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नई जिम्मेदारियों के बीच चुनौतियों का भी है अंबार

नई जिम्मेदारियों के बीच चुनौतियों का भी है अंबार

KP Sharma oli

केपी शर्मा ओली तीसरी बार नेपाल के प्रधानमंत्री जरूर बन गए, पर अभी भी उनके सामने चुनौतियां कम नहीं होंगी. राष्ट्रपति के फैसले के खिलाफ विपक्ष सुप्रीम कोर्ट जाने की तैयारी में है. उनके आरोपों की तपिश बताती है कि मामला बेशक शांत हो गया, पर अभी हाई वोल्टेज ड्रामा होना बाकी है.

नेपाल के सिंहासन का ताज एक बार फिर केपी शर्मा ओली के सिर सज गया. सांठगांठ कहें या सियासी चमत्कार ? जो भी हो, आखिरकार ओली तीसरी बार पहाड़ी मुल्क नेपाल के प्रधानमंत्री बन ही गए, विश्वास मत हारने के बाद उन्हें और विपक्षी पार्टियों को राष्ट्रपति विद्या देवी भंडारी ने तीन दिन का समय दिया था सरकार बनाने के लिए, जिसमें दोनों पक्ष नंबरों के गेम को पूरा नहीं कर पाए इसके बाद गेंद राष्ट्रपति के पाले में पहुंच गई.

अब फैसला उनको ही करना था. चुनाव कराएं या अपनी शक्तियों का इस्तेमाल करें कुछ घंटों के मंधन के बाद राष्ट्रपति विद्या भंडारी ने संवैधानिक शक्तियों का प्रयोग करते हुए सबसे बड़े दल के नेता होने के कारण ओली को फिर से नेपाल की कमान सौंपने का निर्णय लिया. ओली को राष्ट्रपति ने प्रधानमंत्री पद के लिए आमंत्रित कर दिया और इसी फैसले के साथ नेपाल का राजनीतिक संग्राम खत्म हो गया.
गौरतलब है, विश्वास मत हारने के बाद कयास ऐसे भी लगाए जा रहे थे कि शायद ओली ने रणनीति के तहत जानबूझकर सदन में अपना विश्वास मत तो हासिल नहीं किया ? यह जानते हुए कि बहुमत उनके पक्ष में नहीं है, लेकिन इस प्रक्रिया के बाद शायद राष्ट्रपति सबसे बड़े दल के नेता के रूप में उन्हें ही प्रधानमंत्री बनाने का फैसला लें. सच में हुआ भी वैसा ही. राष्ट्रपति ने बड़े दल को प्रधानमंत्री बनने का ऑफर दिया. राजनीति में तभी तो कहा जाता है कि यहां कुछ भी संभव है केपी शर्मा ओली भी उम्मीद छोड़ चुके थे. उनको भी लगने लगा था कि देश में अब मध्यावधि चुनाव ही अंतिम रास्ता हैं, लेकिन फिर भी उनको कहीं न कहीं उम्मीद थी कि फैसला उनके पक्ष में ही आएगा. उन्होंने आस नहीं छोड़ी, क्योंकि उनकी एक लीगल टीम लगातार राजभवन में सक्रिय रही. राष्ट्रपति विद्या देवी भंडारी तक एक संदेश पहुंचाने में सफल रही कि बड़ी पार्टी होने के नाते ओली को ही चुना जाए,
बीते सोमवार को ओली के विश्वास मत में पिछड़ने से अचानक मुल्क में सियासी संग्राम शुरू हो गया था, लेकिन इतना तय है कि मौजूदा सरकार को राष्ट्रपति ने जीवनदान तो बेशक दे दिया है, पर आसानी से इस सरकार को चलाना मुश्किल होगा. अगर चली भी तो बड़ी मुश्किलें आएंगी रास्तों में, क्योंकि ओली के पीएम बनने के बाद उनपर लगे आरोप लंबे समय तक चर्चाओं का विषय बने रहेंगे.
प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली पर दो ऐसे बड़े आरोप लगे, जिसका सामना उनको लंबे समय तक करना पड़ेगा. पहला, जब उन्होंने कांग्रेस सरकार के बाद अपनी हुकूमत मुल्क में पहली मर्तबा स्थापित की थी, तब कांग्रेस सरकार के तबके बनाए गए सभी सातों राज्यों के राज्यपालों को कार्यकाल पूरा होने से पहले ही बिना बताए बर्खास्त कर दिया गया. तब उन्हें तानाशाह तक कहा गया था.
दूसरा, आरोप बिल्कुल ताजा है. कुछ समय पहले हिंदुस्तान से भेजी गई कोरोना वैक्सीन में घाल घपला का भी उन पर आरोप लगा है, जिसे विपक्षी दल समूचे नेपाल में बड़ा मुद्दा बनाए हुए है. खुदा न खास्ता अगर चुनाव हो जाते, तो वह मुद्दा जरूर गूंजता जिसका प्रत्यक्ष रूप से उन्हें नुकसान भी हो सकता था. दरअसल, ये दो ऐसे आरोप हैं, जो उनको आगे चलकर भी सताएंगे. हालांकि कारण एकाध और भी हैं, लेकिन उनका असर उतना नहीं पड़ेगा. देखा जाए तो नेपाल वैसे सियासी संग्राम के लिए हमेशा से कुख्यात रहा है. क्योंकि वहां की सियासत में आए दिन कुछ न कुछ ड्रामा होता ही रहता है. कम समय में ही अब तक यहां 41 प्रधानमंत्री बन चुके हैं. किसी भी प्रधानमंत्री के लिए अपना कार्यकाल पूरा करना यहां किसी चुनौती से कम नहीं होता.
केपी शर्मा अब तीसरी बार नेपाल के प्रधानमंत्री जरूर बन गए हैं, लेकिन अभी भी उनके सामने चुनौतियां कम नहीं होगी, बल्कि और बढ़ जाएंगी. राष्ट्रपति विद्या देवी भंडारी के फैसले के खिलाफ विपक्षी दल सुप्रीम कोर्ट भी जाने की तैयारी कर रहे हैं. वह राष्ट्रपति के फैसले को चुनौती दे रहे हैं और फैसला एकतरफा बता रहे हैं. विपक्षी नेता प्रचंड इसपर राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री के बीच मिलीभगत का भी आरोप लगा रहे हैं. इन आरोपों की तपिश बताती है, मामला बेशक शांत हो गया, लेकिन इसके बाद भी हाई वोल्टेज ड्रामा होने की संभावनाएं और प्रबल हो गई हैं. वैसे देखा जाए तो ओली की कुर्सी हिचकोले तो उसी दिन से मारने लगी थी जब उन्होंने दूसरी बार सत्ता की बागडोर संभाली थी. डगर तीसरी बार भी आसान भी नहीं होगी. उनके पक्ष में अभी 93 ह सांसद हैं. इतने से वह संसद संचालित नहीं कर सकते. नीति बनाने के लिए और कोई निर्णय लेने के लिए कम से कम 124 सांसद चाहिए ही होंगे.
सरकार के माथे पर मंडराते काले बादल आगे भी आसानी से छंटने वाले नहीं, ऐसे में तमाम मौलिक कारणों पर अभी भी केपी शर्मा ओली को पूरी गहराई के साथ मंधन करना होगा.
(लेखक- डॉ रमेश ठाकुर)

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