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हेल्थकेयर सिस्टम की बैकबोन बनती नर्सिंग

हेल्थकेयर सिस्टम की बैकबोन बनती नर्सिंग

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कोरोना काल ने नर्सों की अहमियत और महत्व को दोबारा हाईलाइट कर दिया है. शायद इनके सेवाभाव और समर्पण के कारण ही इन्हें आदर से ‘सिस्टर’ कहकर संबोधित किया जाता है. इसमें संदेह नहीं कि किसी भी देश के हेल्थकेयर सिस्टम की बैकबोन नर्सिंग है, इन्हें जितना भी सम्मान दिया जाए, वह कम ही है.

हममें से अधिकतर लोग ‘द लेंडी विद द लैंप’ के नाम से प्रसिद्ध फ्लोरेंस नाइटिंगेल के सेवा भाव और त्यागमय जीवन से परिचित हैं, मैंने संभवत: पहली बार उनके विषय में कक्षा पांचवी की जनरल नॉलेज की बुक में पढ़ा था और लँप हांथ में लिए हुए उनकी तस्वीर, आज भी मेरे मस्तिष्क पर स्पष्ट रूप से अंकित है. लगभग उसी समय मदर टेरेसा के बारे में भी जाना और अनायास ही उन दोनों के बीच तमाम समानताएं प्रतीत होने लगीं. दोनों महान शख्सियतों का जीवन सेल्फलेस सर्विस, काइंडनेस और सिंपलिसिटी का प्रतीक था. उनके जीवन में इतनी समानताएं थीं कि मदर टेरेसा को आगे चलकर ‘फ्लोरेंस नाइटिंगेल ऑफ ट्वेंटिएथ सेंचुरी’ भी कहा गया.

फ्लोरेंस नाइटिंगेल का जन्म इटली के फ्लोरेंस में 12 मई सन् 1820 को हुआ था. वह एक अत्यधिक सम्पन्न व समृद्ध परिवार की महिला थीं लेकिन होश संभालते ही उनके मन में नर्स बनकर सेवा करने की ऐसी चाह जागी कि माता-पिता के तीव्र विरोध के बावजूद उन्होंने अपने दिल की आवाज ही सुनी.
वर्ष 1854 में ब्रिटेन, फ्रांस और तुकों ने रूस के खिलाफ युद्ध छेड़ दिया. युद्ध में घायलों के उपचार के लिए कोई सुविधाएं उपलब्ध नहीं थी और वहां के अस्पतालों की स्थिति इतनी दयनीय थी कि घाव पर बांधने के लिए पट्टियां भी उपलब्ध नहीं थीं. ऐसे में फ्लोरेंस अपनी महिला नस के समूह के साथ अधिकारिक रूप से युद्धस्थल पर पहुंची और महिला होने के कारण सैन्य अधिकारियों की अपेक्षा का सामना करते हुए भी उन्होंने और उनकी टीम ने जो विशिष्ट सेवा कार्य किया वो विश्व के लिए मिसाल बन गया. रात में जब सब सो जाते तब फ्लोरेंस हांथ में लैंप लेकर घायल सैनिकों की देखभाल के लिए निकलतों, सैनिकों ने ही उन्हें सम्मान स्वरुप ‘द लेडी विद द लॅप’ की उपाधि दी. सन् 1858 में उनके काम की सराहना रानी विक्टोरिया और प्रिंस अल्बर्ट ने भी की और 1860 में फ्लोरेंस ने नाइटिंगेल ट्रेनिंग स्कूल की स्थापना की. इसी वर्ष फ्लोरेंस ने नोट्स ऑन नर्सिंग’ नाम की पुस्तक पब्लिश की जो नर्सिंग सिलेबस के लिए लिखी गई विश्व की पहली पुस्तक बनी, नर्सिंग के क्षेत्र में फ्लोरेंस के योगदान के लिए सन् 1907 में किंग एडवर्ड ने उन्हें आर्डर ऑफ मेरिट से सम्मानित किया और वो इस सम्मान को पाने वाली पहली महिला बनी.
हर साल 12 मई यानि फ्लोरेंस के जन्म दिवस के दिन दुनिया भर में अंतरराष्ट्रीय नर्स दिवस मनाया जाता है. बीमारों को जिंदगी देने में जितना योगदान डॉक्टर्स का है, उससे कम योगदान नर्स का नहीं है. नर्स बीमारों की पूर्ण लगन से सेवा करती हैं और अपनी परवाह किए बिना मरीज की जान बचाती हैं. यह दिन उनके योगदान को समर्पित है तथा दुनिया में नर्सिंग की संस्थापक फ्लोरेंस नाइटिंगेल को भी श्रद्धांजलि है. 1965 से अभी तक यह दिन हर साल इंटरनेशनल काउंसिल ऑफ नर्सेज द्वारा अंतरराष्ट्रीय नर्स दिवस के रूप में मनाया जाता है.
अमेरिका के स्वास्थ्य, शिक्षा और कल्याण विभाग के एक अधिकारी डोरोथी सुदरलैंड ने पहली बार नर्स दिवस मनाने का प्रस्ताव 1953 में रखा था. वर्ष 1974 में उनके जन्मदिन 12 मई को ही अंतरराष्ट्रीय नर्स दिवस के तौर पर मनाने की घोषणा अमेरिका के राष्ट्रपति डेविट डी. आइजनहावर ने की थी. नर्सिंग व्यवसाय को समाज में उचित सम्मान प्राप्त हो इस कारण हर साल 12 मई को देश में नर्सिंग में विशिष्ट सेवा के लिए ‘राष्ट्रीय फ्लोरेंस नाइटिंगेल पुरस्कार’ दिया जाता है. इसकी शुरुआत 1973 में भारत सरकार के परिवार एवं कल्याण मंत्रालय ने की थी. अब तक कुल 250 के करीब नर्सों को इस पुरस्कार से सम्मानित किया गया है तथा इस पुरस्कार की अहमियत इसी बात से प्रकट होती है कि इसे देश के राष्ट्रपति द्वारा दिया जाता है. इस पुरस्कार में 50 हजार रुपए नकद, एक प्रशस्ति पत्र और मेडल प्रदान किया जाता है.
इस दिन को लंदन के वेस्टमिंस्टर ऐबी में एक कैंडल लँप सेवा का आयोजन करके मनाया जाता है. इस आयोजन में कैंडल लैंप एक नर्स से दूसरे को सौंप दिया जाता है, जो कि एक नर्स से दूसरी नर्स के पास नॉलेज ट्रांसफर का प्रतीक है.
अमेरिका और कनाडा में पूरे सप्ताह इसे नर्सिंग वीक के रूप में मनाया जाता है. वहीं ऑस्ट्रेलिया में भी तमाम नर्सिंग समारोहों का आयोजन होता है. इस वर्ष इस दिवस की थीम है ‘नर्सेज अ वॉइस टू लीड- अ विजन फॉर फ्यूचर हेल्थकेयर’ कोरोना काल ने इस प्रोफेशन की अहमियत और महत्व को पुनः हाईलाइट कर दिया है.
इंटरनेशनल काउंसिल ऑफ नर्सेज के अनुसार, इस दौर में, 60 देशों में लगभग 3000 नर्स अपनी जान गंवा चुकी हैं. शायद इनके सेवाभाव और समर्पण के कारण ही इन्हें आदर से ‘सिस्टर’ कहकर संबोधित किया जाता है. इसमें संदेह नहीं कि किसी भी देश के हेल्थकेयर सिस्टम की बैकबोन नर्सिंग है, इन्हें जितना भी सम्मान दिया जाए, वह कम ही है.
(लेखक- आलोक सक्सेना)

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