत शाह की मजार फजल का गुरु समझा जाता है।

1946 में निजी पूंजी से हुई थी सागर विश्वविद्यालय की स्थापन 

Sagar university
सागर विश्वविद्यालय

डॉ.हरिसिंह गौर विश्वविद्यालय भारत के मध्य प्रदेश के सागर जिले स्थित एक सार्वजनिक विश्वविद्यालय है। इसको सागर विश्वविद्यालय के नाम से भी जाना जाता है। इसकी स्थापना डॉ . हरिसिंह गौर ने 18 जुलाई 1946 को अपनी निजी पूंजी से की थी।अपनी स्थापना के समय यह भारत का 18 वां विश्वविद्यालय था। किसी एक व्यक्ति के दान से स्थापित होने वाला यह देश का एकमात्र विश्वविद्यालय है। वर्ष 1983 में इसका नाम डॉ . हरीसिंह गौर विश्वविद्यालय कर दिया गया। 27 मार्च 2008 से इसे केंद्रीय विश्वविद्यालय की श्रेणी प्रदान की गई है। डॉ . हरिसिंह गौर विश्वविद्यालय एक आवासीय एवं संबद्धता प्रदायक विश्वविद्यालय है। मध्य प्रदेश में छ : जिले सागर जिला, दमोह जिला, पन्ना जिला, छतरपुर जिला, टीकमगढ़ जिला और छिंदवाड़ा जिला इसके क्षेत्राधिकार में। इस क्षेत्र के 133 कॉलेज इससे संबद्ध हैं, जिनमें से 56 शासकीय और 77 निजी कॉलेज हैं। विंध्याचल पर्वत श्रृंखला के एक हिस्से पथरिया हिल्स पर स्थित सागर विश्वविद्यालय का परिसर देश के सबसे सुंदर परिसरों में से एक है। यह करीब 803.3 हेक्टेयर क्षेत्र में फैला है। विश्वविद्यालय परिसर में प्रशासनिक कार्यालय, विश्वविद्यालय शिक्षण विभागों का संकुल, 4 पुरुष छात्रावास, 1 महिला छात्रावास, स्पोट्स काप्लेक्स तथा कर्मचारियों एवं अधिकारियों के आवास हैं।विश्वविद्यालय में दस संकाय के अंतर्गत 39 शिक्षण संकाय कार्यरत हैं। शिक्षण विभागों में स्नातकोत्तर स्तर पर अध्यापन एवं उच्चतर अनुसंधान की व्यवस्था है।इसके अलावा यहाँ दूरवर्ती शिक्षण संस्थान भी कार्यरत है, जो स्नातक, स्नातकोत्तर डिप्लोमा के कई कार्यक्रम संचालित करता है।विश्वविद्यालय परिसर में इंदिरा गांधी राष्ट्रीय मुक्त विश्वविद्यालयका केद्र भी कार्य कर रहा है।

अंग्रेजी एवं यूरोपीय भाषा विभाग, सागर विश्वविद्यालय 

स्नातक स्तर की कक्षाओं का संचालन इस विश्वविद्यालय की प्रमुख विशेषता है।देश के गिने चुने विश्वविद्यालयों में स्नातक स्तर की कक्षाओं का संचालन शिक्षण विभागों में होता है, उनमें से यह भी एक है। बीए . बीएससी एवं बीकॉम पाठ्यक्रमों में छात्रों की संख्या काफी बड़ी है। बीए स्तर पर 5 वैकल्पिक विषय समूहों के अंतर्गत 25 विषयों की अध्ययन सुविधा बीएससी में 24 विषय समूहों में से किसी एक के अध्ययन की सुविधा है।

Sagar jhil

सागर झील ने लम्बे समय तक बुझाई शहर की प्यास

सागर के बारे में यह मान्यता है कि इसका नाम सागर इसलिए पड़ा क्योंकि वह एक विशाल झील के किनारे स्थित है। इसे आमतौर सागर झील या कुछ प्रचलित किंवदंतियों के कारण लाखा बंजारा झील भी कहा जाता है सागर नगर इस झील के उत्तरी, पश्विमी और पूर्वी किनारों पर बसा दक्षिण में पथरिया पहाड़ी है, जहां विश्वविद्यालय परिसर है इसके उत्तर – पश्चिम में सागर का किला है।नगर की स्थिति और रचना पर इस झील का बहुत प्रभाव है। लंबे समय तक झील नगर के पेयजल का स्रोत्र रही लेकिन अब प्रदूषण के कारण इसका पानी इस्तेमाल नहीं किया जाता।

कहानी लाखा बंजारा के बहू – बेटे के बलिदान की

सागर झील की उत्पत्ति के बारे में वैसे तो कोई प्रामाणिक जानकारी उपलब्ध नहीं है लेकिन कई किंवदतियां प्रचलित हैं। इनमें सबसे मशहूर कहानी लाखा बंजारा के बहू – बेटे के बलिदान के बारे में है।जानकारों का मानना है कि यह प्राकृतिक तरीके से बना एक सरोवर हो सकता है, जिसे बाद में किसी राजा या समुदाय ने जनता के लिए अधिक उपयोगी बनवाने के उद्देश्य से खुदवा कर विशाल झील का स्वरूप दे दिया होगा। लेकिन यह केवल अनुमान है क्योंकि इसका कोई प्रमाण उपलब्ध नहीं है। ऊदनशाह ने जब 1660 में यहा खेटा किला बनवाकर पहली बस्ती यानि परकोटा गांव बसाया, तो तालाब पहले से ही मौजूद था। यह भी किवदंती है की लाखा बंजारा ने इस झील के लिये अपने बहू और बेटे का बलिदान दे दिया था।विश्वविद्यालय के जियॉलजिस्ट स्वर्गीय डॉ . डब्लू.डी . वेस्ट का मत था कि जब उपरिस्थ ट्रप के हट जाने के कारण विध्य दृश्यांश ( आउट काप ) जो अंशतः झील को धेरै हुए हैं, अनावृत्त हो गए। तब इस झील का प्रादुर्भाव हुआ।क्योंकि अधिक प्रतिरोधी विध्य क्वार्टजाइट दक्षिण से उत्तर की ओर के जलप्रवाह पर बांध का काम करता है।बाद में पशिम की ओर का जलप्रवाह रोकने के लिए एक छोटे से बांध का निर्माण भी किया गया।सागर झील को प्रदूषण मुक्त करने की योजना केंद्र सरकार ने राष्ट्रीय झील संरक्षण कार्यक्रम के अंतर्गत सागर झील को प्रदूषण मुक्त करने और इसके संरक्षण के लिए 22 करोड़ रुपए की योजना को मंजूरी दी है। इस योजना के तहत बड़े पैमाने पर झील के जीर्णोद्धार का काम करने की योजना बनाई गई है। हालांकि इस काम में काफी अवरोध भी आ रहे है लेकिन सागरवासियों को उम्मीद है कि अंततः योजना पर काम हो सकेगा और यह ऐतिहासिक झील पुनः जीवित हो सकेगी। इस काम में सागरवासियों को भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाकर अपना योगदान देना होगा। यह सागर को ही सुनिश्चित करना है कि इस योजना का भी वही हश्र ना हो, जो पूर्व की अन्य योजनाओं का हो चुका है।

नौरादेही वन्यजीव अभयारण्य

अपनी बायो डायवर्सिटी के कारण नौरादेही वन्य जीव सेंचुरी का स्थान सबसे अलग है। सागर, दमोह और नरसिंहपुर जबलपुर जिलों में फैली इस वाइल्ड लाइफ सेंचुरी में ट्रैकिंग, एडवेंचर और वाइल्ड सफारी का आनंद लिया जा सकता है। नौरादेही सेंक?चुरी की स्थापना सन 1975 में की गई थी। यह करीब 1200 वर्ग किमी क्षेत्र में फैली है। इस सेंक्चुरी में वन्यजीवों की भरमार है, जिनमें तेंदुआ मुख्य है। एक समय यहां कई बाघ भी पाए जाते थे लेकिन संरक्षण नहीं मिलने के कारण वे लुप्त हो गये थे परंतु राज्य सरकार द्वारा बाघों की संख्या बढ़ाने के प्रयास के अंतर्गत 2018 में फिर बाघ और बाघिन को यहा छोड़ा गया। अभी नौरादेही में बाघों की संख्या 5 है। बाघों की तरह तेंदुओं को भी संरक्षण की जरूरत है क्योंकि तेंदुए भी यहां लुप्त होने कि कगार पर है। चिंकारा, हिरण, नीलगाय, सियार, भेड़िया, लकड़बध्या ,जंगली कुत्ता, रीछ, मगर, सांभर,मोर, चीतल तथा कई अन्य वन्य जीव इस क्षेत्र में पाए जाते हैं। वनविभाग इसके संरक्षण का काम करता है।यहां पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए कुछ नई योजनाएं बनाई गई हैं। नौरादेही सेंक्चुरी में पहुंचने के लिए डीजल या पैट्रोल स चलने वाले ऐसे किसी भी वाहन के प्रयोग की छूट है जो पांच वर्ष से अधिक पुराना ना हो। यह मप्र राज्य का सबसे बड़ा अभ्यारण है। इसमे सागौन,साल, बांस और तेंदु के पेड बहुत मात्रा मे पाये जाते है। यहाँ मृगन्नाथ की गुफाएँ बहुत ही रोमान्चक तथा धार्मिक है। नये जंगली पक्षी – डस्की ईगल ओउल ,पेंडेट सैडग्राउज ,जो पहली बार अभ्यारण में देखे गए गिद्धों की 3 प्रजातियां इंडडियन पिट्टा किंग वल्चर इंडियन वल्चर सामने आई है प्रमुख पक्षियों मैं सिने रस टीट, मोर ग्रीन सैड पाइपर क्रेस्टेड ट्रीरिवफ्ट क्रेस्टेड वॉर्डिंग सल्फर वैली बाँब्लर पैंटेड स्टार्क यूरिशियन डार्टर ब्राउन ओउल बोनिली ईगल ओरियंटल हनीबजार्ड भी देखे गये।

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