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World Press Freedom Day- नए मूल्यों संग चौथे स्तंभ की मजबूती की आस

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आज दुनिया भर में वर्ल्ड प्रेस फ्रीडम डे मनाया जा रहा है. प्रेस की इस फ्रीडम के बीच आज देश-दुनिया के एक्सपर्ट्स वैल्यू बेस्ड पत्रकारिता को मीडिया के लिए सबसे बड़ा चैलेज मान रहे है. वही मूल्य आधारित पत्रकारिता जिसकी नींव स्वतंत्रता आंदोलन के वक्त ही पड़ गई थी.

आज दुनिया भर में वर्ल्ड प्रेस फ्रीडम डे मनाया जा रहा है. यह दिवस मीडिया की आजादी पर हमलों से मीडिया की रक्षा और उनके जान की आहुति देने वाले पत्रकारों को श्रद्धांजलि के तौर पर मनाया जाता है. प्रेस की स्वतंत्रता के बीच मूल्य आधारित पत्रकारिता आज की मीडिया की सबसे बड़ी चुनौती है. एक लोकतांत्रिक व्यवस्था में मीडिया को अपना नजरिया चुनने की आजादी के साथ उसका सकारात्मक पक्ष तभी फलीभूत होता है जब पत्रकारिता मूल्यवादी हो. भारत में मूल्य आधारित पत्रकारिता की नींव स्वतंत्रता आंदोलन के वक्त ही पड़ गई.

उसी दौरान दीनबंधु सीएफ एंड्रयूज ने लाला लाजपत राय से आग्रह किया कि वह अपना ध्यान भारत की एक ऐसा दैनिक पत्र देने के लिए केंद्रित करें, जो भारतीय जनमत के लिए वैसा ही करे जैसा कि सीपी स्कॉट के 'मांचेस्टर गार्डियन' ने ब्रिटिश जनमत के लिए किया. लाला लाजपत राय और उनके सहयोगियों ने सीएफ एंड्रयूज के राष्ट्रवादी सुझाव को सिर माथे पर लिया और एक राष्ट्रवादी दैनिक पत्र के प्रकाशन के निमित्त जुट गए, शीघ्र ही लाला लाजपत राय और उनके सहयोगियों ने अक्टूबर, 1904 में समाचार पत्र 'द पंजाबी' का शुभारंभ कर दिया. 'द पंजाबी' ने अपने प्रथम संस्करण से ही आभास करा दिया कि उसका उद्देश्य महज एक दैनिक पत्र बनना नहीं बल्कि ब्रिटिश हकूमत से भारतमाता की मुक्ति के लिए देश के जनमानस को जाग्रत करना‌‌ और राजनीतिक चेतना पैदा करना है.

'द पंजाबी' ने रूस की जार सरकार के विरुद्ध जापान की सफलता की ओर देश का ध्यान आकर्षित करने के साथ ही बंगाल में गर्वनर कर्जन द्वारा प्रेसीडेंसी को दो भागों में विभाजित करने तथा पंजाब में उपराज्यपाल इब्बटसन के भूमि तथा नहर कालोनी कानूनों के मसले पर देशवासियों को जाग्रत किया. 'द पंजाबी' ने यह भी सुनिश्चित किया कि स्वतंत्रता आंदोलन में मीडिया की भूमिका और उसका सरोकार क्या होना चाहिए, 'द पंजाबी' के अलावा लाजपत राय ने यंग इंडिया, यूनाइटेड स्टेट ऑफ अमेरिका, ए हिंदूज इम्प्रेशंस एंड स्टडी, इंग्लैंड डैट टू इंडिया, पॉलिटिकल फ्यूचर ऑफ इंडिया जैसे ग्रंथों के माध्यम से जनता को आजादी की लड़ाई के लिए प्रेरित किया और राष्ट्रवादी पत्रकारिता की नींव डाली. इसी दौरान एक और घटना घटी जिससे पत्रकारिता का काला पक्ष उजागर हुआ लाहौर के एक प्रमुख भारतीय समाचार पत्र के संपादक ने कुछ छात्रों के गुप्त नाम से प्रकाशित किए गए लेख की मूल पांडुलिपि गवर्नमेंट कालेज के प्रिंसिपल को सौंप दी. इस लेख से स्कूल प्रशासन बेहद नाराज हुआ और कठोरतापूर्वक छात्रों को प्रताड़ित किया. संपादक का यह कृत्य न सिर्फ पत्रकारिता के सिद्धांतों, मूल्यों और उत्तरदायित्वों के विरुद्ध था बल्कि युवाओं में अंगड़ाई ले रही आजादी और राष्ट्रप्रेम की भावना को कुचलने का प्रकटीकरण भी था. इस घटना से साबित हुआ कि उस दौरान भी मीडिया का एक वर्ग भारतीयता, आजादी और राष्ट्रवाद के विरुद्ध था.

बाल गंगाधर तिलक ने जब मराठी भाषा में 'केसरी' और अंग्रेजी भाषा में 'मराठा' नामक पत्रों का पब्लिकेशन शुरू किया तो उन्होंने राष्ट्रीय व सामाजिक सरोकारों को आगे रखा, उनकी आंखों में भारत की आजादी और समतामूलक समाज का सपना था, जो उनके पत्रों में स्पष्ट परिलक्षित और प्रतिबिंबित होता था. उन दिनों कोल्हापुर रियासत के शासन में बड़ा अंधेर मचा था. इस अंधेरगर्दी के खिलाफ 'केसरी' ने जोरदार आवाज बुलंद की लेकिन गोरी सरकार को यह रास नहीं आया, सो उसने बाल गंगाधर तिलक और उनके सहयोगियों पर मुकदमा चलाकर जेल में डाल दिया, लेकिन तिलक अपने पत्रों के जरिए भारतीय जनमानस में चेतना भरने में कामयाब रहे. यही नहीं वे इन समाचारपत्रों के जरिए ब्रिटिश शासन तथा उदार राष्ट्रवादियों की, जो पश्चिमी तर्ज पर सामाजिक सुधारों तथा संवैधानिक तरीके से राजनीतिक सुधारों का पक्ष लेते थे, को भी कटु आलोचना के लिए विख्यात हो गए.

(लेखक- अरविंद जय तिलक)

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