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टेलीमेडिसिन के साथ बढ़ाने होंगे मदद के हाथ

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Telemedicine

टेलीमेडिसिन से आपदा के दौरान मेडिकल फेसिलिटीज भी बाधित नही होगी. इस प्रकार टेलीमेडिसिन स्वास्थ्य क्षेत्र में किफायती दर पर क्रांतिकारी भूमिका निभा सकता है. यही वजह है कि आज इसे एक सक्षम विकल्प के रूप में देखा जा रहा है.

वर्तमान में देखा जा रहा है कि लोग साधारण बिमारी से ग्रसित होने पर भी कोरोना के डर से बस अस्पताल में भर्ती होना ज्यादा उचित समझ रहे हैं, जिससे वायरस के बढ़ने के साथ अनायास ही हेल्थ सिस्टम पर दबाव पड़ रहा है. वहीं, यदा कदा लॉकडाउन के चलते पैसेंट्स स्वास्थ्य लाभ नहीं ले पा रहे हैं. ऐसे में सभी मरीजों के लिए एम्स की ओर से टेलीमेडिसिन की सुविधा दी जा रही है, जिससे मरीज घर बैठे ही व्हाट्सऐप नंबर या अन्य ऑनलाइन प्लेटफाम्स के जरिए चिकित्सकों से समय लेकर जरूरी परामर्श ले सकते हैं. यह टेलीमेडिसिन की व्यवस्था केवल एम्स तक ही सीमित नहीं है, बल्कि इसका फैलाव सभी छोटे से छोटे अस्पतालों तक किया जा रहा है, जिससे लोगों को घर बैठे राहत दी जा सके.

वर्तमान में कोविड के तेजी से बढ़ने की वजह से मरीजों की संख्या में भारी इजाफा हो रहा है, लेकिन देश में डॉक्टर्स की संख्या सीमित है, ऐसी स्थिति में टेलीमेडिसिन ही एक कारगर उपाय बनकर सामने आ रहा है, जिसको अब ग्रामीण स्तर तक ले जाने की जरूरत है. विश्व स्वास्थ्य संगठन की मानें तो एक हजार व्यक्तियों पर एक डॉक्टर की उपलब्धता होनी चाहिए, लेकिन भारत में पंद्रह सौ व्यक्तियों पर एक डॉक्टर की उपलब्धता देखी जाती है, वहीं ग्रामीण अंचलों की स्थिति तो और भी जर्जर है. भारत की जनसंख्या और विश्व स्वास्थ्य संगठन के मानदंडों के अनुसार अभी भी देश में 4.5 लाख डॉक्टर की आवश्यकता महसूस की जा रही है. वहीं अगर अस्पतालों में प्रति एक हजार व्यक्तियों पर बेड की उपलब्धता देखी जाए, तो भारत में 0.7 बेड, अमेरिका में 2.9, चीन में 4.3 और जर्मनी ने 8.3 बेड हैं. बहरहाल, देश के कमजोर स्वास्थ्य ढांचे के बावजूद बढ़ता ई-स्वास्थ्य इन्फ्रास्ट्रक्चर राहत का जरिया बन रहा है.

पिछले दिनों ही भारत सरकार की राष्ट्रीय टेलीमेडिसिन सेवा ई-संजीवनी ने तीस लाख से अधिक परामर्श उपलब्ध कराकर एक महत्वपूर्ण उपलब्धि हासिल की है, मौजूदा समय में नेशनल टेलीमेडिसिन सर्विस इकत्तीस राज्यों, केंद्रशासित प्रदेशों में संचालित है और प्रतिदिन देश के पैंतीस हजार से भी अधिक मरीज स्वास्थ्य सेवाएं प्राप्त करने के लिए इस नवाचारी डिजिटल माध्यम का उपयोग कर रहे हैं. राष्ट्रीय स्तर पर, इकत्तीस हजार से अधिक डॉक्टरों और पैरामेडिक्स को प्रशिक्षित करके ई-संजीवनी में शामिल किया गया है. ई-संजीवनी को शीघ्र और व्यापक तौर पर अपनाना यह दर्शाता है कि कोरोना काल में मरीजों के लिए दूर से ही प्रभावी ढंग से नैदानिक प्रबंध किया जा सकता जिन रोगियों को ज्यादा जरूरी चिकित्सा की जरूरत नहीं है, वे अधिक से अधिक टेलीमेडिसिन का इस्तेमाल कर रहे हैं. और चिकित्सा की गुणवचा से समझौता किए बगैर ही कोरोना से संक्रमित होने के जोखिम से भी अपना बचाव कर पा रहे हैं. पिछले लॉकडाउन के दौरान विश्व स्वास्थ्य संगठन ने भी अधिक से अधिक टेलीमेडिसिन मॉडल को अपनाने की ही सलाह दी थी. कयास लगाया जा रहा है कि कोरोना वायरस का मानव से संबंध कुछ लंबे समय तक बना रहेगा. ऐसे में, टेलीमेडिसिन ज्यादा कारगर साबित होगी. उल्लेखनीय है कि अब विश्व के अधिकतर देशों में टेलीमेडिसिन की नई उपचार पद्धति को तेजी से अपनाया जा रहा है, लेकिन उम्मीद की जा रही है कि अधिकतर देशों को ई-स्वास्थ्य प्रणाली अपनाने का खामियाजा भी उनके अस्पतालों को भुगतना पड़ेगा. लेकिन वहीं भारत के परिप्रेक्ष्य में देखा जाए तो भारत स्वास्थ्य के क्षेत्र में खासकर स्वास्थ्य इंफ्रास्ट्रक्चर में अभी भी बहुत खास प्रगति नहीं कर सका है. भारत अपनी जीडीपी का लगभग 1.5 फीसद ही स्वास्थ्य पर खर्च करता है और इसी वजह से भारत की स्वास्थ्य व्यवस्था सदैव से जर्जर अवस्था में बनी हुई है, जिसका पोल कोरोना महामारी के दौरान पूरी तरह खुल चुका है, लेकिन वैश्विक महामारी को देखते हुए 2021-22 के बजट में स्वास्थ्य सेवा क्षेत्र पर व्यय में 137 प्रतिशत की बड़ी वृद्धि की गई है.

टेलीमेडिसिन की फील्ड में भारत अभी टॉप 10 मार्केट में है. एक रिपोर्ट के मुताबिक, 2025 तक टेलीमेडिसिन इंडस्ट्री चार सौ पांच अरब रुपए की इंडस्ट्री हो जाएगी. देश में डिजिटल भारत अभियान चलाया जा रहा है, जिसके तहत इंटरनेट की उपलब्धता रूरल एरियाज तक प्रचुरता से होनी जरूरी है, इसलिए भारत में नेट के तहत ब्रॉडबैंड कनेक्शन से ग्रामों को जोड़ने पर विशेष जोर दिया जा रहा है, जिससे लोग ऑनलाइन भुगतान और ऑनलाइन चिकित्सा सुविधा का लाभ घर बैठे ही ले सकें. टेलीमेडिसिन की फील्ड में भारत जिस तेजी से आगे बढ़ रहा है, कहा जा सकता है कि इससे लोगों का कोरोना से बचाव तो होगा ही, साथ ही स्वास्थ्य के क्षेत्र में भी इसकी रैंकिंग और स्ट्रांग होगी, क्योंकि टेलीमेडिसिन मॉडल अपनाने से अस्पतालों में आने जाने वाले मरीजों की संख्या आधी हो सकती है. इस तरह अस्पताल जाकर डॉक्टर को दिखाने के मुकाबले घर से ही फोन पर सलाह लेने में तीस फीसद कम खर्च होगा. एक अनुमान के मुताबिक, टेलीमेडिसिन की वजह से न केवल कोरोना के फैलाव पर रोक लगेगी बल्कि मरीजों का लगने वाला परिवहन खर्च और समय दोनों बचेगा.

(लेखक- लालजी जयसवाल)

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