संबंधों में बदलाव लाएगा नेपाल का 'सुप्रीम' फैसला

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Sher Bahadur
ओली के राज में चीन ने जैसे नेपाल में घुसपैठ की, उसका अप्रत्यक्ष असर भारत पर भी पड़ेगा. पर नए पीएम शेर बहादुर देउबा के आने से शायद इसपर विराम लगे. देउबा को भारत का हितैषी माना जाता है. पीएम नरेंद्र मोदी से भी उनकी अच्छी दोस्ती है. ऐसे में नेपाल का ये बदलाव दोनों के लिए बेहतर संकेत है.
पड़ोसी पहाड़ी मुल्क नेपाल में पक्ष और विपक्ष के दरम्यान बीते पांच महीनों से सत्ता को लेकर सियासी जंग हुई प्रधानमंत्री की कुर्सी हथियाने के लिए दोनों में युद्ध जैसी जोर आजमाइश हो रही थी. लेकिन आखिरकार सफलता विपक्षी दलों के हाथ लगी. उम्मीद थी नहीं कि शेर बहादुर को देश की कमान सौंपी जाएगी, ज्यादा उम्मीद तो जल्द संसदीय चुनाव होने की क्योंकि इसके लिए नेपाल चुनाव आयोग ने तारीखें भी तय हुई थीं. संभवतः 12 या 19 नवंबर को संसदीय चुनाव होने थे. पर सुप्रीम कोर्ट ने सबकुछ उलट-पुलट कर रख दिया. फिलहाल, इसके साथ ही एक बार फिर नेपाल में सत्ता परिवर्तन हुआ है. सुप्रीम कोर्ट ने पुराने मामलों में दखल देते हुए मौजूदा राष्ट्रपति विद्या देवी भंडारी के दोनों महत्वपूर्ण फैसलों को बर्खास्त कर दिया.

दरअसल, सुप्रीम कोर्ट ने दोनों ही निर्णयों में भंडारी के व्यक्तिगत स्वार्थ को पहला, उन्होंने गलत तरीके से केपी शर्मा ओली को की कुर्सी पर बैठने की इजाजत दी. वहीं, दूसरा उनका निर्णय उनके मनमुताबिक वक्त में देश के भीतर चुनाव हालांकि विपक्षी दल भी तुरंत चुनाव चाहते थे, लेकिन जब सुप्रीम कोर्ट ने कोरोना महामारी का हवाला देते हुए चुनाव न कराने और प्रधानमंत्री पद से ओली को हटाकर उनकी जगह उचित व्यक्ति के हाथों सरकार की बागडोर सौंपने का फार्मूला सुझाया, तो विपक्षी दल बिना सोचे-समझे राजी हो उसके बाद सुप्रीम आदेश से एक बार फिर नेपाल की सत्ता शेर बहादुर देउबा को सौंपी गई, तल्खी के अंदाज में जब चीफ जस्टिस चोलेन्द्र शमशेर राणा की अध्यक्षता वाली पांच सदस्यीय

संविधान पीठ ने खुलेआम राष्ट्रपति विद्या देवी भंडारी के निर्णयों की आलोचनाएं की तो सत्ता पक्ष के पास कोई दलील नहीं बची. चीफ जस्टिस ने साफ कहा राष्ट्रपति ने निचले सदन को असंवैधानिक तरीके से भंग किया था, जो नहीं किया जाना चाहिए था.

गौरतलब है, हमारे पहाड़ी राज्य उत्तराखंड की तरह ही नेपाल भी लगातार राजनैतिक अस्थिरता झेल रहा था. फिलहाल दोनों जगहों पर मुखियों की नियुक्तियां हो चुकी हैं. उत्तराखंड में पुष्कर सिंह धामी के रूप में नए मुख्यमंत्री, तो पड़ोसी देश नेपाल को नया प्रधानमंत्री शेर बहादुर देउवा के रूप में मिला है. दोनों क्षेत्र एक-दूसरे से जुड़े हैं, इसलिए इन क्षेत्रों की राजनीति भी एक दूसरे से मेल खाती है. नेपाल की सियासत में भारतीय राजनीति का असर हमेशा रहता है जैसे, दोनों मुल्कों की सीमाएं आपस में जुड़ी हैं, ठीक वैसे ही राजनीतिक तार भी आपस में जुड़े रहते हैं. आवाजाही में कोई खलल नहीं होता. आयात-निर्यात भी बेधड़क होता है. पर, बीते कुछ महीनों में इस स्वतंत्रता में कुछ खलल था. उसका कारण भी सभी को पता है. दरअसल, ओली का झुकाव चीन की तरफ रहा, चीन जिस हिसाब से नेपाल में अपनी घुसपैठ कर रहा है. उसका नुकसान न सिर्फ उनको होगा, बल्कि उसका अप्रत्यक्ष असर भारत पर भी लेकिन शायद नए प्रधान शेर बहादुर देउबा के आने से इसमें विराम लगेगा. को हमेशा से हिंदुस्तान का हितैषी माना गया उनकी दोस्ती भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से अच्छी है. दोनों नेता की सियासी केमिस्ट्री आपस में अच्छी है. इस लिहाज से देउवा का प्रधानमंत्री बनाना दोनों के

लिए बेहतर है. बहरहाल, नेपाल के भीतर की राजनीति की बात करें तो केपी शर्मा ओली को सत्ता से हटाने के लिए विपक्ष लंबे समय से लामबंद था. विपक्षी दलों के अलावा नेपाली आवाम भी निर्वतमान हुकूमत के विरुद्ध हो गई थी. कोरोना से बचाव और उसके कुप्रबंधन समेत महंगाई, भ्रष्टाचार आदि कई को लेकर लोग सड़कों पर उतरे हुए थे. कई आम लोगों की तरफ से भी सुप्रीम कोर्ट में पीआईएल दाखिल हुई जिसमें ओली को हटाने की मांग थी. कोरोना वैक्सीन को लेकर भी ओली सवालों के घेरे में थे. उन पर आरोप लग रहा था कि भारत से भेजी गई कोरोना वैक्सीन को उन्होंने बेच डाला. इसको लेकर नेपाली लोग अप्रैल-मई से ही पर प्रदर्शन कर रहे थे.

सुप्रीम कोर्ट ने इस को लेकर एक कमेटी भी बनाई है, जिसकी जांच जारी है. बाकी सबसे बड़ा आरोप तो यही था कि ओली और उनकी सरकार चीन के इशारे पर नाचती थी. भारत के खिलाफ गतिविधियां लगातार बढ़ रहीथीं. उनको सरकार रोकने के बजाय और बढ़ावा दे रही थी. कई ऐसे मसले थे जिनको देखते हुए सुप्रीम देशहित में सुप्रीम निर्णय सुनाया. कोर्ट के निर्णय की नेपाली लोग भी प्रशंसा कर रहे हैं. शेर बहादुर देउवा नेपाल में सर्वमान्य नेता माने जाते हैं. जनता उनको पसंद करती है. इससे पहले भी वह चार बार देश के प्रधानमंत्री रहकर देश की बागडोर सही से संभाल चुके हैं. ऐसे अनुभवी नेता को ही नेपाल की आवाम प्रधानमंत्री की कुर्सी पर देखना चाहती थी. हालांकि इस कार्यकाल में उनके पास ज्यादा कुछ करने के लिए होगा नहीं, क्योंकि सरकार के पास समय कम बचा है.

(लेखक - डॉ रमेश ठाकुर)
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