यूरोपीय संघ के साथ भारत के मजबूत होते रिश्ते

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European union

यूरोपीय संघ से ब्रिटेन के अलग होने के बाद परिस्थितियों में बदलाव आया है. अभी तक 27 देशों के इस संगठन में ब्रिटेन, फ्रांस और जर्मनी की ही तूती बोलती थी. लेकिन अब भारत को अपनी भूमिका के विस्तार का मौका मिल गया है.

कोरोना महासंकट के बीच भारत-यूरोपीय संघ के राष्ट्राध्यक्षों एवं शासनाध्यक्षों के दरम्यान वर्चुअल शिखर सम्मेलन में कोविङ- 19 की स्थिति, स्वास्थ्य संबंधी तैयारी, जलवायु परिवर्तन, पृथ्वी की सुरक्षा, हरित विकास को बढ़ावा तथा अर्थव्यवस्था के आधुनिकीकरण पर चर्चा वैश्विक जगत के लिए शुभ है. यह सम्मेलन इस अर्थ में ज्यादा महत्वपूर्ण है कि पहली बार प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने यूरोपीय संघ के प्रारूप में वैश्विक नेताओं के साथ बैठक की. यह बैठक भारत और यूरोपीय संघ के बीच मजबूत राजनीतिक और रणनीतिक समझ को रेखांकित करने वाला है.

भारत और यूरोपीय संघ 'स्टैंड- अलोन' निवेश संरक्षण पर सहमति के साथ साझे हितों, लोकतंत्र, स्वतंत्रता, कानून का शासन मानवाधिकारों का सम्मान जैसे कई अन्य मानवीय मसलों पर सहमति जताते हुए स्वीकार किया कि यह हमारी सामरिक साझेदारी का मूल्य है. अच्छी बात है कि दोनों पक्षों ने गत वर्ष जुलाई 2020 में संपन्न शिखर सम्मेलन के समझौते को गति देने के साथ भारत- यूरोपीय संघ ढांचा 2025 को लेकर तय कार्य बिंदुओं पर आगे बढ़ने तथा टिकाऊ विकास एवं पेरिस समझौता 2030 के एजेंडे पर आगे बढ़ने की हामी भरी है. ध्यान देना होगा कि यूरोपीय संघ से ब्रिटेन के अलग होने के बाद परिस्थितियों में तेजी से बदलाव आया है. अभी तक 27 देशों के इस संगठन में ब्रिटेन, फ्रांस और जर्मनी की ही तूती बोलती थी. लेकिन अब जब ब्रिटेन संघ से अलग हो गया है, अब भारत को अपनी भूमिका के विस्तार का मौका मिल गया है. अच्छी बात यह है कि भारत और यूरोपीय संघ ने इस शिखर सम्मेलन में 2025 तक की साझेदारी का खाका पेश कर दिया है जिसमें सैन्य और समुद्री सुरक्षा, हिंद व प्रशांत महासागर में शांति की स्थापना और समुद्री कानून के पालन के अलावा अन्य मसलों पर संवाद और सहयोग बढ़ाने की प्रतिबद्धता जताई है.

उल्लेखनीय है कि यूरोपीय संघ भारत का सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार है. यूरोपीय संघ के साथ भारत का द्विपक्षीय आसपास पहुंच चुका है. यूरोपीय संघ भारत को अन्य विश्व शक्तियों की तरह एक क्षेत्रीय और वैश्विक महाशक्ति के रुप में महत्व देता है. भारत और यूरोपीय संघ वर्ष 2004 से ही रणनीतिक साझेदार है और एकदूसरे के सहयोग से विकास के पथ पर आगे बढ़ रहे हैं. यूरोपीय संघ का साथ मिलने से वैश्विक समुदाय में भारत के आर्थिक कारोबारी भूमिका का विस्तार तो हुआ ही है साथ ही कूटनीतिक पहल को भी पंख लगे हैं.

याद होगा गत वर्ष नई दिल्ली में संपन्न हुए 14 वें शिखर सम्मेलन में भी भारत और यूरोपीय संघ के बीच सौर गठबंधन निवेश, बेंगलुरु मेट्रो निवेश और विज्ञान अनुसंधान विनिमय समेत कई अन्य अहम समझौतों पर मोहर लगी. यूरोपीय संघ ने भारत की समुद्री सीमा की रक्षा की वचनबद्धता के साथ भविष्य में सैन्य सहयोग बढ़ाने की भी समी भरी इसी तरह ब्रुसेल्स के 13 वें शिखर सम्मेलन में भी भारत और यूरोपीय संघ के बीच रणनीतिक साझेदारी को नया आयाम मिला. इस सम्मेलन में व्यापार, ऊर्जा, सुरक्षा और वाणिज्य के मसले पर दोनों के बीच उल्लेखनीय प्रगति हुई. इस बैठक में आतंकवाद के मसले पर भी भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के सुझाव को गंभीरता से लिया गया और आतंकवाद के खिलाफ मिलकर लड़ने की प्रतिबद्धता जाहिर की गई, लेकिन विडंबना है कि एफटीए पर बार-बार वार्ता का संकेत दिए जाने के बावजूद भी इस दिशा में अभी तक ठोस पहल नहीं हुई है.

एफटीए पर सहमति न बनना दोनों पक्षों के लिए नुकसानदायक है. अगर इस दिशा रचनात्मक पहल होती तो एफटीए लागू होता और वस्तुओं पर शुल्क काफी हद तक कम होता. दरअसल यूरोपीय संघ की व्यापार लॉबी चाहती है कि भारत कर में अधिकतम छूट दे ताकि भारतीय उपभोक्ता यूरोपीय शराब ज्यादा से ज्यादा खरीद सकें, इसके अलावा यूरोपीय संघ यूरोपीय चीज, ऑटोमोबाइल और लीगल सर्विसेज पर भी छूट चाहता है. यूरोपीय संघ की मांग है कि भारत में और अधिक यूरोपीय बैंकों की शाखाओं की स्थापना की अनुमति के साथ मल्टी ब्रांड आउटलेट्स के क्षेत्र में विदेशी निवेश में भी अनुमति दी जाए, यूरोपीय संघ का आरोप है कि भारत अभी भी संरक्षणवादी नीतियों पर चल रहा है एवं कई गैर प्रशुल्क कर बाधाओं के माध्यम से यूरोप के मालों को भारत में आने से रोकता है तथा भारत अपने घरेलू बाजार को संरक्षण प्रदान करने के लिए यूरोपीय मालों को बराबरी का दर्जा नहीं देता है. उसका यह भी कहना है कि यूरोपीय संघ द्वारा टैरिफ मुक्त आयात की मांग करने पर भारत इस मुद्दे को वीजा संबंधी मुद्दों से जोड़ते हुए अन्य प्रकार के मुद्दे को बीच में ला देता हैं. लेकिन भारत इससे सहमत नहीं है भारत का तर्क है कि मूल मुद्दे और इससे संबंधित बाहरी मुद्दों को अलग-अलग करके नहीं देखा जा सकता.

(लेखक- अरविंद जय तिलक)

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