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अमेरिका के फैसले से बंधी बदलाव की आस

अमेरिका के फैसले से बंधी बदलाव की आस

Joe Biden

अगर अमेरिका फिर पेरिस समझौते में शामिल हुआ, तो 2030 तक दुनियाभर में 3 अरब मीट्रिक टन से ज्यादा कार्बन उत्सर्जन थमेगा क्योंकि दुनिया के कुल कार्बन उत्सर्जन में करीब 15 फीसदी हिस्सेदारी अमेरिका की है. उसके इस कदम से क्लाइमेट में सुधार तो होगा ही, नेक्स्ट जेन को भी सेफ माहौल मिलेगा.

पिछले दिनों दुनिया की शीर्ष महाशक्तियों के साथ विश्व के अलग-अलग कोनों में स्थिति राष्ट्र के नेताओं ने जलवायु परिवर्तन के परिणामस्वरूप पैदा होने वाले खतरों और दुष्परिणामों पर गहनता से विचार- विर्मश किया, जलवायु परिर्वतन के दुष्परिणामों को लेकर महाशक्तियां कितनी अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडेन के अह्नान पर आयोजित शिखर सम्मेलन में न केवल 40 देशों के नेता उपस्थित हुए, बल्कि गंभिरतापूर्वक समस्या के समाधान पर विचार-विमर्श भी किया सम्मेलन में अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडेन ने साल 2030 तक ग्रीन हाउस गैसों का उत्सर्जन 30 फीसदी तक घटाने का ऐलान किया. जलवायु परिवर्तन पर अमेरिकी राष्ट्रपति के विशेष दूत जॉन कैरी की भारत और चीन यात्रा के बाद इस बात की चर्चा जोरों पर थी कि शिखर सम्मेलन से पहले अमेरिका पेरिस समझौते के तहत निर्धारित कार्बन उत्सर्जन को कम करने के लिए कोई बड़ी घोषणा कर सकता है.

बाइडेन ने दुनिया के अन्य नेताओं से भी आग्रह किया कि वे अपने-अपने देशों में गैसों के उत्सर्जन को रोकने का प्रयास करें ताकि जलवायु परिर्वतन की त्रासदी से बचा जा सके.
अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडेन की पहल पर बुलाए गए शिखर सम्मेलन में भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने कहा कि इस चुनौती से निपटने के लिए हमें तेज गति से बड़े पैमाने पर और वैश्विक संभावना के साथ ठोस कदम उठाने की जरूरत है. उन्होंने कहा कि अपने देश के विकास की चुनौतियों के बावजूद हमने स्वच्छ ऊर्जा, प्रभाविता और जैव विविधता को लेकर कई साहसिक कदम उठाए हैं. भारत का कार्बन उत्सर्जन आज भी वैश्विक औसत से 60 फीसदी कम है.
वर्चुअल प्लेटफॉर्म पर आयोजित शिखर बैठक में पीएम मोदी ने कहा कि राष्ट्रपति बाइडेन और मैं भारत-अमेरिका जलवायु और स्वच्छ ऊर्जा एजेंडा 2030 साझेदारी की शुरुआत कर रहे हैं. इसके जरिये हम स्वच्छ ऊर्जा क्षेत्र में निवेश और हरित साझेदारी बढ़ाने के लिए उपाय करेंगे. उन्होंने शीर्ष नेताओं को विश्वास दिलाते हुए कहा कि हमने खुद से बादा किया है कि हम न केवल पेरिस समझौते के लक्ष्यों को प्राप्त करेंगे बल्कि उससे आगे निकलेंगे हम केवल पर्यावरण क्षरण को ही नियंत्रित नहीं कर रहे हैं, बल्कि इसके संरक्षण की दिशा में भी कदम उठा रहे हैं. हम न केवल नई क्षमताओं का निर्माण करेंगे, बल्कि उनमें सुधार करने के लिए वैश्विक मदद भी लेंगे. हमारा लक्ष्य साल 2030 तक नवीनीकृत ऊर्जा की क्षमता को बढ़ाकर 450 गीगावाट करना है.
गौरतलब है कि पिछले दिनों जलवायु परिर्वतन पर अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडेन के विशेष दूत जॉन कैरी ने भारत और चीन की यात्रा कर जलवायु परिर्वतन पर इन देशों के विचार जाने थे. जॉन कैरी की इन यात्राओं बाद वैश्विक हल्कों में पेरिस समझौते के लेकर चर्चाओं का दौर शुरू हो गया था. अब शिखर बैठक में जो बाइडेन ने 2030 तक ग्रीन हाउस गैसों का उत्सर्जन 30 फीसदी तक घटाने का ऐलान कर यह साबित कर दिया है कि वे पेरिस समझौते में अमेरिका की वापसी के लिए किस कदर बेकरार है. दरअसल, बाइडेन ने अपने चुनाव कैंपेन के दौरान अमेरिका को पेरिस समझौते में दोबारा शामिल करने की बात कही थी. 
अपने कार्यकाल के पहले दिन व्हाइट हाउस से भी उन्होंने पेरिस समझौते में अमेरिका की वापसी की घोषणा की थी. अब कहा यही जा रहा है कि वर्चुअल स्तर पर शिखर सम्मेलन का आयोजन कर वे अपना घरेलू बादा पूरा कर रहे हैं, लेकिन अहम सवाल यह है कि शिखर बैठक को लेकर राष्ट्र किसी ठोस निष्कर्ष तक पहुंच पाएंगे या नहीं. एक सवाल यह भी उठ रहा है कि क्या इस बैठक के बाद जलवायु परिवर्तन का मुद्दा एक वैश्विक मुद्दा बन सकेगा या नहीं, दरअसल, जानकारों का मानना है शिखर बैठक के जरिए इस मुद्दे पर सैद्धांतिक सहमति तो बन सकती है. परन्तु असल चुनौती ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन में कटौती को लेकर है, जिस पर विकसित और विकासशील देशों की अपनी-अपनी राय और अपने-अपने हित हैं. पृथ्वी को जलवायु परिवर्तन के खतरे से बचाने और ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन को निश्चित सीमा तक बनाए रखने के उद्देश्य को लेकर सन् 1992 में रियो डी जेनेरियो में पृथ्वी सम्मेलन के अवसर पर पर्यावरण और विकास पर संयुक्त राष्ट्र सम्मेलन ( यूएनसीईडी) में दी यूनाइटेड नेशंस फ्रेमवर्क कंवेंशन ऑन क्लाइमेट चेंज (यूएनएफसीसीसी) नामक एक अंतर्राष्ट्रीय संधि की गई.
इस बात में कोई संदेह नहीं कि अगर अमेरिका दोबारा पेरिस समझौते में शामिल हो जाता है, तो साल 2030 तक दुनियाभर में 3 अरब मीट्रिक टन से ज्यादा होने वाला कार्बन उत्सर्जन रुक सकेगा, क्योंकि दुनिया के कुल कार्बन उत्सर्जन में करीब 15 फीसदी हिस्सेदारी अकेले अमेरिका की है. ऐसे में अगर अमेरिका समझौते में वापस लौटता है, तो निःसंदेह जलवायु परिवर्तन को कम करने की दिशा में किए जा रहे प्रयासों को तो बल मिलेगा ही, नेक्स्ट जेन को भी सेफ माहौल मिलेगा.
(लेखक- एनके सोमानी)

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