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धर्मांतरण का केंद्र ईसाई मिशनरी पर ये धर्मांतरण कैसा?

धर्मांतरण का केंद्र ईसाई मिशनरी पर ये धर्मांतरण कैसा?

ईसाई मिशनरी वह लोग हैं जो देश में स्कूल-कॉलेज और अस्पताल जैसी संस्थाओं से जुड़कर अपने धर्म का प्रचार कर रहे हैं। ईसाई मिशनरियों पर धर्मांतरण के कराने के आरोप देश की आजादी से पहले से लग रहे हैं जिसके जवाब में मिशनरी कहती हैं हम तो लोगों की सेवा करते हैं लोग स्वेच्छा से ईसाई धर्म अपना रहे। ईसाई धर्म अपनाने वाले ज्यादातर लोग हिंदू जाति व्यवस्था के निचले तबके के होते हैं। इस में सबसे ज्यादा आदिवासी ही क्यों हैं? इसकी वजह है कि इनकी सेवा आदिवासी बहुल इलाकों में ज्यादा सक्रिय है। खबरें ऐसी भी मिलती हैं यह लोग गांव-गांव में जाकर आदिवासियों की परिस्थिति ठीक करने, उनको सुख सुविधाएं देने का वादा कर उन्हें धर्म परिवर्तन करने को उकसा रहे।

महात्मा गांधी ब्रिटिश शासन के दौरान ईसाई मिशनरियों के क्रियाकलापों से खिन्न थे। उन्होंने अपने संस्मरणों में लिखा है कि किस प्रकार राजकोट में उनके स्कूल के बाहर एक मिशनरी हिंदू देवी-देवताओं के लिए बेहद अपमानजनक शब्दों का उपयोग करता था। गांधी जी जीवन भर ईसाई मिशनरियों द्वारा सेवा कार्यों के नाम पर किए जाने वाले धर्म परिवर्तन के विरुद्ध रहे। जब अंग्रेज भारत से जाने लगे तो ईसाई मिशनरी लॉबी ने प्रश्न उठाया कि स्वतंत्र भारत में क्या उन्हें धर्म परिवर्तन करते रहने दिया जाएगा, तो गांधी जी ने इसका जवाब न में दिया। उनके अनुसार लोभ-लालच के बल पर धर्म परिवर्तन करना घोर अनैतिक है। इस पर मिशनरी लॉबी ने बहुत हंगामा किया।

आजादी के समय भारत बेहद गरीब देश था और वित्तीय सहायता के लिए पाश्चात्य ईसाई देशों और अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संस्थानों निर्भर था, इसलिए भारत को मिशनरियों के आगे झुकना पड़ा। इसके परिणामस्वरूप संविधान में अपने पंथ के प्रचार का अधिकार कुछ पाबंदियों के साथ दिया गया, लेकिन एक के बाद एक सरकार मिशनरी लॉबी के सामने मजबूर होती गई। संविधान निर्माताओं ने सभी धार्मिक समुदायों को अपने धर्म के प्रचार की छूट दी थी इसे ‘अल्पसंख्यकों को दी गई रियायतों’ के तौर पर देखा गया।

सत्य अगर कड़वा भी हो तो भी वह सत्य ही कहलाता है। भारत में कार्य करने वाली ईसाई संस्थाओं का एक चेहरा अगर सेवा है तो दूसरा असली चेहरा प्रलोभन, लोभ, लालच, भय और दबाव से धर्मान्तरण भी करना हैं। पर सवाल यह भी है कि धर्मांतरण के बाद आरक्षित जातियों को मिलने वाला आरक्षण का क्या होगा क्योंकि दो तरह के मुद्दे उठे हैं एक मुद्दा तो ये है कि कोई अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति है और उसने धर्म परिवर्तन कर लिया, तो वो फौरन अपना रिजर्वेशन का बेनेफिट खो देगा. शेड्यूल कास्ट 1950 का जो प्रेसिडेंशियल ऑर्डर है, उसके हिसाब से शेड्यूल कास्ट को रिजर्वेशन का लाभ पाने के लिए हिंदू होना जरूरी है. सिर्फ हिंदू, सिख और बौद्ध धर्म के अनुसूचित जाति समुदाय के लोग आरक्षण और दूसरी सुविधाओं का फायदा उठा सकते है. मूलतः संविधान में हिन्दू धर्म के अनुसूचित जाति समुदाय के लिए व्यवस्था थी। बाद में 1956 में इसे सिख और 1990 में इसे बौद्ध के लिए भी जोड़ दिया गया लेकिन अगर कोई इस्लाम या ईसाई में कन्वर्ट होता है, उसे आरक्षण/ दूसरी सुविधाओं का लाभ नहीं मिलेगा. हां, फिर से अगर वो हिंदू धर्म में कंवर्ट होता है, तो उसे लाभ मिलना शुरू हो जाएगा. दूसरा पहलू सुप्रीम कोर्ट से जुड़ा है, जिसका फैसला कहता है कि रीकंवर्जन पर व्यक्ति अपनी ऑरिजिनल कास्ट पा जाएगा। दो फ़रवरी 1972 को सुप्रीम कोर्ट ने एनईएफ़टी होरो बनाम जहान आरा जसपाल सिंह मामले में ट्राइब और ट्राइबल कम्युनिटी टर्म के बीच अंतर पर अपना फ़ैसला दिया था.

कोर्ट ने ट्राइबल कम्युनिटी को पारिभाषिक करते हुए कहा था, “ग़ैर-जनजातीय मूल के व्यक्ति जब जनजातीय समूह में शादी करेगा/करेगी और इसे लेकर जनजातीय पंचायत की सहमति रहती है और साथ में ज़रूरी रिवाजों को मानता है तो वह जनजातियों को मिलने वाले संवैधानिक अधिकारों का फ़ायदा उठा सकता है.”

इसी तरह सुप्रीम कोर्ट ने अनुसूचित जाति के आरक्षण पर केपी मनु बनाम केरल स्टेट के क्या देश में कहा है “किसी व्यक्ति को हिंदू धर्म में वापसी पर अनुसूचित जाति का लाभ दिया जा सकता है, अगर उस जाति के लोग उसे अपना लेते हैं तो. ऐसे व्यक्ति को ये साबित करना होगा कि वे या उसके पूर्वज किसी अन्य धर्म को अपनाने से पहले उसी जाति के थे. इस बात का बिल्कुल स्पष्ट प्रमाण होना चाहिए कि वो उस जाति से संबंधित है, जिसे संविधान के (अनुसूचित जाति) आदेश, 1950 में मान्यता प्राप्त है. और उसका उसी धर्म में पुन: धर्मांतरण हुआ है जिसे उसके माता-पिता या पिछली पीढ़ियां मानती थीं. साथ ही उसे ये भी साबित करना होगा कि वापसी के बाद उसे उस समुदाय ने अपना लिया है.”

वहीं आदिवासीयों ईसाई मिशनरीज़ हिंदू नहीं मानती और यह आदिवासियों के रीति-रिवाजों हिंदू से अलग होना कहती हैं। धर्मांतरण के बाद आरक्षण के लिए कन्वर्ट हो चुके आरक्षित वर्ग के लोग सरकारी दस्तावेजों में अपने को हिंदू दर्शाया करते जिससे उनको आरक्षण का लाभ मिलता रहे।

जो आदिवासी ईसाई बन गए हैं उनके जीवन में कई तरह की तब्दीली स्पष्ट रूप से दिखाई देती है। शिक्षा, स्वास्थ्य और आजीविका के स्तर पर ये आदिवासियों से आगे हैं. चर्च इसके लिए कई तरह का कार्यक्रम भी चलाता है. ईसाई मिशनरीज़ के कई स्कूल, कॉलेज और अस्पताल हैं. आदिवासियों के बीच भी यह सामान्य धारणा है कि ईसाई बनने के कारण उनके जीवन में बेहतरी आई है।

आदिवासियों के बीच यह भी धारणा है कि आदिवासियों के मिलने वाले आरक्षण का फ़ायदा ईसाई आदिवासी उठा रहे हैं और नौकरियों पर उन्हीं का क़ब्ज़ा है। वहीं आदिवासियों और उनके नेताओं की माँग रहती है कि आदिवासियों के धर्मांतरण पर पाबंदी लगनी चाहिए। इनका कहना है कि जो आदिवासी ईसाई बन चुके है वो अपनी परंपरा और संस्कृति से दूर हो गए हैं और उन्हें एसटी आरक्षण का लाभ नहीं मिलना चाहिए।

यह सब सुनकर मेरे दिमाग में एक प्रश्न उत्पन्न होता है कि आखिर किसी और के कहने पर कोई अपने धर्म जो कि हमारा अस्तित्व है उसे कैसे बदल सकता है? इसका एक उत्तर यह भी हो सकता है समय के साथ हर धर्म में उन्नत परिवर्तन आना चाहिए पर राजनीति और छुआछूत ऊंच-नीच के कारण हिंदू धर्म की जातियां इस तरह परिवर्तन को करने में असमर्थ रही है। जिसका फायदा यह लोग लेते आ रहे हैं। लोगों की शिक्षा और स्वास्थ्य का कार्य जिसे सरकार को करना चाहिए वहां यह लोग कर अपना उद्देश्य पूरा कर रहे हैं।

डाॅ.अंबेडकर को अपने धर्म में लाने के लिए ईसाइयों का प्रयास खूब प्रयास रहा ईसाई धर्मप्रसारकों ने अछूतों को अपने धर्म में कर लाने के लिए विपुल धन खर्च करने की बात कही, इस बात को ध्यान में रखकर भारत, अमेरिका और इंग्लैंड से धनराशि इकठ्ठा करने का काम शुरू किया। लंदन में मि.गाॅडफ्रे नामक धर्मप्रचारक ने हजारों पौंड जमा किए। अपने प्रचार के लिए उसने ‘ The Untouchables Quest ‘ इस शीर्षक से जुलाई 1936 में एक पुस्तक प्रकाशन भी किया।

ईसाइयों की ओर से कई धार्मिक नेतागन राजगृह बंबई में बाबासाहब अंबेडकर से मिले। उन्होंने बाबासाहब से निवेदन किया अगर वे सभी अछूतों के साथ ईसाई धर्म स्वीकार करे तो शहरों, तहसीलों, टाउनो और गावों में शिक्षा संस्थाओं के जाल बिछा देंगे। कोई भी नवधर्मांतरित ईसाई अशिक्षित नहीं रहेगा। सबकी मुफ्त शिक्षा व्यवस्था केंद्रीय चर्च की ओर से की जाएगी। इसके अलावा कई करोड़ रूपये उनको स्वेच्छा मनचाही उपयुक्त मदद में व्यय करने को दिया जाएगा।

कहते हैं पैसा सब कुछ नहीं खरीद सकता और आज उसी पैसे से धर्म को खरीदा जा रहा है। वह धर्म किसी जो देश की संस्कृतिक अस्तित्व है। आज लोगों की जरूरतों ने उन्हें इस मोड़ पर लाकर खड़ा कर दिया है कि वे कुछ चंद पैसों के लिए अपना संस्कृति बेचने को तैयार हो गए हैं।

संविधान के अनुच्छेद 25 (1) में अपने धर्म पर चलने और उसका प्रसार करने का अधिकार नागरिकों दिया गया है. तो क्या अलग से जबरन धर्म परिवर्तन के खिलाफ वाक़ई एक सख्त क़ानून की ज़रूरत है।

भारत में सात राज्य ऐसे हैं जिन्होंने जबरन धर्म परिवर्तन के खिलाफ अपने स्तर पर अलग-अलग क़ानून बनाए हैं. ये राज्य गुजरात, ओडिशा, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, अरुणाचल प्रदेश, झारखंड और हिमाचल प्रदेश हैं।तमिलनाडु में भी यह क़ानून था मगर वर्ष 2004 में इसे ख़त्म कर दिया गया।

जो भी सेवा कार्य मिशनरी द्वारा किया जा रहा है उनका एक उद्देश्य धर्मांतरण भी है। संत वही होता है जो पक्षपात रहित एवं जिसका उद्देश्य मानवता की भलाई है। ईसाई मिशनरीयों का पक्षपात इसी से समझ में आता है की वह केवल उन्हीं गरीबों की सेवा करना चाहती है, जो ईसाई मत को ग्रहण कर ले।

लेखक:- पूर्णिमा तिवारी

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