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गोगरा पोस्ट पर फिर चीन ने बदली 'चाल'

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Chinese army

अपनी वर्चस्ववादी मानसिकता के तहत चीन की दक्षिण चीन सागर पर एकाधिकार को लेकर वियतनाम, फिलीपिंस, ताइवान व दक्षिण पूर्व एशियाई देशों से ठनी है. यह मामला अंतरर्राष्ट्रीय पंचायत में भी लंबित है. बावजूद इसके चीन अपनी वादाखिलाफी से बाज नहीं आता है.


पूर्वी लद्दाख में वास्तविक नियंत्रण रेखा पर भारत और चीन की सेनाएं पिछले साल मई 2020 से आमने-सामने हैं. एलएसी पर बड़े तनाव को कम करने की ताजा सैन्य बाता किसी ठोस परिणाम पर नहीं पहुंच पाई है. 11वें दौर की हुई कमांडर स्तरीय इस बातचीत में चीन ने बुनियादी रूप से कारण बने चार बिंदुओं में से दो बिंदुओं को मानने से साफ इंकार कर दिया है. चीन ने कहा है कि सेनाओं को पीछे हटने को लेकर भारत ने पेंगोंग झील क्षेत्र में जो प्राप्त किया है, उसी में संतोष करे. फिलहाल चीनी सेना हॉट स्प्रिंग्स के पेट्रोलिंग प्वाइंट 15 और गोगरा पोस्ट के निकट पीपी-17 ए पर डटी है. चीन ने यहां बख्तरबंद गाड़ियों के साथ सैनिक भी तैनात कर दिए हैं विवादित दोनों बिंद कोंगका दरें के नजदीक है. इसे लेकर चीन का दावा है कि भारत-चीन सीमा चिह्नत करने वाले दरों में यह मौल का पत्थर है.

सैनाएं लद्दाख सीमा पर परस्पर मुकाबले के लिए मई 2020 से तत्पर हैं. भारतीय नेतृत्व की आक्रामकता और आत्मनिर्भरता की ठोस व निर्णायक रणनीति के चलते दोनों देशों के बीच हुए समझौते के तहत चीन सेना पीछे हटाने का वचन दे चुका था, लेकिन अब अपनी खोटी नियत के चलते वह वचन से मुकर रहा है. दोनों देशों की सेनाओं के पीछे हटने के समझौते के क्रम में भारत को एक इंच भी जमीन गंवानी नहीं पड़ी, यह बयान ग्रहमंत्री राजनाथ सिंह ने दिया था. इस समझौते में तीन शर्ते तय हुई थीं. पहली, दोनों देशों द्वारा वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) का सम्मान किया जाएगा. दूसरा कोई भी देश एलएसी की स्थिति को बदलने को इकतरफा कोशिश नहीं करेगा, तीसरा, दोनों देशों को संधि की सभी शर्तों को मानना बाध्यकारी होगा. दरअसल चीनी सेना ने पीपी-15, पीपी-17 ए, गलवान घाटी में पीपी-14 और पैगॉग झील के उत्तरी क्षेत्र फिंगर-4 पर कब्जा जमा लिया। था. यह भू-भाग भारत के अधिकार क्षेत्र फिंगर 8 से 8 किमी पश्चिम में है. समझौते के बाद भारत सरकार के रक्षा मंत्रालय ने पैगोंग झोल क्षेत्र से सैनिकों की वापसी को लेकर साफ किया था कि 'भारतीय भू-भाग फिंगर-4 तक ही नहीं, बल्कि भारत के मानचित्र के अनुसार यह भू-भाग फिंगर-8 तक है.' पूर्वी लद्दाख में राष्ट्रीय हितों और भूमि की रक्षा इसलिए संभव हो पाई थी, क्योंकि सरकार ने सेना को खुली छूट दे दी थी. सेना ने बीस जवान राष्ट्र की बलिवेदी पर न्योछावर करके अपनी क्षमता प्रतिबद्धता और भरोसा जताया था.

दरअसल, भारत के मानचित्र में 43000 वर्ग किमी का वह भू-भाग भी शामिल है, जो 1962 से चीन के अवैध कब्जे में हैं. इसीलिए राजनाथ सिंह को संसद में कहना था कि भारतीय नजरिए से एलएसी फिंगर आठ तक है, जिसमें चीन के कब्जे वाला इलाका भी शामिल है. पगॉग झील के उत्तरी किनारे के दोनों तरफ स्थाई पोस्ट स्थापित हैं. भारत की तरफ फिंगर-3 के करीब धानसिंह थापा पोस्ट है और चीन की तरफ फिंगर-8 के निकट पूर्व दिशा में भी स्थाई पोस्ट स्थापित है. समझौते के तहत दोनों पक्ष अग्रिम मोर्चे पर सेनाओं की जी तैनाती मई-2020 में हुई थी, उससे पीछे हटेंगे, लेकिन स्थाई पोस्टों पर तैनाती बरकरार रहेगी. याद रहे भारत और चीन के बीच संबंध तब गहरा गए थे, जब गलवान घाटी में दोनों देशों के सैनिकों के बीच बिना हथियारों के खूनी संघर्ष छिड़ गया था. नतीजतन भारत के बीस वीर सैनिक शहीद हो गए थे. इस संघर्ष में चीन के 45 सैनिक हताहत हुए थे.

चीन से लगी पूरी वास्तविक नियंत्रण रेखा पर भारतीय सेना के लिए कुछ स्थान चिड़ित है, जहां भारत के सैनिक अपने नियंत्रण वाले क्षेत्र में गस्त कर सकते हैं. इन्हीं बिंदुओं को पेट्रोलिंग प्वाइंट अर्थात पीपी कहते हैं. हालांकि इन बिंदुओं के निर्धारण के संदर्भ में विडंबना है कि इन्हें तय करने का काम चीन का 'प्वाइंट्स चाइना स्टडी ग्रुप' करता है. इसकी शुरुआत इंदिरा गांधी के प्रधानमंत्री रहते हुए 1976 में हुई थी. इस पूरी नियंत्रण रेखा पर 65 पीपी और कुछ अल्फा प्वाइंट्स हैं, जो वास्तविक पेट्रोलिंग प्वाइंट्स से कुछ आगे हैं. पीपीए-17 और पीपी-17 के निकट भी एक अल्फा प्वाइंट है.

दरअसल चीन विस्तारवादी तथा वर्चस्ववादी राष्ट्र की मानसिकता रखता है. इसी के चलते उसको दक्षिण चीन सागर पर एकाधिकार को लेकर वियतनाम, फिलीपिंस, ताइवान और दक्षिण पूर्व एशियाई देशों के साथ उनी हुई हैं. यह मामला अंतरराष्ट्रीय पंचायत में भी लंबित है. बावजूद इसके चीन अपने अड़ियल रवैये और वादाखिलाफी से बाज नहीं आता है. दरअसल उसकी मंशा दूसरे देशों के प्राकृतिक संसाधन हड़पना है. इसीलिए आज उत्तर कोरिया और पाकिस्तान को छोड़ ऐसा कोई अन्य देश नहीं है, जिसे चीन अपना पक्का दोस्त मानता हो.

(लेखक- प्रमोद भार्गव)

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